कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextतीसरा अध्याय ४१
ही अपना जीवन-सर्वस्व समझती हूँ । यही योग है जिसका मैं रात-दिन अभ्यास करती हूँ । यही कारण है कि मेरा अन्तःकरण स्वच्छ है और मैं तेरे मन के भाव को तुरन्त जान गई । यदि तू इससे अधिक और कुछ जानना चाहता है तो अमुक नगर में चला जा । वहाँ एक वधिक रहता है, वह तुझे उचित शिक्षा देगा ।”
योगी ने सोचा “मैं क्यों वधिक के पास जाऊँ, वह चाण्डाल है । उसके छूने में पाप है ।” परन्तु वह उस स्त्री की सिद्धि देख चुका था, इसलिए अब उसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि उसकी आज्ञा को भङ्ग कर सके । अब वह उस नगर में पहुँचा । वहाँ उसको एक हृष्ट-पुष्ट वधिक मिला, जो मांस बेचा करता था । योगी ने कहा—“हे परमेश्वर ! यह क्या मुझको ज्ञान सिखावेगा, यह तो महा नीच कर्म करता है ।” इसी अवसर में वधिक की दृष्टि योगी पर पड़ी । उसने आँख उठा कर कहा—“स्वामिन् ! तुमको उस पतिव्रता स्त्री ने ज्ञान सीखने के लिए मेरे पास भेजा है । तुम थोड़ी देर के लिए वृक्ष के नीचे बैठ जाओ, मैं अभी आवश्यक कार्य से निवृत्त होकर आता हूँ ।” योगी ने सोचा, “यह क्या रहस्य है ! अब देखो यहाँ क्या कौतुक होता है,” यह अपने मन में कहकर बैठ गया । वधिक अपना काम बराबर तत्पर होकर करता रहा । जब उससे निवृत्त हो गया, तब उसने योगी से कहा—“महाराज ! आइए, अब मेरे साथ गृह पर चलिए ।” दोनों प्रस्थित हुए । जब वहाँ पहुँचे, वधिक ने उसको एकान्त स्थान में बिठा कर कहा, आप यहाँ थोड़ी देर आराम कीजिए । यह कहकर वह घर के भीतर गया, जहाँ उसके माता-पिता रहते थे । उसने उनको न्हिलाया-धुलाया और खाना