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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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३८ कर्मयोग

है और वह प्रेम है। प्रेम ही धर्म का मूल है, इसके बिना मनुष्य अपने किसी अवस्था के धर्म का भी पालन नहीं कर सकता। पितृ-धर्म, पुत्र-धर्म, पति-धर्म, पत्नी-धर्म, गुरु-धर्म, शिष्य-धर्म, राज-धर्म और प्रजा-धर्म यहाँ तक कि मनुष्य-धर्म ये सब प्रेम के ही आश्रित हैं। जहाँ प्रेम है वहीं मनुष्य निष्काम भाव से अपने कर्त्तव्य-पालन की ओर झुकता है और जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ जो कुछ किया जाता है अपने स्वार्थ के लिए। इससे परस्पर अविश्वास उत्पन्न होकर ईर्ष्या, द्वेष और मत्सरता की वृद्धि होती है।

चिड़चिड़े स्वभाव की स्त्रियाँ अपने पतियों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहती हैं। पर यथार्थ में वे अपने इस बर्ताव से अपनी नीचता का परिचय देती हैं। यही दशा उन पतियों की है जो सदा अपनी पतिव्रता स्त्रियों में दोष ही देखा करते हैं। सदाचार स्त्री और पुरुष दोनों का भूषण है परन्तु वह बिना दोनों में सच्चे प्रेम के कभी रह नहीं सकता। जो पुरुष सदाचार से भ्रष्ट हो गये हैं, उनको धर्म के मार्ग पर लाना यद्यपि कठिन काम है, तथापि उनकी स्त्रियाँ यदि पतिव्रता और सदाचारिणी हों तो बहुत कुछ उन पर अपना प्रभाव डाल सकती हैं। इसी प्रकार धर्मात्मा और स्त्रीव्रत-पुरुष भी अपने सुचरित्र से अपनी कर्कशा और स्वैरिणी स्त्रियों का सुधार कर सकते हैं। पवित्रता और धर्मपरायणता दुष्टता को दबा सकती है। यदि स्त्री सदाचारिणी है और अपने पति के सिवा संसार के समस्त पुरुषों को अपने पुत्र, भाई या बाप के तुल्य समझती है, तो स्मरण रक्खो, एक भी ऐसा पुरुष न मिलेगा, जिसको उसे कुदृष्टि से देखने का साहस भी हो सके।

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