कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
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होगा ? इत्यादि । गीता में जहाँ कहीं केवल कर्म के लिए प्रेरणा की गई है, उसका अभिप्राय यह है कि मन की शक्ति, जो दबी पड़ी है, उभर खड़ी हो और सोया हुआ आत्मा जाग उठे । यह शक्ति प्रत्येक मनुष्य के मन में है और ज्ञान भी उसके आत्मा में है। कर्म के मुद्गर की चोट बराबर इसलिए लगाई जाती है कि वह आलस्य की निद्रा को त्याग कर कर्म करने के लिए उद्यत हो जावे ।
मनुष्य किसी-न-किसी प्रयोजन को सामने रख कर कर्म करता है । और कोई कर्म ऐसा नहीं होता जिसका कुछ न कुछ प्रयोजन न हो । जो ख्याति के भूखे हैं, वे प्रसिद्धि ( नामवरी ) के लिए कर्म करते हैं । जो धन की चाह रखते हैं, वे धन की प्राप्ति के लिए कर्म करते हैं । जिनको अधिकार और आधिपत्य की भूख है, वे इनके लिए कर्म करते हैं । कोई स्वर्ग की इच्छा रखते हैं, उनके कर्म स्वर्गप्राप्ति के लिए होते हैं। कोई मनुष्य चीनियों की तरह अपने पीछे नाम छोड़ जाना चाहते हैं । चीन में यह दस्तूर है कि मरने के बाद मनुष्य को उपाधि दी जाती है । चीनियों में जब कोई अच्छा कर्म करता है तब उसके मुर्दा बाप-दादा को उपाधि मिलती है । किन्हीं लोगों की यह कामना होती है कि मरने के बाद उनकी क़ब्र पर विशाल मन्दिर बनाया जावे, वे इसी के लिए कर्म करते हैं । कोई पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए कर्म करते हैं । पहले बुरे कर्म किये, फिर एक मन्दिर बनवा दिया । पूजारी को कुछ भेंट दे दी और स्वर्ग के अधिकारी बन गये । निदान कर्म करने के भिन्न भिन्न और असंख्य प्रयोजन हैं ।
किन्तु सबसे उत्तम बात यह है कि मनुष्य कर्म को केवल कर्म