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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

प्रारंभिक पृष्ठ, भूमिका व प्रस्तावना

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कर्मयोग

अर्थात्

स्वामी विवेकानन्दजी के व्याख्यानों का

हिन्दी-अनुवाद

अनुवादक

पण्डित बदरीदत्त शर्मा

प्रकाशक

इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग

सन् १६२३ ईसवी

[ चतुर्थ बार ] \hfill [ मूल्य ॥) ]

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Published by
K. Mittra,
at The Indian Press, Ltd.,
Allahabad.

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Printed by
Bishweshwar Prasad,
at The Indian Press, Ltd.,
Benares-Branch.

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परिचय

—:-❀-:—

शिक्षित भारतवासी मात्र श्रीयुत स्वामी विवेकानन्द के नाम और काम से परिचित हैं। आपने वङ्ग-भूमि को अपने जन्म से पवित्र किया था और वहीं सामयिक उच्च शिक्षा प्राप्त की, जिससे आपके मानसिक भाव तो उन्नत हुए परन्तु आत्मा की तुष्टि न हुई। अपने जीवनोद्देश के अन्वेषण में आप व्यग्र थे ही, इसी अवसर में दैवसंयोग से अथवा भारत के सौभाग्य से आपको परमहंस स्वामी रामकृष्ण जैसे सद्गुरु का आदर्श मिल गया। जैसा आपका उद्देश उच्च था वैसा ही उच्च आदर्श भी आपको मिला। महात्मा रामकृष्णजी के उपदेश और आदर्श से आपके हृदय में ज्ञान का प्रकाश हुआ और आप सांसारिक मोह के आवरण को उल्लंघन करके यथार्थ में स्वामी विवेकानन्द बन गये।

संन्यास धारण करने के पश्चात् उक्त स्वामीजी ने पश्चिम की यात्रा की। आपकी इस यात्रा का उद्देश यह था कि अध्यात्म-विद्या की उस अमृत-धारा से (जिसका स्रोत और केन्द्र सनातन काल से भारतवर्ष रहा है) पाश्चात्य भूमि को (जो प्रकृतिवाद या देहवाद के वायु से शुष्क हो रही थी) संसिक्त और आप्लावित करें। कैसा पवित्र उद्देश था। इसके लिए उक्त महात्मा ने यूरोप और अमेरिका आदि प्रान्तों में जो कुछ उद्योग और यत्न किया,

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परिचय

वह किसी शिक्षित व्यक्ति से छिपा नहीं है। यह स्वामीजी के ही उपदेश का प्रभाव है कि आज अमेरिका में घर घर वेदान्त की चर्चा है और वहाँ के पुरुष ही नहीं किन्तु स्त्रियाँ भी वेदान्त के रहस्य को जानने के लिए उत्कण्ठित और उत्सुक हैं। वहाँ के अनेक स्त्री-पुरुषों ने स्वामीजी से दीक्षा लेकर वेदान्त के प्रचार का व्रत धारण किया है। इसी व्रत को धारण करके मिस निवेदिता आदि कई स्त्रियाँ इस देश में भी पदार्पण कर चुकी हैं, जिनके आचार-विचार और उद्देश से यहाँ के शिक्षित समुदाय ने प्रायः अपनी सहानुभूति प्रकट की है।

उक्त महात्मा का उद्देश क्या था और उन्होंने उसकी सिद्धि के लिए क्या उद्योग किया, उनके आचार-विचार कैसे थे ? इन बातों से प्रायः हिन्दी-पाठक अनभिज्ञ हैं। कारण यह कि उनका सारा वर्क (काम) देशकालानुसार अँगरेज़ी भाषा में है। अतः हिन्दी पाठकों के परिचयार्थ प्रशंसित स्वामीजी के कतिपय व्याख्यानों का ( जो उन्होंने अमेरिका में कर्मयोग पर दिये थे ) हिन्दी-अनुवाद पाठकों की भेंट किया जाता है। इससे हिन्दी-पाठक स्वामीजी के पवित्र सिद्धान्त और उच्च विचारों का अनुभव कर सकेंगे।

यहाँ पर यह निवेदन कर देना भी आवश्यक है कि यह स्वामीजी के व्याख्यानों का शब्दशः अनुवाद नहीं है। प्रत्येक भाषा का पदविन्यास और लेखनप्रणाली का क्रम भिन्न भिन्न होने से तथा एक भाषा के शब्दों का दूसरी भाषा के शब्दों में ठीक ठीक पर्याय न मिलने से उनके आशय को अपने शब्दों और वाक्यों में व्यक्त करने के लिए हम बाध्य हुए हैं। ऐसा करने पर भी

