कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context२६६ ] [ कल्कि पुराण खगः समुद्रपारेण स्नात्वा पीत्वामृतं पय । बीजपूरफलाहारो ययौ नाजदिनिवेशमम् ।१४। तत्र कन्यापुर गत्वावृक्षे नागेश्वरे वसन् । पद्मालोक्य तां प्राह मुको मानुष भाषया ।१५। अवश्य ही पद्मा मेरी पत्नी और मैं उसका पति हूँ । विधाता ने ही यह संयोग नियत किया है और यह कार्य तुम्हारी मध्यस्थता मे ही सम्पन्न होना है । ११। तुम सर्वज्ञ हो, नियम और काल के भी ज्ञाता हो । तुम अपने वचनामृत से समझा कर और मेरे द्वारा ग्रहण किये जाने का आश्वासन देकर यहाँ लौट आओ । ।१२। कल्किजी का ऐसा आदेश पाकर मुदित हुए शुक ने उन्हें प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक सिंहल- देश को प्रस्थान किया ।१३। मार्ग मे, समुद्र के पार जाकर शुक ने स्नान करके उस मृतोपम जल का पान और बिजौरे के फलको भक्षण किया और फिर राजभवन मे प्रविष्ट होगया ।१४। वह अन्त पुर मे पहुंच कर राजकन्या के निवास स्थान पर जाकर नागकेशर के एक वृक्ष पर चढ गया और पद्मा को देख कर मनुष्यो की भाषा मे उससे बोला ।१५। कुशलं ते वरारोहे ! रूप यौवन शालिनी । त्वा लोलनयनां मन्ये लक्ष्मी रूपमिवापराम् ।१६। पद्मानना पद्मगन्धां पद्मनेत्रा कराम्बुजे । कमल कालयन्तीं त्वां लक्षयामि परां श्रियम् ।१७। किं धात्रा सर्वजगतां रूपलावण्यसम्पदाम् । निर्मितासि वरारोहे ! जीवानां मोहकारिणि ! ।१८। इति भाषितमाकर्ण्य कीरस्यामितमद्भुतम् । हसन्ती प्राह सा देवी त पद्मा पद्ममालिनी ।१६। कस्त्वं कस्मादागतोऽसि कथ मा शुकरूपधृक् । देवो वा दानवो वा त्वमागतोऽसि दयापरः ।२०।