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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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तीसरा अध्याय

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संन्यासी के काम को करना नहीं चाहता। यदि तुम उससे कोई प्रश्न पूछो और कई दिन तक उसके उत्तर की प्रतीक्षा करो तो वार्त्तालाप के प्रसङ्ग में वह स्वयं तुम्हारे प्रष्टव्य का वर्णन करेगा और अपनी प्रतिभा की कुञ्जी से तुम्हारे हृदय के ताले को खोल देगा और तुम चकित रह जाओगे। उसने एक बार कर्मयोग के सम्बन्ध में मुझसे कहा—"उद्देश और उसकी प्राप्ति के साधन को एक कर दो तो तुम कर्म के रहस्य को सुगमता से समझ जाओगे। जब तुम किसी काम को कर रहे हो तो उसके सिवा दूसरी बात का मन में ध्यान तक न करो। समझ लो, यही हमारी उपासना है, यही हमारी पूजा है। अपना सारा जीवन और पुरुषार्थ उस समय उसी काम में लगा दो।" यह कर्मोपासना सब उपासनाओं से प्रधान है। पूर्वोक्त आख्यान में वह स्त्री और व्याध प्रसन्नता, एकाग्रता और प्रेम के साथ अपने धर्म का पालन करते थे। परिणाम यह हुआ कि इस कर्मोपासना से ही उनके हृदय के पट खुल गये और उनके अन्तःकरण में ज्ञान का प्रकाश हो गया। प्रत्येक धर्म पवित्र है और उसका पालन करना ईश्वर-पूजा का सर्वोत्तम साधन है। इससे बड़ी सहायता मिलती है, हृदय के पट खुल जाते हैं और शनैः शनैः सब बन्धन की ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं।

हमारे धर्म और कर्म पर आस पास के सम्बन्ध का बहुत कुछ प्रभाव पड़ता है। उच्च या नीच कर्म का विचार सापेक्ष्य है। जिस कर्मकर्त्ता को कर्मफल की इच्छा होती है वही फल की प्रतिकूलता से खिन्न और विमनस्क होता है और अपने भाग्य वा समय की निन्दा करता है या उपालम्भ देता है। और जो इस बन्धन से मुक्त हो