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परिचय

हमने उनके लक्ष्य और तात्पर्य पर पूरा पूरा ध्यान रक्खा है और कहीं कहीं उसकी पुष्टि में अपनी तरफ़ से जो टिप्पणी की है, वह फ़ुटनोट में देदी है। आशा है कि हिन्दी के पाठक इससे लाभ उठा कर हमको सफल-परिश्रम करेंगे।

कानपुर, } अनुवादक
ता० ३१।१२।०६ } बदरीदत्त शर्मा

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सूचीपत्र

पृष्ठ
१—पहला अध्याय—कर्म का मनुष्य-चरित्र पर प्रभाव ...
२—दूसरा अध्याय—निष्काम कर्म का महत्व ... ...१७
३—तीसरा अध्याय—धर्म क्या है ... ... ...३३
४—चौथा अध्याय—परमार्थ में स्वार्थ ... ...४५
५—पाँचवाँ अध्याय—बेलाग रहना ही सच्चा त्याग है ...५६
६—छठा अध्याय—मुक्ति ... ... ...७८
७—सातवाँ अध्याय—कर्म-योग का आदर्श ... ...८५

पहला अध्याय

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ओ३म्

कर्मयोग

पहला अध्याय

कर्म का मनुष्य के चरित्र पर प्रभाव

कर्म एक संस्कृत भाषा का शब्द है जो "कृ" धातु से "मन्" प्रत्यय होकर बनता है । "क्रियते यत्तद् कर्म" जो किया जाय उसको कर्म कहते हैं। व्यवहार में कर्म के फल को भी 'कर्म' शब्द से व्यपदेश किया जाता है। कर्म का विस्तार और महत्त्व यहीं तक सीमाबद्ध नहीं है, किन्तु इसके विशाल वृत्त में कार्य और कारण रूप से वे सब कर्म और उनके विपाक समा जाते हैं जो हमारे भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् तीनों कालों के जीवन से सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु जहाँ तक कर्म-योग का सम्बन्ध है वहाँ तक हमारा तात्पर्य केवल वर्त्तमान जन्म के कर्मों तक सीमाबद्ध रहेगा ।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन का उद्देश्य विवेक अर्थात् ज्ञान है । पूर्वीय दर्शन-साहित्य ने केवल ज्ञान को ही मनुष्य का अभीष्ट सिद्ध किया है। जो लोग सुख या आराम को मनुष्य-जीवन का उद्देश्य समझते हैं वे बड़ी भूल में हैं, क्योंकि सुख का अन्त होता है और उसके पश्चात् दुःख अवश्यम्भावी है । संसार में जितने दुःखमय दृश्य दिखाई दे रहे हैं इन सबका कारण केवल यही है

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कि मनुष्य ने भ्रान्ति से सुख को अपने जीवन का उद्देश्य मान रक्खा है। थोड़े काल में ही विचार करने से मनुष्य को अनुभव होने लगता है कि उसकी गति सुख की ओर नहीं किन्तु ज्ञान की ओर है। हाँ, सुख और दुःख दोनों अपने अपने स्थान पर शिक्षक का काम देते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही से मनुष्य का अनुभव बढ़ता रहता है। यद्यपि सुख और दुःख दोनों परिवर्तन-शील हैं, वे एक सी अवस्था में कभी स्थिर नहीं रह सकते, तथापि अपना यौगिक प्रभाव मनुष्य के अन्तःकरण पर छोड़ जाते हैं और इसी यौगिक प्रभाव के संघात का नाम मनुष्य का चारित्र्य (कैरेक्टर) है। यदि आप किसी व्यक्ति-विशेष के चारित्र्य को निरीक्षण करें तो आपको विदित होगा कि उसका चारित्र्य सिवा उसकी अन्तःकरण की वृत्तियों और वासनाओं की राशि के और कुछ भी नहीं है। इसको देख कर तुम भली भाँति समझ जाओगे कि इस चारित्र्य के बनाने में पुण्य, पाप, शुभ, अशुभ और सुख-दुःख इन सबने बराबर भाग लिया है। किन्तु विशेष दशाओं में सुख की अपेक्षा दुःख ने चारित्र्य-सङ्गठन में सच्चे शिक्षक का काम किया है। संसार में जितने प्रसिद्ध महापुरुष हुए हैं यदि ध्यान देकर उनके जीवन-चरित्र पढ़ोगे तो तुमको मालूम होगा कि दुःख ने विशेष कर उनके जीवन को उच्च और उदार बनाने में बहुत बड़ा काम किया है। दुःख ने सुख की अपेक्षा उनको उत्तम शिक्षायें दीं, निर्धनता ने सधनता की अपेक्षा उनको परिश्रमी और सहनशील बनाया। निन्दा और अनादर के थपेड़ों ने प्रशंसा और श्लाघा की अपेक्षा उनकी छिपी हुई आन्तरिक योग्यता को अधिक उभरने का अवसर दिया।

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पहिला अध्याय ३.

