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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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पहला अध्याय

अपने स्वरूप की परताल करने लगें तो यह भेद अभी खुल जावे कि सारी रचनायें (चाहे आध्यात्मिक हों या आधिभौतिक) बाह्य संकेतों से उद्बोधित हो कर हमारे भीतर से निकली हैं, जिनका परिणाम हमारी वर्त्तमान अवस्था और वर्त्तमान जीवन है। इन सब के संघात का नाम कर्मयोग है।

ये बाह्य संकेत, जो हमारे आत्मा के उद्बोधक हैं, वास्तव में कर्म ही हैं। हम जब तक जीवित रहते हैं, कुछ न कुछ कर्म करते ही रहते हैं। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ, यह कर्म है। तुम ध्यान दे कर सुन रहे हो, यह भी कर्म है। श्वास लेना, चलना, फिरना, बोलना ये सब कर्म हैं। जो कुछ हम करते हैं, जो कुछ हम सोचते हैं, जो कुछ हम समझते हैं; ये सब कर्म ही कहलाते हैं। और ये सब कर्म अपनी स्मृति का प्रभाव हम में छोड़ जाते हैं।

कोई कोई कर्म ऐसे हैं जो बहुत से और भिन्न भिन्न कर्मों के संघात होते हैं। यदि हम समुद्र के तट पर खड़े होकर तटस्थ चट्टानों से लहरों के टकराने का शब्द सुनें तो हमको मालूम होगा कि बड़े ज़ोर की आवाज़ आ रही है। ये लहरें एक एक नहीं हैं किन्तु अगणित छोटी छोटी लहरें आपस में मिल गई हैं। जब तक ये सब लहरें मिल कर समष्टिरूप से चट्टान से नहीं टकरातीं तब तक हम इनकी आवाज़ नहीं सुन सकते। यही दशा तुम्हारे हृदय के धड़कने की है। इसमें भी कर्मों के संघात का प्रभाव काम कर रहा है। बहुत से कर्म जो छोटे छोटे कर्मों के संघात से बनते हैं उनको हम अनुभव भी करते हैं। यदि तुम किसी बड़े आदमी के आचरण को जाँचना चाहते हो तो उसके बड़े बड़े कामों को मत