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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

दूसरा अध्याय २५

दूसरा अध्याय २५

क्या है ? "प्रकृति आत्मा के लिए है, आत्मा प्रकृति के लिए नहीं।" यही सांख्य की शिक्षा का सार है। प्रकृति की विद्यमानता केवल आत्मा की शिक्षा के लिए है। इसके सिवा और उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं है। प्रकृति इसलिए है कि आत्मा को ज्ञान की प्राप्ति हो और ज्ञान प्राप्त करके वह मोक्ष पद को पालेवे। यदि हम इस रहस्य को सदा स्मरण रक्खेंगे तो प्रकृति कभी हमारे लिए बन्धन का कारण न होगी। हम बराबर समझते रहेंगे कि प्रकृति हमारे स्वाध्याय के लिए एक पुस्तक है जिसका हमें अध्ययन करना है। और जहाँ हमको विद्या प्राप्त हो गई, फिर पुस्तक से कुछ प्रयोजन नहीं रहता। किन्तु हम भ्रान्ति में पड़ कर अपने आपको प्रकृति समझ लेते हैं। हम सोचने लगते हैं कि आत्मा प्रकृति के लिए है और वह मांस और चर्म का पिण्ड है। जीना खाने के लिए है और खाना जीने के लिए नहीं है। हम रात-दिन इसी भ्रान्ति में पड़े हुए हैं, अर्थात् अपने आपको शरीर और प्रकृति मान रहे हैं। यही कारण है कि हम इसके बन्धन से छूट नहीं सकते। भला कैसे छूट सकते हैं, जब कि हम इसके दास या सेवक बन कर काम करते हैं ?

वेदान्त की शिक्षा का सार यह है कि तुम स्वामी और स्वाधीन बन कर स्वामित्व और स्वाधीनता की दशा में काम करो। प्रकृति के सेवक और उपासक न बनो। काम सदा करते रहो, पर वह भृत्य का काम न हो। क्योंकि जो लोग दीन या अधीन होकर काम करते हैं, उनके काम में स्वार्थ की मात्रा अधिक होती है। काम स्वाधीनता और प्रेम के साथ होना चाहिए। जब तक स्वाधीनता न हो, तब तक सच्चा प्रेम हो ही नहीं सकता, दास में कभी सच्चा

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प्रेम न होगा। तुम उसे बन्धन में डाल कर काम लेते रहो, वह काम करता रहेगा, परन्तु उसका काम प्रेमपूर्वक न होगा। इसी प्रकार जब तक हम अर्थों के दास एवं मन और इन्द्रियों के अधीन होकर अपने लिए काम करते हैं, तब तक सच्चा प्रेम और विश्वास हमारे हृदय में उत्पन्न हो न होगा। ऐसे ही जो काम अपने सम्बन्धियों और मित्रों के लिए किया जाता है, उसमें भी स्वार्थ है और जहाँ स्वार्थ है वहाँ बन्धन और दुःख है। केवल निष्काम कर्म में ही सच्चा प्रेम रहता है और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहीं सच्चा सुख और सच्ची शान्ति है। वास्तविक जीवन, वास्तविक ज्ञान और वास्तविक प्रेम का परस्पर नित्य सम्बन्ध है, और सच तो यह है कि ये तीनों एक ही हैं। जहाँ एक की स्थिति होगी, वहाँ दूसरे भी अवश्य होंगे। यथार्थ में ये तीनों एक ही वस्तु के तीन अंग हैं। इन्हीं को सत्, चित्, आनन्द भी कहते हैं। सत् हमारा जीवन है, चित् उसमें ज्ञान है और आनन्द ही प्रेम है, जिसको हमारा हृदय अनुभव करता है। जहाँ ईर्ष्या या दुःख है, वहाँ सच्चा प्रेम कदापि नहीं रहता। कल्पना करो कि एक मनुष्य किसी स्त्री पर आसक्त है। वह चाहता है कि वह स्त्री सिवा उसके दूसरी ओर न देखे। ईर्ष्या की आग उसके हृदय में भड़कती रहती है। वह स्त्री को सर्वथा अपने अधीन रखना चाहता है। वह आप भी उस स्त्री का दास है और उस स्त्री को भी अपना दास बनाना चाहता है। यह प्रेम नहीं है। यह दास की नीच और स्वार्थमयी वासना का फल है। इससे प्रेम की अवज्ञा होती है। यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार काम नहीं करती तो उसको दुःख होता है। प्रेम में दुःख

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कहाँ ? प्रेम में तो आनन्द ही आनन्द है। जिस प्रेम में आनन्द नहीं है उसको कभी भूल कर भी प्रेम न कहो। प्रेम के विषय में संसार में बड़ी भ्रान्ति फैली हुई है। जब तुमको अपनी पत्नी, अपने पति और अपने पुत्र-मित्रादि से प्रेम करने में दुःख या ईर्ष्या उत्पन्न न हो और न स्वार्थ का भाव मन में आने पावे, तब तुम समझो कि तुम्हारा सच्चा प्रेम है और तुम निःसङ्ग और स्वाधीन बन सकते हो।