यह ज्ञान, यह विवेक, यह विद्या, मनुष्य में कहीं बाहर से नहीं आई, किन्तु उसका आत्मा स्वयमेव ज्ञान का अधिकरण है। सब कुछ उसमें भरा पड़ा है। मनुष्य के आत्मा में संपूर्ण विद्याओं और कलाओं का कोष छिपा हुआ है, उनका सीखना वास्तव में उन आवरणों को हटा देना है, जिन्होंने आत्मा के उस प्रकाश को ढक रक्खा है। आत्मा के आवरणों को हटा दो, ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित देख पड़ेगी। सीखना, पढ़ना आदि पारिभाषिक शब्द हैं। कहा जाता है कि न्यूटन* ने आकर्षण शक्ति के सिद्धान्त का अनुभव किया। क्या यह सिद्धान्त किसी कोने में छिपा हुआ न्यूटन की प्रतीक्षा कर रहा था ? नहीं। इस सिद्धान्त का अंकुर उसके हृदय में वर्त्तमान था जो अन्य संस्कारों से दबा हुआ पड़ा था। समय आया और फल-पतन रूप कर्म की रगड़ से वह आग, जो दबी हुई पड़ी थी, एकाएक प्रज्वलित हो गई। जो कुछ ज्ञान संसार में फैला हुआ है वह सब मनुष्य के आत्मा से निकला है। तुम्हारा हृदय सृष्टि के असंख्य पदार्थों का अपरिमित कोष है। बाह्य जगत् केवल सांकेतिक है, उसके संकेतों को पाकर तुम अपने अन्तःकरण की परताल करने लगते हो। तुम्हारा अन्तः-करण ही वास्तव में तुम्हारी शिक्षा-पुस्तक है। वृक्ष की शाखा


* सर आइज़िक न्यूटन एक पाश्चात्य दार्शनिक हुआ है, जिसने पृथ्वी की आकर्षण-शक्ति का पता लगाया। जब वह अपनी वाटिका में बैठा हुआ था, वृक्ष से एक सेब गिरा। वह उसके पतन के कारण का अनुसन्धान करने लगा और इस परिणाम पर पहुँचा कि पृथ्वी प्रत्येक वस्तु को अपनी ओर खींचती है।

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कर्मयोग

से सेब गिरा, न्यूटन के अन्तःकरण को एक संकेत मिल गया और वह अपने मन में विचार करने लगा। उसने अपने पूर्व संस्कारों की शृङ्खला में एक नवीन कड़ी देखी और उसी का नाम आकर्षण-शक्ति रख लिया। यह ज्ञान न तो सेब में था और न पृथ्वी में; किन्तु उसके हृदय में था। वस्तुतः प्रत्येक ज्ञान (चाहे वह बाह्य हो या आन्तरिक, सांसारिक हो या आध्यात्मिक) मनुष्य के अन्तःकरण में रहता है। किन्हीं मनुष्यों में वह ढका हुआ रहता है, उसका आवरण शीघ्र नहीं उतरता। जब शनैः शनैः यह आवरण उतरने लगते हैं, तभी यह कहा जाता है कि हम सीख रहे हैं। मनुष्य की ज्ञानोन्नति में उत्तरोत्तर यही रहस्य काम करता रहता है। जिस मनुष्य के आवरण टूट जाते हैं वही तत्त्वज्ञानी और विवेकी हो जाता है और जिसके बने रहते हैं, वह अज्ञानी और मूर्ख कहलाता है। जिसके समस्त आवरण टूट गये, वह सर्वज्ञ बन जाता है। संसार में ऐसे बहुत से सर्वज्ञ हुए हैं और इस कल्प में भी उत्पन्न होंगे।

