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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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कि मनुष्य ने भ्रान्ति से सुख को अपने जीवन का उद्देश्य मान रक्खा है। थोड़े काल में ही विचार करने से मनुष्य को अनुभव होने लगता है कि उसकी गति सुख की ओर नहीं किन्तु ज्ञान की ओर है। हाँ, सुख और दुःख दोनों अपने अपने स्थान पर शिक्षक का काम देते हैं। भलाई और बुराई दोनों ही से मनुष्य का अनुभव बढ़ता रहता है। यद्यपि सुख और दुःख दोनों परिवर्तन-शील हैं, वे एक सी अवस्था में कभी स्थिर नहीं रह सकते, तथापि अपना यौगिक प्रभाव मनुष्य के अन्तःकरण पर छोड़ जाते हैं और इसी यौगिक प्रभाव के संघात का नाम मनुष्य का चारित्र्य (कैरेक्टर) है। यदि आप किसी व्यक्ति-विशेष के चारित्र्य को निरीक्षण करें तो आपको विदित होगा कि उसका चारित्र्य सिवा उसकी अन्तःकरण की वृत्तियों और वासनाओं की राशि के और कुछ भी नहीं है। इसको देख कर तुम भली भाँति समझ जाओगे कि इस चारित्र्य के बनाने में पुण्य, पाप, शुभ, अशुभ और सुख-दुःख इन सबने बराबर भाग लिया है। किन्तु विशेष दशाओं में सुख की अपेक्षा दुःख ने चारित्र्य-सङ्गठन में सच्चे शिक्षक का काम किया है। संसार में जितने प्रसिद्ध महापुरुष हुए हैं यदि ध्यान देकर उनके जीवन-चरित्र पढ़ोगे तो तुमको मालूम होगा कि दुःख ने विशेष कर उनके जीवन को उच्च और उदार बनाने में बहुत बड़ा काम किया है। दुःख ने सुख की अपेक्षा उनको उत्तम शिक्षायें दीं, निर्धनता ने सधनता की अपेक्षा उनको परिश्रमी और सहनशील बनाया। निन्दा और अनादर के थपेड़ों ने प्रशंसा और श्लाघा की अपेक्षा उनकी छिपी हुई आन्तरिक योग्यता को अधिक उभरने का अवसर दिया।