कृष्ण भगवान् कहते हैं—हे अर्जुन ! “यदि मैं थोड़ी देर के लिए भी कर्म करना छोड़ दूँ तो यह जगत् उत्सन्न हो जावे। यद्यपि मुझको कुछ कर्त्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, क्योंकि मैं आप्त-काम हूँ। न कर्म और उसके फल में मेरी वासना है, तथापि मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि मुझे जगत् से प्रेम है। और इस प्रेम से ही सच्चा त्याग उत्पन्न होता है।” जहाँ भौतिक सम्बन्ध होता है, जहाँ मनुष्य सांसारिक विषयों में लिप्त रहते हैं वहाँ केवल शारीरिक सम्बन्ध रहता है। शरीर के परमाणुओं में आकर्षण उत्पन्न होता है, जिसके कारण दो भिन्न भिन्न शरीर थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से मिलते हैं और यदि उनका मिलाप नहीं होता तो दुःख उत्पन्न होता है। पर जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ भौतिक सम्बन्ध का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। सच्चा प्रेम रखनेवाले मनुष्य चाहे हज़ारों कोस के अन्तर पर रहते हों, पर उनके प्रेम की दशा एक जैसी होगी। ऐसा प्रेम कभी मरता नहीं, चाहे शरीर भले ही नष्ट हो जावें। और न कभी उसमें दुःख की आशंका होती है।

इन नैष्कर्म्य पदवी के प्राप्त करने में कई जन्म लग जाते हैं। परन्तु जहाँ यह प्राप्त हो गई, मानो मनुष्य-जीवन का अभीष्ट सिद्ध

२८ कर्मयोग

हो गया। प्रेम का कोष हाथ आ गया और हम स्वाधीन हो गये। प्रकृति का बन्धन टूट गया। हम प्रकृति को उसके वास्तविक रूप रङ्ग में देखने लग जायँगे और फिर वह हमारे बन्धन के लिए नई कड़ियाँ और नई ज़ञ्जीरें न बना सकेगी। जहाँ अधीनता है, वहीं स्वार्थ-बुद्धि है और जहाँ स्वार्थ-बुद्धि है, वहीं फल की इच्छा है। जो मनुष्य स्वाधीन होकर प्रेम के साथ काम करता है, उसको कभी फल की इच्छा न होगी। और जब कि उसका कोई स्वार्थ नहीं है तो कर्म-फल उसके लिए दुःखदायक नहीं हो सकता।

क्या तुम कभी अपने पुत्रों से भी प्रेम का बदला चाहते हो? कभी नहीं। यह तुम्हारा धर्म है कि तुम उनके लिए काम करो। ऐसे ही जहाँ तुमको किसी मनुष्य-विशेष या नगर-विशेष या देश-विशेष के लिए काम करने की आवश्यकता हो वहाँ दृढ़ता और प्रेम के साथ काम करो। पर इनके साथ भी तुम्हारा बर्ताव वैसा ही हो, जैसा अपने लड़कों के साथ हुआ करता है। बदला, सेवा का मूल्य या फल की कभी इच्छा न करो। यदि तुम निःस्वार्थ लोगों को दान देते हो, निष्काम संसार का उपकार कर रहे हो तो विश्वास रक्खो कि तुम्हारा कर्म कभी बन्धन का हेतु न होगा। बन्धन केवल वहाँ होता है, जहाँ फल की इच्छा रहती है।

सेवक की भाँति काम करने में स्वार्थ-बुद्धि कभी जा नहीं सकती और वही बन्धन का हेतु है। यदि तुम स्वामी की भाँति कार्य करो तो उस काम का सच्चा प्रेम और आनन्द होगा। हम लोग प्रायः न्याय और अधिकार के विषय में वाद-विवाद करते रहते हैं। पर हम देखते हैं कि संसार में न्याय और अधिकार की वातें बच्चों

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की बकवास से अधिक गौरव नहीं रखतीं। केवल दो वस्तुएँ हैं, जो मनुष्य के चारित्र्य की रचना या रक्षा करती हैं। एक दया और दूसरी शक्ति। शक्ति के घमण्ड में रहना और उसका अभ्यास करना स्वार्थ-परता है। प्रत्येक पुरुष या स्त्री अपने अधिकार और शक्ति से लाभ उठाने की चिन्ता में अहर्निश व्यग्र रहते हैं। दया स्वर्ग का द्वार है, जिसको धर्मात्मा बनना हो वह दया करे। न्याय, अधिकार और शक्ति इन सब का यथार्थ उपयोग भी दया पर निर्भर है। कर्म का बदला चाहने से आत्मिक उन्नति के मार्ग में रुकावट उत्पन्न होती है, जिससे आत्मा दुःखित होता है। फल से कुछ सम्बन्ध न रख कर केवल कर्म करने से बन्धन नहीं होता।

एक दूसरा उपाय भी है जिससे दया और निःस्वार्थ उदारता को चरितार्थ किया जा सकता है। वह यह है कि कर्म को "उपासना" समझ कर करो। यदि तुमको एक ईश्वर पर विश्वास है तो यह कर्म ही उसकी उपासना है। अतएव कर्म करो और उस का फल ईश्वर के अर्पण कर दो। जब तुम ईश्वर के उपासक हो तो फिर तुमको कब यह अधिकार है कि उससे उन कर्मों के फल की वाञ्छा रक्खो, जो तुम संसार के लिए कर रहे हो। ईश्वर स्वयं बिना किसी के सम्बन्ध और बिना किसी स्वार्थ के काम करता है। इसी प्रकार तुम भी करो। जैसे जल कमल-पत्र को तर नहीं कर सकता वैसे ही निष्काम कर्म करनेवालों के लिए कर्म बन्धन का हेतु नहीं होता। निःस्वार्थ पुरुष चाहे बड़े से बड़े नगर में रहे, चाहे वह निरन्तर पापियों से घिरा रहे, परन्तु वह कभी पाप-कर्म न करेगा।

