कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextतीसरा अध्याय
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इसी प्रकार जो पुरुष सिवा अपनी स्त्री के अन्य सबको माँ, बहन और पुत्री की दृष्टि से देखता है, कोई भी स्त्री उसको अपने धर्म से पतित न कर सकेगी। संसार में जो पुरुष शिक्षक या उपदेशक होने का अभिमान करते हैं, कम से कम उनको तो "मातृवत् परदारेषु" इस आप्त-वाक्य पर अपना विश्वास अपने आचरण से दिखलाना चाहिए।
संसार में माता की पदवी सबसे बड़ी है। माता से अधिक कोई निःस्वार्थ नहीं होता। माता के प्रेम से केवल ईश्वर के प्रेम को उच्च कक्षा में रक्खा गया है। संसार के और सब प्रेम इससे बहुत नीची कक्षा में हैं। सबसे पहले माता हमको निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। यदि ऐसे निःस्वार्थ शिक्षक को पाकर भी हम स्वार्थ में उन्मत्त रहे तो हमारे जीवन को धिक्कार है। वे पुरुष धन्य हैं कि जो अपने माता-पिता के निष्कपट प्रेम में ईश्वर के पवित्र प्रेम की झलक देखते हैं।
उन्नति का सरल और असन्दिग्ध मार्ग यह है कि अपने सामयिक कर्त्तव्य का पूर्ण ध्यान रहे और अपने साधारण धर्म का प्रतिपालन करते हुए दृढ़ता को सम्पादन किया जावे। अपने किसी कर्त्तव्य को भी लघु नहीं समझना चाहिए और न उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। छोटा काम करने से कोई छोटा नहीं होता। मनुष्य के महत्त्व की परीक्षा उसके काम से नहीं करनी चाहिए, किन्तु उसके काम करने के ढंग से करनी चाहिए। उसके कर्त्तव्य कार्यों के करने का क्रम और ढंग ही उसके जाँचने की कसौटी है। एक चमार, जो थोड़ी देर में दृढ़ और अच्छा जूता बना लेता है, उस