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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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प्रथम अध्याय-२ ] [ ३१३ उड्डीयं प्रययौ कीरः शम्बल कल्किपालितम् । तमागम समाकर्ण्य कल्कि. परपुरञ्जयः ।: ३१ ।। क्रोडे कृत्वा त ददर्श स्वर्णावरत्नविभूषितम् । सानन्द परमानन्ददायक प्राह त तदा ।। ३२ ।। कल्किः परमतेजस्वी परस्मिन्नमल शुकम् । पूजयित्वा करे स्पृष्ट्वा पयःपापेन तर्पयन् ।। ३३ तन्मुखे स्वमुख दत्त्वा पत्रच्छ विविधाः कथाः । कस्माद्देशाच्चरित्वा त्व दृष्ट्वापूर्व किमागतः ।। ३४।। कुत्रोषित कुतो लब्ध मणिकाञ्चनभूषणम् । अहर्निश त्वन्मिलन वाञ्छित मम सर्वतः ।। ३५ ।। फिर वह शुक उड कर कल्किजी द्वारा रक्षित शभल ग्राम मे गया शत्रुपुर-विजेता कल्किजी ने उसे आया देख कर शुक को गोद मे लेकर उसे स्वर्ण रत्नो से मडित देखा तो अत्यन्त हर्षित होते हुए बोले ।३१-३२। अत्यन्त तेजस्वी कल्किजी ने शुक का सत्कार करते हुए उसे दुग्ध-पान कराया और उससे सब प्रसग पूछा- हे शुक ! तुम इस समय किस देश से आरहे हो ? वहाँ तुमने कौन-सी अद्भुत वस्तु देखी है ? ।३३ ३४। तुम कहाँ थे ? किसके द्वारा मणियो और स्वर्ण से विभूषित किये गये ? रात दिन मैं तुमसे मिलने के लिए उत्सुक रहा हूँ ।३५। तवानालोकनेनापि क्षण मे युगवद्भवैत् ।। ३६ ।। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा पुणिरत्न्य शुकौ भृशम् । कथयामास पद्माया . कथा पूर्वोदिता यथा ।३७। सवादमात्मनस्तस्या निजालङ्कार धारणम् । सर्व तद्वर्णयामास तस्याः प्रणातिपूर्वकम् ।। ३८ ।। श्रुत्वेति वचन कल्किः शुकेन सहितो मुदा । जगाम् त्वरितोऽश्वेन शिवदत्तेन तन्मनाः ।। ३६ ।। हे शुक ! मैं जब तुम्हे नही देखता, तब मेरा एक क्षण भी युग के समान व्यतीत होता है ।३६। कल्कि की यह बात सुनकर शुक ने हेउ बारम्बार प्रणाम कर पद्मा की पूर्व कथित कथा को कह

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