३० कर्मयोग

निम्नलिखित आख्यान से इसका विशेष विवरण होगा। जब कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया तब पाण्डवों ने बहुत बड़ा यज्ञ किया, जिसमें दीनों को बहुत कुछ दान दिया गया। सब को आश्चर्य हुआ, क्योंकि कहीं ऐसा दान न देखने में आया न सुनने में। जब यज्ञ समाप्त हो गया तब एक नकुल वहाँ आया। उसका आधा शरीर सोने का था और आधा भूरे रङ्ग का। वहाँ आकर वह यज्ञ में लोटने लगा। थोड़ी देर के पश्चात् वह यज्ञ-कर्त्ताओं को सम्बोधन करके कहने लगा—“तुम सब के सब झूठे और धोखा देनेवाले हो। यह यज्ञ नहीं है।” यज्ञ-कर्त्ताओं ने कहा--“तुम क्या कहते हो ? क्या कभी पहिले किसी यज्ञ में इतना दान हुआ था ? देखो कङ्गाल धनी और दुःखी सुखी बन गये।” न्यौले ने उत्तर दिया--“सुनो, एक छोटा सा गाँव था। उसमें एक दीन ब्राह्मण सकुटुम्ब रहता था। इसके कुटुम्ब में चार प्राणी थे, एक वह आप, दूसरी उसकी स्त्री, तीसरा उसका पुत्र और चौथी उसकी पुत्रवधू। इनकी आजीविका भिक्षा पर निर्भर थी। दैव-दुर्विपाक से देश में तीन वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा। वह ब्राह्मण अत्यन्त ही दरिद्र था, इसलिए उसके कष्ट की कोई सीमा न रही। पाँच दिन तक बराबर चारों प्राणियों ने निराहार व्रत किया। छठे दिन किसी ने उनको थोड़े से यव (जौ) दिये, जिनके सत्तू बनाये गये। ब्राह्मण ने उचित रीति पर उसके चार भाग कर दिये। अभी खाने का आरम्भ नहीं हुआ था कि किसी ने द्वार खटखटाया। ब्राह्मण ने द्वार खोल दिया और अभ्यागत को भीतर आने की आज्ञा दी। आर्यावर्त्त में सदा से यह रीति चली आई है कि गृहस्थ आप भूखे रह कर भी अतिथि को

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भोजन देते हैं। दीन ब्राह्मण ने अभ्यागत का स्वागत करके अपने भाग का सत्तू उसके सामने रख दिया। अभ्यागत भूखा था, एक सपाटे में सब खा गया और कहने लगा—"तुमने मुझको मार डाला। मैं दस दिन से भूखा हूँ। इस लघु भोजन ने मेरी भूख को और भी भड़का दिया।" तब ब्राह्मण की स्त्री ने अपने पति से कहा कि "मेरा भाग भी इसको दे दो।" पति ने कहा, "नहीं।" स्त्री हठ करने लगी "देखो, यह दीन मनुष्य आज हमारा अतिथि है, भूखा है। हमारा धर्म है कि हम इसको भोजन दें। क्योंकि मैं आपकी अर्द्धाङ्गिनी हूँ, इसलिए मुझको अधिकार है कि आपकी अतिथि-सेवा में भाग लूँ।" यह कह कर उसने भी अपना भाग अतिथि को अर्पण कर दिया। उसको भी खाकर अतिथि ने कहा कि मेरी भूख शान्त नहीं हुई। तब पुत्र ने कहा कि "मेरा भाग भी ले लो। क्योंकि मैं पिता के दाय का भागी हूँ, इसलिए अपने कर्त्तव्य-पालन में उसकी सहायता करना मेरा धर्म है।" किन्तु पुत्र के भाग को भी पा कर अतिथि की तृप्ति नहीं हुई। तब पुत्र की स्त्री ने भी अपना भाग उठा कर उसको दे दिया। अभ्यागत ने तृप्त हो कर भोजन किया और आशिष देकर वह वहाँ से प्रस्थित हो गया। उसी रात को ये चारों भूख का कष्ट सहते सहते मर गये। उस सत्तू की भूसी वहाँ भूमि पर पड़ी हुई थी। मैं उस पर लोटने लगा और मेरा आधा शरीर, जैसा कि तुम देख रहे हो, सुवर्ण का हो गया। उस समय से लेकर मैं बराबर संसार में इस उद्देश से भ्रमण कर रहा हूँ कि कहीं और ऐसा ही यज्ञ हुआ हो तो वहाँ लोट लगाऊँ और यह शेष आधा शरीर भी सुवर्ण का हो जावे। पर इस तुम्हारे

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कर्मयोग

यज्ञ में लोटने से ऐसा नहीं हुआ, इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम झूठे हो और यह यज्ञ नहीं है।