जिस प्रकार पत्थर में आग रहती है उसी तरह अन्तःकरण में ज्ञान रहता है। जैसे बाहर की रगड़ पाकर पत्थर में से आग झड़ने लगती है, वैसे ही बाह्य कर्म के संघर्षण से ज्ञानाग्नि प्रदीप्त होता है, तथा शिक्षा और उपदेश के इन्धन से बढ़ता जाता है। हमारे सारे संस्कारों, कर्मों और वासनाओं में यही नियम काम कर रहा है। हमारा हर्ष और शोक, निन्दा या स्तुति, सुख या दुख, शुभ या अशुभ जो कुछ भी परिणाम होता है वह सब इसी नियम की सत्यता को प्रकट कर रहा है। यदि हम तनिक गम्भीर दृष्टि से

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पहला अध्याय

अपने स्वरूप की परताल करने लगें तो यह भेद अभी खुल जावे कि सारी रचनायें (चाहे आध्यात्मिक हों या आधिभौतिक) बाह्य संकेतों से उद्बोधित हो कर हमारे भीतर से निकली हैं, जिनका परिणाम हमारी वर्त्तमान अवस्था और वर्त्तमान जीवन है। इन सब के संघात का नाम कर्मयोग है।

ये बाह्य संकेत, जो हमारे आत्मा के उद्बोधक हैं, वास्तव में कर्म ही हैं। हम जब तक जीवित रहते हैं, कुछ न कुछ कर्म करते ही रहते हैं। मैं तुमसे बातचीत कर रहा हूँ, यह कर्म है। तुम ध्यान दे कर सुन रहे हो, यह भी कर्म है। श्वास लेना, चलना, फिरना, बोलना ये सब कर्म हैं। जो कुछ हम करते हैं, जो कुछ हम सोचते हैं, जो कुछ हम समझते हैं; ये सब कर्म ही कहलाते हैं। और ये सब कर्म अपनी स्मृति का प्रभाव हम में छोड़ जाते हैं।

कोई कोई कर्म ऐसे हैं जो बहुत से और भिन्न भिन्न कर्मों के संघात होते हैं। यदि हम समुद्र के तट पर खड़े होकर तटस्थ चट्टानों से लहरों के टकराने का शब्द सुनें तो हमको मालूम होगा कि बड़े ज़ोर की आवाज़ आ रही है। ये लहरें एक एक नहीं हैं किन्तु अगणित छोटी छोटी लहरें आपस में मिल गई हैं। जब तक ये सब लहरें मिल कर समष्टिरूप से चट्टान से नहीं टकरातीं तब तक हम इनकी आवाज़ नहीं सुन सकते। यही दशा तुम्हारे हृदय के धड़कने की है। इसमें भी कर्मों के संघात का प्रभाव काम कर रहा है। बहुत से कर्म जो छोटे छोटे कर्मों के संघात से बनते हैं उनको हम अनुभव भी करते हैं। यदि तुम किसी बड़े आदमी के आचरण को जाँचना चाहते हो तो उसके बड़े बड़े कामों को मत

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कर्मयोग

देखो। मूर्ख से मूर्ख और निर्बुद्धि से निर्बुद्धि मनुष्य भी किसी न किसी समय महान् और बुद्धिमान् बन जाता है। हमें मनुष्य के साधारण कामों को देखना चाहिए। प्रात्यहिक छोटे छोटे और तुच्छ कामों को देख कर उसके आचरण का पता लग जायगा। क्योंकि यही काम उसकी मानसिक वृत्तियों को बनाते रहते हैं। कभी कभी ऐसा भी देखने में आता है कि छोटे छोटे आदमी समय पाकर बड़े बन जाते हैं। यथार्थ में बड़ा आदमी वह है जो प्रत्येक दशा में बड़ा है और जहाँ कहीं भी जिस दशा में नियुक्त किया जावे, वहाँ उस दशा में बड़ाई के काम करता रहे।

मनुष्य के आचरण पर कर्म का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव ऐसा बलिष्ठ होता है कि इसका रोकना बड़ा कठिन है। यों समझ लो कि इस संसार के वृत्त में मनुष्य एक केन्द्र है, जो संसार की सारी शक्तियों को अपनी ओर खींच रहा है। खींच कर और सबको मिला कर फिर उनको भारी लहर या धार के स्वरूप में फेंक देता है। मनुष्य में बल है और ज्ञान है, जिससे वह संसार को अपनी ओर खींचे हुए है। पुण्य-पाप, सुख-दुख सब इसी की ओर खिंचे हुए हैं और इसी से चिपटे हुए हैं। इन्हीं साधनों से यह अपनी मानसिक वृत्तियों की तरङ्ग-पूर्ण धारा को बनाता है, जिसको चरित्र ( कैरेक्टर ) कहते हैं; और फिर इसको बाहर की ओर फेंक देता है। जहाँ इसमें भीतर की ओर खींचने की शक्ति है वहाँ बाहर की ओर फेंकने में भी यह कुशल है।

