भारतकोश
कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 115 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

पहला अध्याय १३

रखनेवाली व्यक्तियाँ प्रकट होती हैं। साधारण जन इस रहस्य को नहीं समझते, पर उनको अन्य मनुष्यों पर अधिकार जमाने या शासन चलाने की इच्छा रहती है। कुछ काल धैर्य रक्खो और इस बाह्य अधिकार की वासना को, जो तुम्हें भ्रान्ति में डालती है, रोको और जब तुम अपनी इस इच्छा को रोकने में समर्थ हो सकोगे तब तुम संसार पर अपना अधिकार कर सकोगे। मनुष्य थोड़े से स्वार्थ के लिए लोगों को धोखा देता है, अनर्थ करता है। यदि वह कुछ दिन अपने आपको संयम में रख सके तो सारे संसार को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। परन्तु हम सब लोग भूले हुए हैं, हममें से बहुत से मनुष्यों की दृष्टि कुछ वर्षों से आगे नहीं जाती। जैसे पशुओं को थोड़ी दूर तक अपने आगे के सिवा और कुछ दिखलाई नहीं देता। वैसी ही हमारी दशा है। हमारा संसार बहुत ही संकीर्ण और हमारे विचार अत्यन्त ही क्षुद्र हैं। हमारी आत्मीयता केवल अपने कुटुम्ब या अधिक से अधिक सम्बन्धियों तक परिमित है। इससे अधिक देखने की न हम में शक्ति है और न सुध है। यही कारण है कि हम दुराचारी और दुश्चरित्र बन जाते हैं।

छोटे से छोटे काम को भी तुच्छ दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जिस मनुष्य के संस्कार अच्छे नहीं हैं, वह ख्याति के लिए या किसी और प्रयोजन से ही कर्म करे, आलसी होकर न बैठे। प्रत्येक मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारा उद्योग का पैर आगे की ओर बढ़ा चले और कर्म करते हुए (चाहे किसी उद्देश्य से करे) हम उसके तत्त्व को भी समझते जायें कि कर्म क्या है और उसका अभिधेय क्या है? और यह बात भी हमको जान लेनी चाहिए कि