शोक कि उदारता और अतिथि-सेवा का यह आदर्श दिन प्रति दिन आर्यावर्त्त से लुप्त होता जा रहा है। जब मैंने पहले अँगरेज़ी पढ़ना आरम्भ किया, तब एक लड़के का वृत्तान्त पढ़ा जो बाहर काम करने के लिए गया हुआ था और विदेश से रुपया भेज कर माता की सहायता करता रहा। उसकी प्रशंसा में एक पुस्तक के चार पृष्ठ रँगे गये थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है। हिन्दू-सन्तान की दृष्टि में तो यह कोई असाधारण बात नहीं। पर अब मैंने समझा कि क्यों इस लड़के की इतनी प्रशंसा की गई थी। यूरोप में यह शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी चिन्ता आप करनी चाहिए। वहाँ प्रायः लोग केवल अपनी ही चिन्ता करते हैं और उनको इस बात की परवा तक नहीं होती कि माँ-बाप लड़के-बाले और घरवाली की क्या दशा होगी। यह अत्यन्त ही निन्दनीय प्रथा है। गृहस्थ के लिए यह आदर्श कभी न होना चाहिए।

अब तुम विचार करो कि कर्मयोग क्या वस्तु है? अन्तिम समय तक दूसरों का उपकार करना और प्रत्युपकार (बदले) का नाम तक मुँह पर न आने देना कर्मयोग है। दीनों को दान देकर कभी उनसे धन्यवाद या कृतज्ञता की आशा न करो। किन्तु तुम आप उनके कृतज्ञ बनो कि उनके कारण तुमको उदारता और दया के अभ्यास करने का अवसर हाथ आया। इसलिए गृहस्थाश्रम का धर्म संन्यासाश्रम के धर्म से कहीं कठिन है। कार्मिक जीवन त्याग के जीवन से कहीं दुराराध्य है।

तीसरा अध्याय

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धर्म क्या है ?

कर्मयोग की मीमांसा करने में यह जानना भी परमावश्यक है कि धर्म क्या है ? यदि मुझको कुछ काम करना है तो काम करने से पहले यह जान लेना चाहिए कि मेरा धर्म क्या है ? तभी मैं उसको भले प्रकार कर सकूँगा। धर्म के विषय में भिन्न भिन्न मतों के विचार भिन्न भिन्न हैं। मुसलमान कहते हैं कि जो कुछ कुरान में लिखा हुआ है, वही उनका धर्म है। हिन्दू कहते हैं कि वेद की जो आज्ञायें हैं, वही धर्म है। ईसाई अपनी इंजील का प्रमाण देते हुए उसकी आज्ञाओं को अपना धर्म बतलाते हैं। इन सब पर विचार करने से हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य-समुदाय के भिन्न भिन्न भागों में, इतिहास के भिन्न भिन्न समयों में और मनुष्य की भिन्न भिन्न जातियों में धर्म की अवस्था भिन्न भिन्न प्रकार की थी। और बहुत सी कठिन परिभाषाओं की तरह धर्म की व्याख्या करना भी कोई सुकर कार्य नहीं है। हम केवल पार्श्ववर्त्ती चिह्नों तथा कर्म के प्रत्यक्ष फलों को देख कर धर्म का कुछ विधान कर सकते हैं। जिस समय हमारी आँखों के सामने कोई घटना संघटित होती है, उस समय हमको विशेष रीति पर उसके कारण के

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अनुसन्धान करने की आवश्यकता प्रतीत होती है । धर्म के विषय में यह भाव सर्वगत मालूम होता है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने आत्मा के अनुकूल काम करना चाहिए । परन्तु प्रश्न यह है कि वह क्या वस्तु है, कि जो हमारे कर्म को धर्म का पर्याय बनाती है ? यदि किसी ईसाई को गोमांस मिल जाय और वह अपने प्राण बचाने के लिए उसको काम में न लावे तो वह समझेगा कि उसने पाप किया । परन्तु यदि किसी हिन्दू से ऐसा काम हो जाय तो वह इसे आत्मघात से भी अधिक पाप समझेगा । ये सब बातें सामयिक शिक्षा और संसर्ग के फल हैं । पिछली शताब्दी में भारतवर्ष में लुटेरों के समुदाय रहते थे, जिनको ठग कहते थे । मार्ग चलते हुए पथिकों को मार कर उनकी सम्पत्ति लूट लेना ही वे अपना धर्म समझते थे । जितने अधिक मनुष्यों की वे हिंसा करते थे, वे समझते थे कि उतनाही अधिक हमने धर्म का काम किया है, वैसे यदि भूल से भी किसी की गोली किसी के लग जाय तो उसे पश्चात्ताप होगा और वह समझेगा कि मैंने पाप किया है । यदि वही मनुष्य सिपाही बन कर लड़ाई में जावे तो एक दो को नहीं, किन्तु बीसियों मनुष्यों को मार गिरावेगा और इस बात का अभिमान करेगा कि मैंने धर्म का काम किया है । इसलिए धर्म के विषय में सर्वत्र एक ही प्रकार की व्यवस्था देना भारी भूल होगी पर तो भी धर्म का कुछ निरूपण किया जा सकता है । जिन कामों के करने से हम ईश्वर की ओर चलते हैं, या जिनसे हम ईश्वर की समीपता प्राप्त करते हैं, वे धर्म हैं। और जिन कर्मों के करने से हम ईश्वर से विमुख या दूर होते हैं या जो काम हम

