कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextप्रथम अध्याय-२ ] [ ३११ सखीभि संगीताभिस्ते किं करिष्यामि तद्वद ।२०। मैं तुम्हारी चोंच को पद्मरागमणि और रत्नों से मंडित करा कर उन्हें मनोमोहक अरुण वर्ण की और दीप्तिमयी करादूँगी ।१६। तुम्हारे कंठ में सूर्यकान्त मणि जटित स्वर्ण पट्टिका बाँध कर दोनों पक्षों को मोतियों से सजाऊँगी ।१७। तुम्हारे पंख और शरीर को कुंकुम से चर्चित करके ऐसा सुशोभित करूँगी कि सब तुम्हे देखते ही अत्यन्त आन- न्दित हो जाँय ।१८। तुम्हारी पूँछ को स्वच्छ मरिण से गूँथ दूँगी, जिससे तुम्हारे चलने पर सुन्दर घर्घर शब्द सुनाई देगा । तुम्हारे पाँवों में नूपुर बाँध दूँगी, जिनसे सुमधुर ध्वनि निकलेगी ।१९। तुम्हारा कथा- मृत सुनकर ही मेरे मन की व्यथा मिट गई । मुझे बताओ कि मुझे क्या करना है ? सखियों के सहित मैं तुम्हारी परिचर्या करूँगी ।२०। इति पद्मावचः श्रुत्वा तदन्तिकमुपागत । कीरो धारः प्रसन्नात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ।२१। ब्रह्मणा प्रार्थितः श्रीशो महाकारुणिको वभौ । शंभले विष्णुयशसो गृहे धर्म-रिरक्षुषुः ।२२। चतुर्भिभ्रातृभिर्ज्ञाति-गात्रजैः परिवारितः । कृतोपनयनो वेदमधीत्य रामसन्निधौ ।२३। धनुर्वेदञ्च गान्धर्वं शिवादश्वमपि शुकम् कवचंञ्च वर लब्धा शम्भल पुनरागतः ।२४। विशाखयूपभूषाल प्राप्य शिक्षांविशेषतः । धर्मानारुयाय मतिमान् अधर्मांश्च निराकरोत् ।२५। पद्मा के वचन सुन कर हर्षित हुआ शुक पद्मा के पास जा पहुँचा और श्रेष्ठ प्रसग करने लगा ।२१। शुक बोला-भगवान् लक्ष्मीपति ने धर्म संस्थापन-हेतु ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थना करने पर शभल ग्राम निवासी विष्णुयश के यहाँ अवतार लिया है ।२२। वे चार भाई अपने गोत्र एवं परिवार वालो के साथ स्थित हैं, उपनयन सस्कार होने