कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
पृष्ठ 46, कुल 115 में से
संदर्भ में पढ़ें४०
पण्डित प्रोफेसर से कहीं अच्छा है, जो रात-दिन व्यर्थ बकवाद करता रहता है।
कोई योगी जङ्गल में जाकर बहुत काल तक योग-साधन करता रहा। बारह वर्ष तक वह एक आसन पर बैठा हुआ तप करता रहा। एक दिन जब वह अपने ध्यान में बैठा था तब वृक्ष के ऊपर से उसके सिर पर कुछ पत्ते गिरे, उसने ऊपर देखा तो दो कौए आपस में लड़ रहे थे। योगी को क्रोध आया और वे दोनों उसी समय उसके क्रोधाग्नि से जल-भुन कर नीचे गिर पड़े। योगी अपने मन में बड़ा प्रसन्न हुआ कि अब मुझको योग-सिद्धि प्राप्त हो गई है। कुछ दिन के उपरान्त वह एक ग्राम में भिक्षा माँगने गया। किसी स्त्री के द्वार पर खड़े होकर आवाज़ दी—"माता ! भिक्षा दे जा।" भीतर से आवाज़ आई, ज़रा देर ठहर जा। योगी ने अपने मन में कहा, "अभागिनी स्त्री ! तू मेरे योग-बल को नहीं जानती और मुझे ठहराती है।" अभी वह सोच ही रहा था कि भीतर से फिर आवाज़ आई "बेटे ! बहुत क्रोध न कर, यहाँ कौए नहीं बसते।" अब तो योगी चकित रह गया और चुपचाप उसकी प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर में एक स्त्री बाहर आई। योगी उसके पाँव पर गिरा और कहने लगा—"माता ! तूने कैसे जाना।" उसने कहा—"बेटे ! मैं तेरे योग-ध्यान को नहीं जानती। मैं एक साधारण स्त्री हूँ। मैंने इस कारण तुझे ठहराया कि मेरा पति रोग-ग्रस्त है, मैं उसकी सेवा कर रही थी और यह मेरा धर्म है। मैं आयु भर अपने धर्म का आचरण करती रही। जब कुमारी थी, तब भी अपने धर्म का पालन करती रही और अब विवाह हो जाने पर भी धर्म को