तीसरा अध्याय ३५

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को अपनी अवस्था से नीचे गिराते हैं, वे अधर्म हैं। कोई कर्म ऐसे हैं कि जो हमको आर्य और सदाचारी बनाते हैं, कोई ऐसे भी कर्म हैं कि जिनके कारण हम नीच और पशु-तुल्य समझे जाते हैं। किन्तु प्रत्येक मनुष्य के लिए यह कह देना कि किन्हीं विशेष प्रकार के कर्मों से इसमें श्रेष्ठता और आर्यता आ जायगी, कठिन है। संस्कृत में एक उक्ति है जिसको प्रत्येक देश, जाति और प्रकार के मनुष्यों ने श्रेष्ठ माना है। वह यह है कि “मा हिंस्यात् सर्वप्राणिनः” “किसी प्राणी को मत सताओ। सताना या हिंसा करना पाप है।” केवल इतनी ही धर्म की व्याख्या की जा सकती है। इससे अधिक धर्म का विवरण करना कठिन है।

भगवद्गीता ने देश, काल और जाति की अवस्था के अनुसार धर्म की शिक्षा दी है। हमको उचित है कि हम ऐसे काम करें, जो हमारे देश, काल और समाज के विरुद्ध न हों। पर इस बात का स्मरण रखना चाहिए कि सब देश, काल और समाजों के आदर्श एक से नहीं होते। जो कि हम अपने से भिन्न देश, काल और समाज की रीति तथा व्यवहारों को नहीं जानते, इसलिए हम दूसरों से द्वेष या उनका अनादर करने लगते हैं। अमेरिकावाले समझते हैं कि जो कुछ अमेरिकन आचार-विचार हैं, वे ही सबसे उत्तम और सभ्यता के आदर्श हैं और जिनमें वे आचार-विचार नहीं हैं, वे असभ्य और अनादरणीय हैं। एक भारत-निवासी हिन्दू समझता है, उसी के कर्म धर्म श्रेष्ठ हैं और सबके हीन हैं। यह एक बड़ी भारी भूल है जो मनुष्यों की संकीर्णता और मात्सर्य से उत्पन्न हुई है। इस भूल के कारण बड़े अनर्थ और उत्पात हुए

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हैं और इसी के कारण भिन्न भिन्न जातियों में परस्पर द्वेष और वैमनस्य की आग प्रचण्ड हो रही है।

इसलिए हमको यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि जहाँ अपने धर्म-कर्म से हमको सच्चा प्रेम होना चाहिए, वहाँ दूसरों के धर्म-कर्म का भी उचित मान करना चाहिए और हम उनकी सामाजिक परिस्थिति की अपने जातीय आचार-विचारों से कभी तुलना न करें। "मैं सारे संसार का किसी दशा में आदर्श नहीं हो सकता।" यह बड़ी भारी शिक्षा है, जो हमको सीखनी चाहिए। संसार में तो क्या किसी देश में भी सर्वत्र एक ही रीति का प्रचार नहीं हो सकता। समय और सामयिक बातों के परिवर्त्तन से धर्म में भी परिवर्त्तन होता रहता है। इसलिए वर्त्तमान देश और समय के अनुसार जो कर्म उचित और आवश्यक हैं, वे ही हमारे प्रस्तुत धर्म हैं। वर्ण और आश्रम के अनुसार जो हमारा धर्म है, उस पर हमको दृढ़ रहना चाहिए। तत्पश्चात् अपने जीवन और अवस्था के अनुसार जो हमारा व्यक्तिगत धर्म है उसकी चिन्ता करें। इस जीवन में प्रत्येक मनुष्य की कुछ न कुछ स्थिति है; उसको उसी स्थिति में काम करना चाहिए। संसार में उस मनुष्य के लिए बहुत भय है, जो अपनी वास्तविक अवस्था पर दृष्टि नहीं देता और जैसा आप नहीं है वैसा अपने को समझने लगता है, या जैसा आप है वैसा अपने को नहीं समझता। जो मनुष्य अपने व्यक्तिगत धर्म एवं सामाजिक धर्म का पालन नहीं कर सकता, उससे कदापि यह आशा नहीं की जा सकती कि वह सामान्य धर्म का यथावत् पालन कर सकेगा। यदि मनुष्य किसी छोटे काम को योग्यता के

तीसरा अध्याय ३७

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साथ पूरा करेगा तो उसे अपने आप कोई न कोई बड़ा काम मिल जायगा। जब हम सचाई और प्रेम के साथ कोई काम करने लगते हैं, प्रकृति देवी दूती बनकर हमें समाचार पहुँचाती है और हम समझ जाते हैं कि योग्यता का सर्टीफ़िकेट हमको मिल गया। यदि कोई मनुष्य किसी काम के योग्य नहीं है तो वह बहुत दिन तक उस पर अधिकार न रख सकेगा। प्रकृति की व्यवस्था अटल है। उसके विरुद्ध फल की आशा करना मूर्खता है। छोटा काम करने से मनुष्य नीचा या छोटा नहीं होता। किसी मनुष्य की परीक्षा उसके काम से न करनी चाहिए, किन्तु यह देखना चाहिए कि वह उस काम को किस प्रकार पूरा कर सकता है।

