कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय २७
कहाँ ? प्रेम में तो आनन्द ही आनन्द है। जिस प्रेम में आनन्द नहीं है उसको कभी भूल कर भी प्रेम न कहो। प्रेम के विषय में संसार में बड़ी भ्रान्ति फैली हुई है। जब तुमको अपनी पत्नी, अपने पति और अपने पुत्र-मित्रादि से प्रेम करने में दुःख या ईर्ष्या उत्पन्न न हो और न स्वार्थ का भाव मन में आने पावे, तब तुम समझो कि तुम्हारा सच्चा प्रेम है और तुम निःसङ्ग और स्वाधीन बन सकते हो।
कृष्ण भगवान् कहते हैं—हे अर्जुन ! “यदि मैं थोड़ी देर के लिए भी कर्म करना छोड़ दूँ तो यह जगत् उत्सन्न हो जावे। यद्यपि मुझको कुछ कर्त्तव्य और प्राप्तव्य नहीं है, क्योंकि मैं आप्त-काम हूँ। न कर्म और उसके फल में मेरी वासना है, तथापि मैं कर्म करता हूँ, क्योंकि मुझे जगत् से प्रेम है। और इस प्रेम से ही सच्चा त्याग उत्पन्न होता है।” जहाँ भौतिक सम्बन्ध होता है, जहाँ मनुष्य सांसारिक विषयों में लिप्त रहते हैं वहाँ केवल शारीरिक सम्बन्ध रहता है। शरीर के परमाणुओं में आकर्षण उत्पन्न होता है, जिसके कारण दो भिन्न भिन्न शरीर थोड़ी देर के लिए एक दूसरे से मिलते हैं और यदि उनका मिलाप नहीं होता तो दुःख उत्पन्न होता है। पर जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ भौतिक सम्बन्ध का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। सच्चा प्रेम रखनेवाले मनुष्य चाहे हज़ारों कोस के अन्तर पर रहते हों, पर उनके प्रेम की दशा एक जैसी होगी। ऐसा प्रेम कभी मरता नहीं, चाहे शरीर भले ही नष्ट हो जावें। और न कभी उसमें दुःख की आशंका होती है।
इन नैष्कर्म्य पदवी के प्राप्त करने में कई जन्म लग जाते हैं। परन्तु जहाँ यह प्राप्त हो गई, मानो मनुष्य-जीवन का अभीष्ट सिद्ध
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