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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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२६ | कर्मयोग

प्रेम न होगा। तुम उसे बन्धन में डाल कर काम लेते रहो, वह काम करता रहेगा, परन्तु उसका काम प्रेमपूर्वक न होगा। इसी प्रकार जब तक हम अर्थों के दास एवं मन और इन्द्रियों के अधीन होकर अपने लिए काम करते हैं, तब तक सच्चा प्रेम और विश्वास हमारे हृदय में उत्पन्न हो न होगा। ऐसे ही जो काम अपने सम्बन्धियों और मित्रों के लिए किया जाता है, उसमें भी स्वार्थ है और जहाँ स्वार्थ है वहाँ बन्धन और दुःख है। केवल निष्काम कर्म में ही सच्चा प्रेम रहता है और जहाँ सच्चा प्रेम है, वहीं सच्चा सुख और सच्ची शान्ति है। वास्तविक जीवन, वास्तविक ज्ञान और वास्तविक प्रेम का परस्पर नित्य सम्बन्ध है, और सच तो यह है कि ये तीनों एक ही हैं। जहाँ एक की स्थिति होगी, वहाँ दूसरे भी अवश्य होंगे। यथार्थ में ये तीनों एक ही वस्तु के तीन अंग हैं। इन्हीं को सत्, चित्, आनन्द भी कहते हैं। सत् हमारा जीवन है, चित् उसमें ज्ञान है और आनन्द ही प्रेम है, जिसको हमारा हृदय अनुभव करता है। जहाँ ईर्ष्या या दुःख है, वहाँ सच्चा प्रेम कदापि नहीं रहता। कल्पना करो कि एक मनुष्य किसी स्त्री पर आसक्त है। वह चाहता है कि वह स्त्री सिवा उसके दूसरी ओर न देखे। ईर्ष्या की आग उसके हृदय में भड़कती रहती है। वह स्त्री को सर्वथा अपने अधीन रखना चाहता है। वह आप भी उस स्त्री का दास है और उस स्त्री को भी अपना दास बनाना चाहता है। यह प्रेम नहीं है। यह दास की नीच और स्वार्थमयी वासना का फल है। इससे प्रेम की अवज्ञा होती है। यदि वह उसकी इच्छा के अनुसार काम नहीं करती तो उसको दुःख होता है। प्रेम में दुःख