कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३१२ ] [ कल्कि पुराण के बाद उन्होंने परशुरामजी से वेद की शिक्षा प्राप्त की।२३। फिर उन्होंने धनुर्वेद और गान्धर्व वेद की शिक्षा ली और शिवजी से अश्व, असि, शुक, कवच और वरदान पाकर शम्भल ग्राम मे अपने घर लौटे ।२४। फिर उन कल्कि भगवान् से विशाखयू राजा ने भेट की, तब उन्होंने अपने धर्माख्यान द्वारा राजा की अधर्मयुक्त शंकाओ का निराकरण किया ।२५। इति पद्मा तदाख्यान निशम्य मुदितानना । प्रस्थापयामास शुकं कल्केर्रानयनाहृता ।२६। भूषयित्वा स्वर्णरत्नैस्तमुवाच कृताञ्जलिः ।२७। निवेदितं तु जानासि किमन्यत्कथयाम्यहम् । स्त्रीभावभयभीतात्मा यदि नायाति स प्रभुः ।२८। तथापि मे कर्मदोषात् प्रणतिं कथयिष्यसि । शिवेन यो वरो दत्तः स मे शापोऽभवत्किल ।२६। पुंसा मद्दर्शनेनापि स्त्रीभावः कमतः शुक । श्रुत्वेति पद्मामामन्त्र्य प्रणम्य च पुनः पुनः ।३०। इस प्रसग को सुन कर पद्मा बडी प्रसन्न हुई और उसने कल्कि भगवान् को आदरपूर्वक वहाँ लिवा लाने उद्देश्य से शुक को भेजा ।२६। पद्मा ने शुक को स्वर्णा एवं रत्नो से सुसज्जित किया और हाथ जोड कर कहने लगी ।२७। पद्मा बोली—मैं जो कुछ निवेदन करना चाहती हू, उसे तुम भले प्रकार जानते हो, तो फिर अधिक क्या कहूँ ? मैं स्त्री स्वभाव-वश भयभीत हो रही हूँ। यदि प्रभु यहाँ न आवे तो तुम मेरी ओर से प्रणाम करके मेरे कर्म-दोष के विषय मे उन्हें बताना और कहना कि मुझे शिवजी से जो वर प्राप्त हुआ है वह इस समय -शाप के समान हो रहा है। शिवजी के वरदान के अनुसार जो पुरुष मेरी ओर काम-भाव से देखता है, वही नारी हो जाता है। पद्मा की यह बात सुन कर शुक ने उसे बारम्बार प्रणाम किया ।२८-३०।