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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय २५

क्या है ? "प्रकृति आत्मा के लिए है, आत्मा प्रकृति के लिए नहीं।" यही सांख्य की शिक्षा का सार है। प्रकृति की विद्यमानता केवल आत्मा की शिक्षा के लिए है। इसके सिवा और उसका कुछ भी प्रयोजन नहीं है। प्रकृति इसलिए है कि आत्मा को ज्ञान की प्राप्ति हो और ज्ञान प्राप्त करके वह मोक्ष पद को पालेवे। यदि हम इस रहस्य को सदा स्मरण रक्खेंगे तो प्रकृति कभी हमारे लिए बन्धन का कारण न होगी। हम बराबर समझते रहेंगे कि प्रकृति हमारे स्वाध्याय के लिए एक पुस्तक है जिसका हमें अध्ययन करना है। और जहाँ हमको विद्या प्राप्त हो गई, फिर पुस्तक से कुछ प्रयोजन नहीं रहता। किन्तु हम भ्रान्ति में पड़ कर अपने आपको प्रकृति समझ लेते हैं। हम सोचने लगते हैं कि आत्मा प्रकृति के लिए है और वह मांस और चर्म का पिण्ड है। जीना खाने के लिए है और खाना जीने के लिए नहीं है। हम रात-दिन इसी भ्रान्ति में पड़े हुए हैं, अर्थात् अपने आपको शरीर और प्रकृति मान रहे हैं। यही कारण है कि हम इसके बन्धन से छूट नहीं सकते। भला कैसे छूट सकते हैं, जब कि हम इसके दास या सेवक बन कर काम करते हैं ?

वेदान्त की शिक्षा का सार यह है कि तुम स्वामी और स्वाधीन बन कर स्वामित्व और स्वाधीनता की दशा में काम करो। प्रकृति के सेवक और उपासक न बनो। काम सदा करते रहो, पर वह भृत्य का काम न हो। क्योंकि जो लोग दीन या अधीन होकर काम करते हैं, उनके काम में स्वार्थ की मात्रा अधिक होती है। काम स्वाधीनता और प्रेम के साथ होना चाहिए। जब तक स्वाधीनता न हो, तब तक सच्चा प्रेम हो ही नहीं सकता, दास में कभी सच्चा