सबसे उत्तम और पवित्र वे कर्म हैं, जिनमें स्वार्थ का लेश भी न हो और जो केवल कर्त्तव्य या उपासना समझ कर किये गये हों। जिस कर्म में जितनी स्वार्थ की मात्रा बढ़ती जाती है, उतना ही उसका महत्त्व घटता जाता है। यही कर्म का सब से उच्च आदर्श है और यही कर्म का सीधा मार्ग है, इसीसे मनुष्य का आत्मा उन्नत होता है। परन्तु कर्म का यह आदर्श मनुष्य को तब प्राप्त होता है जब शुभ कर्मों के निरन्तर अभ्यास से उसके दुष्ट संस्कार क्षीण हो जाते हैं और उसका अन्तःकरण उदार भावों और उच्चाशयों का प्रसवक्षेत्र बन जाता है। केवल धर्म-बुद्धि से कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए, यही एक कर्म के बन्धन से छूटने का मार्ग है। जो निःस्वार्थ कर्म करते हैं, उनमें ओज और प्रसाद चमकने लगते हैं। स्वार्थपरता ही मनुष्य को पाप की ओर ले जाती है, इसके प्रभाव से बचने के लिए केवल एक वस्तु की आवश्यकता

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है और वह प्रेम है। प्रेम ही धर्म का मूल है, इसके बिना मनुष्य अपने किसी अवस्था के धर्म का भी पालन नहीं कर सकता। पितृ-धर्म, पुत्र-धर्म, पति-धर्म, पत्नी-धर्म, गुरु-धर्म, शिष्य-धर्म, राज-धर्म और प्रजा-धर्म यहाँ तक कि मनुष्य-धर्म ये सब प्रेम के ही आश्रित हैं। जहाँ प्रेम है वहीं मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्त्तव्य-पालन की ओर झुकता है और जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ जो कुछ किया जाता है अपने स्वार्थ के लिए। इससे परस्पर अविश्वास उत्पन्न होकर ईर्ष्या, द्वेष और मत्सरता की वृद्धि होती है।

चिड़चिड़े स्वभाव की स्त्रियाँ अपने पतियों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहती हैं। पर यथार्थ में वे अपने इस बर्ताव से अपनी नीचता का परिचय देती हैं। यही दशा उन पतियों की है जो सदा अपनी पतिव्रता स्त्रियों में दोष ही देखा करते हैं। सदाचार स्त्री और पुरुष दोनों का भूषण है परन्तु वह बिना दोनों में सच्चे प्रेम के कभी रह नहीं सकता। जो पुरुष सदाचार से भ्रष्ट हो गये हैं, उनको धर्म के मार्ग पर लाना यद्यपि कठिन काम है, तथापि उनकी स्त्रियाँ यदि पतिव्रता और सदाचारिणी हों तो बहुत कुछ उन पर अपना प्रभाव डाल सकती हैं। इसी प्रकार धर्मात्मा और स्त्रीव्रत-पुरुष भी अपने सुचरित्र से अपनी कर्कशा और स्वैरिणी स्त्रियों का सुधार कर सकते हैं। पवित्रता और धर्मपरायणता दुष्टता को दबा सकती है। यदि स्त्री सदाचारिणी है और अपने पति के सिवा संसार के समस्त पुरुषों को अपने पुत्र, भाई या बाप के तुल्य समझती है, तो स्मरण रक्खो, एक भी ऐसा पुरुष न मिलेगा, जिसको उसे कुदृष्टि से देखने का साहस भी हो सके।

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इसी प्रकार जो पुरुष सिवा अपनी स्त्री के अन्य सबको माँ, बहन और पुत्री की दृष्टि से देखता है, कोई भी स्त्री उसको अपने धर्म से पतित न कर सकेगी। संसार में जो पुरुष शिक्षक या उपदेशक होने का अभिमान करते हैं, कम से कम उनको तो "मातृवत् परदारेषु" इस आप्त-वाक्य पर अपना विश्वास अपने आचरण से दिखलाना चाहिए।

संसार में माता की पदवी सबसे बड़ी है। माता से अधिक कोई निःस्वार्थ नहीं होता। माता के प्रेम से केवल ईश्वर के प्रेम को उच्च कक्षा में रक्खा गया है। संसार के और सब प्रेम इससे बहुत नीची कक्षा में हैं। सबसे पहले माता हमको निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। यदि ऐसे निःस्वार्थ शिक्षक को पाकर भी हम स्वार्थ में उन्मत्त रहे तो हमारे जीवन को धिक्कार है। वे पुरुष धन्य हैं कि जो अपने माता-पिता के निष्कपट प्रेम में ईश्वर के पवित्र प्रेम की झलक देखते हैं।

उन्नति का सरल और असन्दिग्ध मार्ग यह है कि अपने सामयिक कर्त्तव्य का पूर्ण ध्यान रहे और अपने साधारण धर्म का प्रतिपालन करते हुए दृढ़ता को सम्पादन किया जावे। अपने किसी कर्त्तव्य को भी लघु नहीं समझना चाहिए और न उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। छोटा काम करने से कोई छोटा नहीं होता। मनुष्य के महत्त्व की परीक्षा उसके काम से नहीं करनी चाहिए, किन्तु उसके काम करने के ढंग से करनी चाहिए। उसके कर्त्तव्य कार्यों के करने का क्रम और ढंग ही उसके जाँचने की कसौटी है। एक चमार, जो थोड़ी देर में दृढ़ और अच्छा जूता बना लेता है, उस

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पण्डित प्रोफेसर से कहीं अच्छा है, जो रात-दिन व्यर्थ बकवाद करता रहता है।