संसार के समस्त व्यवहार, मनुष्य-समाज के सम्पूर्ण प्रस्ताव और हमारे आस पास जो कुछ हो रहा है यह सब, मनुष्य के

पहला अध्याय ७

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पहला अध्याय ७

विचार का फल और मानसिक शक्ति का चमत्कार है। यन्त्र या औज़ार, नगर या जहाज़ ये सब मनुष्य की विचार-शक्ति से उत्पन्न हुए हैं। यह विचार-शक्ति चारित्र्य से बनती है और चरित्र का उत्पादक कर्म है। जैसा कर्म होगा, वैसा ही चरित्र बनेगा और जैसा चरित्र बनेगा, वैसी ही मानसिक शक्ति उत्पन्न होगी। संसार में बलवान् और प्रभावशाली वे लोग हुए हैं, जो बड़े बड़े काम करनेवाले थे। इनकी मानसिक शक्ति भी विचित्र थी, जिससे आन की आन में संसार की काया पलट गई। यह मानसिक शक्ति इनमें लगातार काम करने से पैदा हुई थी। क्या बुद्धदेव आदि जैसे व्यक्तियों की मानसिक शक्ति एक जन्म के कर्म का फल थी? नहीं। संसार को मालूम है कि बुद्ध का बाप किस प्रकार का मनुष्य था। कोई नहीं बतला सकता कि उसने अपने जीवन में कोई काम भी मनुष्य की भलाई के लिए किया हो। बुद्ध ※ के पिता एक छोटे से मण्डल के अधीश्वर थे, उनके जैसे मण्डलेश लाखों इस पृथ्वी पर हो चुके हैं। यदि यह कहा जावे कि मनुष्य में मानसिक शक्ति माता-पिता के अंश से आती है तो आप कैसे स्वीकार करेंगे कि बुद्ध के जैसी प्रबल मानसिक शक्ति एक साधारण राजा के अंश से परिणत हुई थी। सम्भव है कि उसके सेवक और चाकर ही उसकी आज्ञा का पालन न करते हों। परन्तु यहाँ देखिए उसके पुत्र का प्रताप और गौरव विलक्षण है। आधा संसार अब तक उसके नाम की उपासना कर रहा है। बुद्ध में यह प्रबल मान-


※ बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोदन था, जो कपिलवस्तु का एक माण्डलिक राजा था। उसकी रानी अर्थात् बुद्ध की माता का नाम माया देवी था।

CC-0. In Public Domain. Funding by IKS-MoE

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कर्मयोग

सिक शक्ति कहाँ से आई ? पैतृक अंश (क़ानून विरासत) से कभी इस प्रश्न की मीमांसा नहीं हो सकती। जब हम देखते हैं कि अयोग्य पिताओं से योग्य पुत्र और योग्य पिताओं से अयोग्य पुत्र उत्पन्न हुए हैं, तब हम पैतृक अंश को कैसे इसका कारण मान सकते हैं ? यह कभी एक जन्म का काम नहीं है। किन्तु इस शक्ति के विकास में हज़ारों जन्म लगे होंगे; लाखों वर्ष तक क्रमशः यह उन्नति होती रही, अन्त में जा कर बुद्ध के आकार में संसार को उसका परिचय मिला और इतनी शताब्दियों के बीत जाने पर भी अब तक उसका प्रभाव वैसा ही वर्तमान है।

और, यह सिद्धि त्याग से प्राप्त होती है, परन्तु जब तक कुछ पास न होगा, त्याग कोई क्या और किसका करेगा ? अतएव जो मनुष्य कमाई नहीं करता उसको कुछ नहीं मिलता। यह सृष्टि का नियम है और यह नियम सर्वत्र काम कर रहा है। कोई मनुष्य धनवान् होने के लिए आयु भर लाखों छल-छिद्र करता रहे, हज़ारों को धोखा दे; पर अन्त में उसे मालूम हो जाता है कि धन पर उसका कोई अधिकार नहीं था और इसलिए उसका जीवन दुःख और अशान्ति का जीवन बना रहा। हम भौतिक ऐश्वर्य और शारीरिक सुख के चाहे जितने सामान इकट्ठे करते चले जावें, पर हमारा अपना अधिकार केवल उस पर होता है जिसको हमने अपने परिश्रम से उपार्जन किया हो। मूर्ख लोग हज़ारों पुस्तकों से अपने पुस्तकालय को भर देते हैं, परन्तु वे पढ़ उन्हींको सकते हैं जिनको पढ़ने का उन्होंने अधिकार प्राप्त किया है और यह अधिकार हमको अपने कर्मों से मिलता है। हमारे कर्म ही हमारे भाग्य

