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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पहला अध्याय ६

और अधिकार की व्यवस्था किया करते हैं। हम अपनी वर्तमान सत्ता, वर्तमान अवस्था, और वर्तमान दशा के आपही निर्माता और उत्तरदाता हैं। हम जो कुछ होना चाहते हैं, उसकी इच्छा ही नहीं, किन्तु शक्ति भी हम में है। यदि हमारी वर्त्तमान दशा हमारे पिछले जीवन के कर्मों का फल है तो इससे सिद्ध हो सकेगा कि आगे चल कर हम जैसे बनने की इच्छा करेंगे या जैसे बनने की हम में शक्ति है हम वैसे ही बन जावेंगे। इसलिए हमको यह जान लेना चाहिए कि कौन से कर्म हमारे लिए हितकर हैं ? यदि कहो कि कर्म के विषय में विचार करने या उसके जानने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी प्रकार के कर्म कर रहा है। ॐ स्मरण रक्खो, इस प्रकार की बातों से काम नहीं चलता। कर्म के सम्बन्ध में भगवद्गीता का उपदेश है कि विचार और बुद्धिमत्ता के साथ कर्म करने चाहिएँ। कर्म करने से पहले कर्मकर्त्ता को यह जान लेना चाहिए कि यह कर्म, जिसको मैं करना चाहता हूँ, कर्तव्य है या अकर्तव्य। इसका परिणाम क्या


✻ केवल यह जान लेने से कि कुछ न कुछ कर्म हम करते ही रहते हैं और बिना कर्म के कोई नहीं रह सकता, मनुष्य का काम नहीं चल सकता। क्या वह मनुष्य जो यह समझ कर कि भोजन मुझे करना ही है और बिना इसके नहीं बीतेगी, जो कुछ सामने आ जाय उसे खाने लगे, मूर्ख नहीं कहलावेगा ? भोजन हमारे लिए आवश्यक है तभी तो हमें इसके सम्बन्ध में यह जानने की आवश्यकता है कि यह खाद्य है, समयानुकूल है और इसके पचाने की हममें शक्ति है, इसी प्रकार जब कर्म भी हमारे लिए आवश्यक है तो उसके सम्बन्ध में हमको उसकी कर्त्तव्यता, परिणाम, देशकालानुकूलता और अपनी योग्यता तथा शक्ति का विचार अवश्यमेव करना चाहिए।

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