कोई योगी जङ्गल में जाकर बहुत काल तक योग-साधन करता रहा। बारह वर्ष तक वह एक आसन पर बैठा हुआ तप करता रहा। एक दिन जब वह अपने ध्यान में बैठा था तब वृक्ष के ऊपर से उसके सिर पर कुछ पत्ते गिरे, उसने ऊपर देखा तो दो कौए आपस में लड़ रहे थे। योगी को क्रोध आया और वे दोनों उसी समय उसके क्रोधाग्नि से जल-भुन कर नीचे गिर पड़े। योगी अपने मन में बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब मुझको योग-सिद्धि प्राप्त हो गई है। कुछ दिन के उपरान्त वह एक ग्राम में भिक्षा माँगने गया। किसी स्त्री के द्वार पर खड़े होकर आवाज़ दी—"माता ! भिक्षा दे जा।" भीतर से आवाज़ आई, ज़रा देर ठहर जा। योगी ने अपने मन में कहा, "अभागिनी स्त्री ! तू मेरे योग-बल को नहीं जानती और मुझे ठहराती है।" अभी वह सोच ही रहा था कि भीतर से फिर आवाज़ आई "बेटे ! बहुत क्रोध न कर, यहाँ कौए नहीं बसते।" अब तो योगी चकित रह गया और चुपचाप उसकी प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर में एक स्त्री बाहर आई। योगी उसके पाँव पर गिरा और कहने लगा—"माता ! तूने कैसे जाना।" उसने कहा—"बेटे ! मैं तेरे योग-ध्यान को नहीं जानती। मैं एक साधारण स्त्री हूँ। मैंने इस कारण तुझे ठहराया कि मेरा पति रोग-ग्रस्त है, मैं उसकी सेवा कर रही थी और यह मेरा धर्म है। मैं आयु भर अपने धर्म का आचरण करती रही। जब कुमारी थी, तब भी अपने धर्म का पालन करती रही और अब विवाह हो जाने पर भी धर्म को

तीसरा अध्याय ४१

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ही अपना जीवन-सर्वस्व समझती हूँ । यही योग है जिसका मैं रात-दिन अभ्यास करती हूँ । यही कारण है कि मेरा अन्तःकरण स्वच्छ है और मैं तेरे मन के भाव को तुरन्त जान गई । यदि तू इससे अधिक और कुछ जानना चाहता है तो अमुक नगर में चला जा । वहाँ एक वधिक रहता है, वह तुझे उचित शिक्षा देगा ।”

योगी ने सोचा “मैं क्यों वधिक के पास जाऊँ, वह चाण्डाल है । उसके छूने में पाप है ।” परन्तु वह उस स्त्री की सिद्धि देख चुका था, इसलिए अब उसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि उसकी आज्ञा को भङ्ग कर सके । अब वह उस नगर में पहुँचा । वहाँ उसको एक हृष्ट-पुष्ट वधिक मिला, जो मांस बेचा करता था । योगी ने कहा—“हे परमेश्वर ! यह क्या मुझको ज्ञान सिखावेगा, यह तो महा नीच कर्म करता है ।” इसी अवसर में वधिक की दृष्टि योगी पर पड़ी । उसने आँख उठा कर कहा—“स्वामिन् ! तुमको उस पतिव्रता स्त्री ने ज्ञान सीखने के लिए मेरे पास भेजा है । तुम थोड़ी देर के लिए वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, मैं अभी आवश्यक कार्य से निवृत्त होकर आता हूँ ।” योगी ने सोचा, “यह क्या रहस्य है ! अब देखो यहाँ क्या कौतुक होता है,” यह अपने मन में कहकर बैठ गया । वधिक अपना काम बराबर तत्पर होकर करता रहा । जब उससे निवृत्त हो गया, तब उसने योगी से कहा—“महाराज ! आइए, अब मेरे साथ गृह पर चलिए ।” दोनों प्रस्थित हुए । जब वहाँ पहुँचे, वधिक ने उसको एकान्त स्थान में बिठा कर कहा, आप यहाँ थोड़ी देर आराम कीजिए । यह कहकर वह घर के भीतर गया, जहाँ उसके माता-पिता रहते थे । उसने उनको न्हिलाया-धुलाया और खाना

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खिलाने के बाद योगी के पास आकर पूछा, “अब आप बतलाइए कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ?” तब योगी ने ईश्वर और जीव के विषय में कुछ प्रश्न किये। वधिक ने उसके उत्तर में उसको एक अत्यन्त मनोहर और सार-गर्भित उपदेश सुनाया जो आज तक “व्याधगीता” के नाम से प्रसिद्ध है और जिसको आत्मजिज्ञासु बड़े चाव से पढ़ते और सुनते हैं। वेदान्त की उच्च से उच्च शिक्षा उसमें दी गई है। तुमने 'भगवद्गीता' पढ़ी है, 'व्याधगीता' भी पढ़ो और देखो, वेदान्तदर्शन के कैसे गूढ़ रहस्य उसमें भरे हुए हैं। जब व्याध उपदेश सुना चुका तब योगी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, जब तुम ऐसे ज्ञानी हो तो इस शरीर में क्यों रहते हो और क्यों ऐसा निन्दनीय काम करते हो? व्याध ने उत्तर दिया—पुत्र! कोई काम बुरा नहीं है, न कोई धर्म दूषित है। लड़कपन से मैंने यह काम सीखा, मुझको इसका बन्धन नहीं है। मैं सच्चाई के साथ प्रमादरहित होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता हूँ। गृहस्थ होकर गृहस्थ-धर्म का पालन करता हूँ। माता-पिता को प्रसन्न रखता हूँ। न तो मैं योग जानता हूँ और न संन्यास; न कभी जङ्गल में गया और न देशाटन किया। तो भी तुमने सुन लिया कि मेरे विचार कैसे हैं! और देख लिया कि मुझको किसी प्रकार का बन्धन नहीं है। मैं अपनी योग्यता और अवस्था के अनुसार अपने धर्म का पालन करता हूँ।