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पहला अध्याय ६

और अधिकार की व्यवस्था किया करते हैं। हम अपनी वर्तमान सत्ता, वर्तमान अवस्था, और वर्तमान दशा के आपही निर्माता और उत्तरदाता हैं। हम जो कुछ होना चाहते हैं, उसकी इच्छा ही नहीं, किन्तु शक्ति भी हम में है। यदि हमारी वर्त्तमान दशा हमारे पिछले जीवन के कर्मों का फल है तो इससे सिद्ध हो सकेगा कि आगे चल कर हम जैसे बनने की इच्छा करेंगे या जैसे बनने की हम में शक्ति है हम वैसे ही बन जावेंगे। इसलिए हमको यह जान लेना चाहिए कि कौन से कर्म हमारे लिए हितकर हैं ? यदि कहो कि कर्म के विषय में विचार करने या उसके जानने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार के कर्म कर रहा है। ॐ स्मरण रक्खो, इस प्रकार की बातों से काम नहीं चलता। कर्म के सम्बन्ध में भगवद्गीता का उपदेश है कि विचार और बुद्धिमत्ता के साथ कर्म करने चाहिएँ। कर्म करने से पहले कर्मकर्त्ता को यह जान लेना चाहिए कि यह कर्म, जिसको मैं करना चाहता हूँ, कर्तव्य है या अकर्तव्य। इसका परिणाम क्या


✻ केवल यह जान लेने से कि कुछ न कुछ कर्म हम करते ही रहते हैं और बिना कर्म के कोई नहीं रह सकता, मनुष्य का काम नहीं चल सकता। क्या वह मनुष्य जो यह समझ कर कि भोजन मुझे करना ही है और बिना इसके नहीं बीतेगी, जो कुछ सामने आ जाय उसे खाने लगे, मूर्ख नहीं कहलावेगा ? भोजन हमारे लिए आवश्यक है तभी तो हमें इसके सम्बन्ध में यह जानने की आवश्यकता है कि यह खाद्य है, समयानुकूल है और इसके पचाने की हममें शक्ति है, इसी प्रकार जब कर्म भी हमारे लिए आवश्यक है तो उसके सम्बन्ध में हमको उसकी कर्त्तव्यता, परिणाम, देशकालानुकूलता और अपनी योग्यता तथा शक्ति का विचार अवश्यमेव करना चाहिए।

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१० कर्मयोग

होगा ? इत्यादि । गीता में जहाँ कहीं केवल कर्म के लिए प्रेरणा की गई है, उसका अभिप्राय यह है कि मन की शक्ति, जो दबी पड़ी है, उभर खड़ी हो और सोया हुआ आत्मा जाग उठे । यह शक्ति प्रत्येक मनुष्य के मन में है और ज्ञान भी उसके आत्मा में है। कर्म के मुद्गर की चोट बराबर इसलिए लगाई जाती है कि वह आलस्य की निद्रा को त्याग कर कर्म करने के लिए उद्यत हो जावे ।

मनुष्य किसी-न-किसी प्रयोजन को सामने रख कर कर्म करता है । और कोई कर्म ऐसा नहीं होता जिसका कुछ न कुछ प्रयोजन न हो । जो ख्याति के भूखे हैं, वे प्रसिद्धि ( नामवरी ) के लिए कर्म करते हैं । जो धन की चाह रखते हैं, वे धन की प्राप्ति के लिए कर्म करते हैं । जिनको अधिकार और आधिपत्य की भूख है, वे इनके लिए कर्म करते हैं । कोई स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, उनके कर्म स्वर्गप्राप्ति के लिए होते हैं। कोई मनुष्य चीनियों की तरह अपने पीछे नाम छोड़ जाना चाहते हैं । चीन में यह दस्तूर है कि मरने के बाद मनुष्य को उपाधि दी जाती है । चीनियों में जब कोई अच्छा कर्म करता है तब उसके मुर्दा बाप-दादा को उपाधि मिलती है । किन्हीं लोगों की यह कामना होती है कि मरने के बाद उनकी क़ब्र पर विशाल मन्दिर बनाया जावे, वे इसी के लिए कर्म करते हैं । कोई पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए कर्म करते हैं । पहले बुरे कर्म किये, फिर एक मन्दिर बनवा दिया । पूजारी को कुछ भेंट दे दी और स्वर्ग के अधिकारी बन गये । निदान कर्म करने के भिन्न भिन्न और असंख्य प्रयोजन हैं ।

