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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पहिला अध्याय ३.

यह ज्ञान, यह विवेक, यह विद्या, मनुष्य में कहीं बाहर से नहीं आई, किन्तु उसका आत्मा स्वयमेव ज्ञान का अधिकरण है। सब कुछ उसमें भरा पड़ा है। मनुष्य के आत्मा में संपूर्ण विद्याओं और कलाओं का कोष छिपा हुआ है, उनका सीखना वास्तव में उन आवरणों को हटा देना है, जिन्होंने आत्मा के उस प्रकाश को ढक रक्खा है। आत्मा के आवरणों को हटा दो, ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित देख पड़ेगी। सीखना, पढ़ना आदि पारिभाषिक शब्द हैं। कहा जाता है कि न्यूटन* ने आकर्षण शक्ति के सिद्धान्त का अनुभव किया। क्या यह सिद्धान्त किसी कोने में छिपा हुआ न्यूटन की प्रतीक्षा कर रहा था ? नहीं। इस सिद्धान्त का अंकुर उसके हृदय में वर्त्तमान था जो अन्य संस्कारों से दबा हुआ पड़ा था। समय आया और फल-पतन रूप कर्म की रगड़ से वह आग, जो दबी हुई पड़ी थी, एकाएक प्रज्वलित हो गई। जो कुछ ज्ञान संसार में फैला हुआ है वह सब मनुष्य के आत्मा से निकला है। तुम्हारा हृदय सृष्टि के असंख्य पदार्थों का अपरिमित कोष है। बाह्य जगत् केवल सांकेतिक है, उसके संकेतों को पाकर तुम अपने अन्तःकरण की परताल करने लगते हो। तुम्हारा अन्तः-करण ही वास्तव में तुम्हारी शिक्षा-पुस्तक है। वृक्ष की शाखा


* सर आइज़िक न्यूटन एक पाश्चात्य दार्शनिक हुआ है, जिसने पृथ्वी की आकर्षण-शक्ति का पता लगाया। जब वह अपनी वाटिका में बैठा हुआ था, वृक्ष से एक सेब गिरा। वह उसके पतन के कारण का अनुसन्धान करने लगा और इस परिणाम पर पहुँचा कि पृथ्वी प्रत्येक वस्तु को अपनी ओर खींचती है।