भारतवर्ष में एक बहुत बड़ा योगी है। मैंने एक बार उसका दर्शन किया। वह विचित्र पुरुष है। न वह किसी को पढ़ाता-लिखाता है, न किसी के प्रश्न का उत्तर देता है। वह उपदेशक या

तीसरा अध्याय

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संन्यासी के काम को करना नहीं चाहता। यदि तुम उससे कोई प्रश्न पूछो और कई दिन तक उसके उत्तर की प्रतीक्षा करो तो वार्त्तालाप के प्रसङ्ग में वह स्वयं तुम्हारे प्रष्टव्य का वर्णन करेगा और अपनी प्रतिभा की कुञ्जी से तुम्हारे हृदय के ताले को खोल देगा और तुम चकित रह जाओगे। उसने एक बार कर्मयोग के सम्बन्ध में मुझसे कहा—"उद्देश और उसकी प्राप्ति के साधन को एक कर दो तो तुम कर्म के रहस्य को सुगमता से समझ जाओगे। जब तुम किसी काम को कर रहे हो तो उसके सिवा दूसरी बात का मन में ध्यान तक न करो। समझ लो, यही हमारी उपासना है, यही हमारी पूजा है। अपना सारा जीवन और पुरुषार्थ उस समय उसी काम में लगा दो।" यह कर्मोपासना सब उपासनाओं से प्रधान है। पूर्वोक्त आख्यान में वह स्त्री और व्याध प्रसन्नता, एकाग्रता और प्रेम के साथ अपने धर्म का पालन करते थे। परिणाम यह हुआ कि इस कर्मोपासना से ही उनके हृदय के पट खुल गये और उनके अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश हो गया। प्रत्येक धर्म पवित्र है और उसका पालन करना ईश्वर-पूजा का सर्वोत्तम साधन है। इससे बड़ी सहायता मिलती है, हृदय के पट खुल जाते हैं और शनैः शनैः सब बन्धन की ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं।

हमारे धर्म और कर्म पर आस पास के सम्बन्ध का बहुत कुछ प्रभाव पड़ता है। उच्च या नीच कर्म का विचार सापेक्ष्य है। जिस कर्मकर्त्ता को कर्मफल की इच्छा होती है वही फल की प्रतिकूलता से खिन्न और विमनस्क होता है और अपने भाग्य वा समय की निन्दा करता है या उपालम्भ देता है। और जो इस बन्धन से मुक्त हो

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गये हैं अर्थात् किसी इच्छा से प्रेरित होकर कर्म नहीं करते, किन्तु अपना धर्म समझ कर करते हैं, उनके लिए न कोई कर्म उच्च है न नीच। उन्होंने राग और स्वार्थ की जड़ को काट दिया है। उनका आत्मा हंस के समान उच्चगामी होकर स्वाधीनता के आकाश में उड़ा करता है, कोई उसे बन्धन में नहीं ला सकता। हम में यह बड़ा दोष है कि हम अपने आपको बहुत बड़ा समझते हैं। जब मैं बालक ही था, स्वप्न में देखा करता था कि मैं राजा हूँ, मुझ में यह बड़ाई है, यह महत्व है। शायद तुमको भी ऐसे स्वप्न दीखते हों। पर यथार्थ में यह स्वप्न ही हैं। हमारे कर्त्तव्य चाहे वे कुछ ही क्यों न हों, सर्वदा और सर्वत्र हमारी अवधानता चाहते हैं। यदि हम अपने सामयिक कर्त्तव्य का सम्यक् पालन करें तो जो काम इस समय हमारे हाथ में है, वह हमारी दृढ़ता का कारण बन जायगा और धीरे धीरे हम किसी ऐसे अधिकार और पदवी को प्राप्त होंगे, जिसकी सोसायटी में बड़ी प्रतिष्ठा की जाती है। ईर्ष्या और अस-हिष्णुता से मन की अशान्ति बढ़ती है, दया और उदारता से ऋजुता और नम्रता बढ़ती है। भाग्य और समय को दोष देनेवाले सदा अपना रोना रोया करते हैं। उनको शान्त और प्रसन्न करना कठिन काम है। उनका जीवन सदा उनके लिए प्रतिकूल बना रहता है।

आओ ! हम तुम सब अपना अपना कर्म करें, जो हमारा धर्म है, उसको दृढ़ता से पकड़ रक्खें। चलते हुए पहियों में कन्धों को लगा कर अपने सारे बल से इस कर्म की गाड़ी को खींचो फिर तुम देखोगे कि यह किस प्रकार संसार की दलदल से पार होकर तुम्हें अपने अभीष्ट स्थान में पहुँचाती है।