किन्तु सबसे उत्तम बात यह है कि मनुष्य कर्म को केवल कर्म

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पहला अध्याय

११

समझ कर करे। प्रत्येक देश में ऐसे धर्मात्मा पुरुष होते हैं, जो न ख्याति के भूखे हैं न नाम के और न स्वर्ग की इच्छा रखते हैं; परन्तु कर्म बराबर करते रहते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि निष्काम कर्म का परिणाम सदा अच्छा ही होता है। ※ ऐसे मनुष्य भी संसार में वर्त्तमान हैं जो पवित्र और उच्च भावों को धारण किये हुए दीनोद्धार और परोपकार में अपने जीवन को लगाते हैं।

जो लोग प्रसिद्धि और बड़ाई के लिए कर्म करते हैं, उनको कर्म का फल देर में मिलता है। बहुधा हमको बड़ाई या नामवरी उस समय मिलती है, जब हम बूढ़े हो जाते हैं और जीवन लगभग मरणासन्न ही हो जाता है। यदि मैं अपने सारे आयु भर ख्याति के लिए कर्म करता रहूँ तो अन्त में देखूँगा कि मुझको बहुत ही कम लाभ हुआ है। इसी प्रकार और और प्रयोजनों के लोभ से जो कर्म करते हैं, उनकी भी यही दशा है। हाँ, जो बिना किसी प्रयोजन के कर्म करता है, उसका फल अनन्त और अमिट है। यदि कहो कि जब उसकी कोई इच्छा ही नहीं तो उसे क्या फल मिलेगा और न उसने फल के लिए कर्म किया है तो इसका उत्तर यह है कि


※वेद में भी जहां मनुष्य को यावज्जीवन कर्म करने की आज्ञा दी गई हैं वहाँ कर्म को केवल कर्म समझ कर ही करने की आज्ञा है। क्योंकि सकाम (किसी प्रयोजन या फल को लक्ष्य में रख कर) जो कर्म किये जाते हैं वे मनुष्य के सांसारिक बन्धनों के हेतु होते हैं। परन्तु जो कर्म निष्काम, बिना फल की आशा के, कर्म को केवल कर्त्तव्य समझ कर, किये जाते हैं (यद्यपि फल उनका भी होता है और कर्ता को भोगना भी पड़ता है, तथापि) वे मनुष्य के बन्धन के कारण नहीं हो सकते, प्रत्युत मुक्ति के लिए उपयोगी होते हैं।

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कर्मयोग

कर्त्ता की फल में बुद्धि न होने से कर्म निष्फल नहीं हो जाता, प्रत्युत फल की आशा से जो कर्म किया जाता है, उसकी अपेक्षा उसमें हज़ार गुना फल देने की शक्ति हो जाती है। कठिनता यह है कि मनुष्य अधीर हो जाता है, जिस से दृढ़ता के साथ लगातार कर्म नहीं करता। मनुष्य की आध्यात्मिक दशा पर दृष्टिपात करने से भी निष्काम कर्म का मूल्य अधिक जँचता है। प्रेम, सत्यता और त्याग ये आत्मा के केवल बाह्य लिङ्ग नहीं हैं, किन्तु वास्तव में हमारे जीवन के सबसे उच्च आदर्श हैं। इनको धारण करने से हृदय के भाव शुद्ध और मानसिक शक्ति प्रबल होती है। जो मनुष्य निष्काम कर्म करेगा और मन को वश में रक्खेगा उसके कर्म बड़े प्रभावशाली होंगे। क्योंकि आत्म-संयम सम्पूर्ण बाह्य क्रियाओं से अधिक महत्व रखता है। कल्पना करो कि चार घोड़ों की गाड़ी बड़े वेग से दौड़ी चली जारही है; साईस घोड़ों को लगाम खींच कर रोक रहा है। बताइए किस में अधिक बल है ? घोड़ों के वेग से दौड़ने में या साईस के रोकने में ? एक गेंद हवा में उछल कर कुछ दूर जाती है फिर पृथिवी पर गिर पड़ती है। दूसरी दीवार से टकरा कर वहीं की वहीं रह जाती है। यही दशा समस्त सकाम और स्वार्थ के कर्मों की है। इन सब कर्मों का यह परिणाम होगा कि शीघ्र या देर में ये सब विलीन हो जावेंगे और फिर तुम्हारे पास लौट कर न आवेंगे। परन्तु यदि अपने मन को रोका जावे तो अपने आप आत्मा की शक्ति बढ़ेगी। निष्काम कर्म करना यथार्थ में अपने मन को रोकना है। इस प्रकार के संयम से आत्मा सुशिक्षित होता है और बुद्धि की जैसी प्रबल मानसिक शक्ति

