कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextदूसरा अध्याय २१
हैं और उनसे और लहरों के पैदा होने की सम्भावना रहती है। जो कर्म हम करते हैं (चाहे वह शारीरिक चेष्टा हो या मानसिक सङ्कल्प) मन पर सब का चित्र पानी में बुलबुले की तरह खिंच जाता है। ये चित्र चाहे बाहर न देख पड़ें, पर भीतर ही भीतर काम करने की इनमें सारी शक्ति विद्यमान होती है और वे अनवरत अपना काम करते रहते हैं। हमारी वर्त्तमान अवस्था इन संस्कारों या पूर्वसञ्चित कर्मों के प्रभावों का संघात है। प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन्हीं संस्कारों के साँचों में ढलता है। जैसे संस्कार होंगे वैसा ही चरित्र भी होगा। जो मनुष्य सदा बुरी बातें सुना करता है, बुरी भावनायें मन में रखता है और बुरे कर्म किया करता है, उसका मन बुरे संस्कारों से भरा रहेगा। और उससे सदा वैसेही कर्म और संकल्प प्रकट होते रहेंगे और उसकी प्रकृति ही वैसी पड़ जायगी। इसी प्रकार यदि कोई मनुष्य अच्छी भावनायें मन में रखता है, वाणी से अच्छे वचन बोलता है और शरीर से अच्छे कर्म करता है तो उसके संस्कार भी अच्छे होंगे और वे उसे खींच कर पुण्य की ओर ले जायेंगे। यदि वह भूल कर पाप करना भी चाहेगा तो उसके मन में एक प्रकार का क्षोभ उत्पन्न हो जायगा, जिससे उसे पाप करने का साहस न होगा। जब शुद्ध भावनाओं की धारणा से शुभ कर्म करते करते उसकी धार्मिक प्रवृत्ति हो जायगी तो फिर उसके लिए पाप-कर्म की शङ्का ही मिट जायगी; उसका मन फिर पाप-कर्म की ओर भूल कर भी न जायगा। उसके हृदय में शुद्ध संस्कार जाग्रत् होंगे, जो उसके जीवन को धर्म के साँचे में ढाल कर ध्रुवा के समान अचल बना देंगे।