कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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हैं और इसी के कारण भिन्न भिन्न जातियों में परस्पर द्वेष और वैमनस्य की आग प्रचण्ड हो रही है।
इसलिए हमको यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि जहाँ अपने धर्म-कर्म से हमको सच्चा प्रेम होना चाहिए, वहाँ दूसरों के धर्म-कर्म का भी उचित मान करना चाहिए और हम उनकी सामाजिक परिस्थिति की अपने जातीय आचार-विचारों से कभी तुलना न करें। "मैं सारे संसार का किसी दशा में आदर्श नहीं हो सकता।" यह बड़ी भारी शिक्षा है, जो हमको सीखनी चाहिए। संसार में तो क्या किसी देश में भी सर्वत्र एक ही रीति का प्रचार नहीं हो सकता। समय और सामयिक बातों के परिवर्त्तन से धर्म में भी परिवर्त्तन होता रहता है। इसलिए वर्त्तमान देश और समय के अनुसार जो कर्म उचित और आवश्यक हैं, वे ही हमारे प्रस्तुत धर्म हैं। वर्ण और आश्रम के अनुसार जो हमारा धर्म है, उस पर हमको दृढ़ रहना चाहिए। तत्पश्चात् अपने जीवन और अवस्था के अनुसार जो हमारा व्यक्तिगत धर्म है उसकी चिन्ता करें। इस जीवन में प्रत्येक मनुष्य की कुछ न कुछ स्थिति है; उसको उसी स्थिति में काम करना चाहिए। संसार में उस मनुष्य के लिए बहुत भय है, जो अपनी वास्तविक अवस्था पर दृष्टि नहीं देता और जैसा आप नहीं है वैसा अपने को समझने लगता है, या जैसा आप है वैसा अपने को नहीं समझता। जो मनुष्य अपने व्यक्तिगत धर्म एवं सामाजिक धर्म का पालन नहीं कर सकता, उससे कदापि यह आशा नहीं की जा सकती कि वह सामान्य धर्म का यथावत् पालन कर सकेगा। यदि मनुष्य किसी छोटे काम को योग्यता के