पहला अध्याय १३

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पहला अध्याय १३

रखनेवाली व्यक्तियाँ प्रकट होती हैं। साधारण जन इस रहस्य को नहीं समझते, पर उनको अन्य मनुष्यों पर अधिकार जमाने या शासन चलाने की इच्छा रहती है। कुछ काल धैर्य रक्खो और इस बाह्य अधिकार की वासना को, जो तुम्हें भ्रान्ति में डालती है, रोको और जब तुम अपनी इस इच्छा को रोकने में समर्थ हो सकोगे तब तुम संसार पर अपना अधिकार कर सकोगे। मनुष्य थोड़े से स्वार्थ के लिए लोगों को धोखा देता है, अनर्थ करता है। यदि वह कुछ दिन अपने आपको संयम में रख सके तो सारे संसार को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। परन्तु हम सब लोग भूले हुए हैं, हममें से बहुत से मनुष्यों की दृष्टि कुछ वर्षों से आगे नहीं जाती। जैसे पशुओं को थोड़ी दूर तक अपने आगे के सिवा और कुछ दिखलाई नहीं देता। वैसी ही हमारी दशा है। हमारा संसार बहुत ही संकीर्ण और हमारे विचार अत्यन्त ही क्षुद्र हैं। हमारी आत्मीयता केवल अपने कुटुम्ब या अधिक से अधिक सम्बन्धियों तक परिमित है। इससे अधिक देखने की न हम में शक्ति है और न सुध है। यही कारण है कि हम दुराचारी और दुश्चरित्र बन जाते हैं।

छोटे से छोटे काम को भी तुच्छ दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जिस मनुष्य के संस्कार अच्छे नहीं हैं, वह ख्याति के लिए या किसी और प्रयोजन से ही कर्म करे, आलसी होकर न बैठे। प्रत्येक मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारा उद्योग का पैर आगे की ओर बढ़ा चले और कर्म करते हुए (चाहे किसी उद्देश्य से करे) हम उसके तत्त्व को भी समझते जायें कि कर्म क्या है और उसका अभिधेय क्या है? और यह बात भी हमको जान लेनी चाहिए कि

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कर्मयोग

केवल कर्म के करने का हमको अधिकार है, उसके फल या विपाक को (यद्यपि वह अवश्य होगा) अपने इच्छानुसार बनाने का हमको अधिकार नहीं है। फल की इच्छा को त्याग दो। जब किसी मनुष्य की सहायता करने का अवसर आवे, कभी यह बात ध्यान में न लाओ कि उसका बर्ताव तुम्हारे साथ कैसा रहा है। यदि तुम कोई उत्तम या महान् कर्म करना चाहते हो तो इस कर्म का फल हमारे अनुकूल होगा या प्रतिकूल ? कभी भूल कर भी इसकी चिन्ता न करो।

धर्म के उक्त आदर्श तक पहुँचना एक बड़ा कठिन काम है। सबसे पहले अभ्यास की आवश्यकता है। हमको चाहिए, नित्य कर्म का अभ्यास करते रहें। कोई मनुष्य एक क्षण भर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। जिसको शान्ति और सुख कहा जाता है उसका समझना कोई सहज काम नहीं है। एक मनुष्य प्रवृत्ति-मार्ग के आन्दोलन में हाथ पाँव मारता हुआ जब कभी सामाजिक जीवन के गम्भीर आवर्त्त (भँवर) में पड़ता है, डूबने लगता है।

दूसरा मनुष्य जिसने निवृत्ति-मार्ग का आश्रय लेकर संसार को त्याग देने का प्रण कर लिया है, प्रत्येक वस्तु उसे तुच्छ और असार दीख पड़ती है। परन्तु इन दोनों में से कोई भी आदर्श का काम नहीं दे सकता। यदि कोई अयोग्य मनुष्य झूठे त्याग और वैराग्य की आड़ लेकर त्यागी तथा वैरागी बन जावे तो जब कभी संसारावर्त्त की लहरों के थप्पड़ उस पर पड़ने लगेंगे, तब वह इकबारगी कुचल दिया जायगा। जो मछलियाँ समुद्र के तल में रहती हैं, यदि कभी भूल से ऊपर चली आती हैं तो लहरों के तमाचे खाकर टुकड़े टुकड़े हो जाती हैं। उनका कहीं पता नहीं