कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषष्ठ अध्याय ] [ २६५ क्व चाह मानुषी दीना क्वाते देवो जनार्दनः । निगृहीता विधात्राह शिवेन परिवञ्चिता ।६। विष्णौ च परित्यक्ता मदन्या नात्र जीवति ।७। इति नाना विलपिन्या वचन शोचनाश्रयम् । पद्मायाश्चरुचेष्टाया। श्रुत्वायातस्तवान्तिके ।८। शुकस्य वचनं श्रुत्वा कल्किः परमविस्मितः । त जगाद् पुनर्याहि पद्मा बोधयितु प्रियाम् ।६। मत्सन्देशहरो भूत्वा यद्रूपगुणकीर्तनम् । श्रावयित्वा पुन कीर ! समायास्यासि बांधव ।१०। कहाँ तो मैं दीन मानुषी और कहाँ वे जनार्दन प्रभु-इन दोनो मे विवाह की कल्पना करने से ही मैं तो यह समझती हूँ कि विधाता मुझ से विमुख है, तभी तो शिवजी ने मुझे वैसा वर देकर ठग लिया है- ।६। भगवान श्री हरि के द्वारा परित्यक्ता होकर मेरे अतिरिक्त और कौन जीवित रह सकता है ।७। सुन्दर चरित्र वाली पद्मावती इस प्रकार से विलाप करती थी । उसके शोकाकुल वचनो को सुनकर ही मैं आपके निकट उपस्थित हुआ हूँ ।८। शुक के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए कल्कि जी ने शुक के प्रति कहा—हे शुक मेरी प्रिया पद्मा को आश्वासन देने के निमित्त तुम पुनः सिंहल देश को प्रस्थान करो ।६। हे शुक ! तुम हमारे संदेश वाहक होकर पद्मा को हमारे रूप गुण का वृत्तान्त सुनाना और फिर हे खग ! तुम शीघ्र ही यहाँ लौट आना ।१०। सा मे पतिरह तस्या दैवविनिर्मितः । मध्यस्थेन त्वया योगमावयोश्च भविष्यति ।११। सर्वज्ञसि विधिज्ञोऽसि कालज्ञोऽसि कथामृते । तामाश्वास्य ममाश्वासकथास्तस्याः समाहरः ।१२। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा शुक परमहर्षितः । प्रणम्य त प्रोतमनाःप्रययौ सिंहलं त्वरन् ।१३।