कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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के साथ करो। किन्तु "हम दूसरों का उपकार करते हैं" इस तुच्छ और अनुचित भावना को अपने हृदय से निकाल दो। यद्यपि संसार आपकी सहायता की प्रतीक्षा नहीं करता तथापि हमको अपने धर्म के पालन में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए। यही हमारे अभ्युदय का मार्ग है और यही हमारे निःश्रेयस की भी निःश्रेणी है।
इस बात को मन में धारण करना कि हमने किसी का उपकार किया है, बड़ी भारी भूल है। इसका परिणाम पश्चात्ताप और दुःख है। हम समझते हैं कि हमने अमुक का उपकार किया है और इस आशा में हैं कि वह हमारा धन्यवाद करे और जब वह ऐसा नहीं करता तो हमको क्रोध उत्पन्न होता है और यही दुःख का कारण है। उदारता का बदला चाहना उसके मूल्य को घटाना है। निःस्वार्थ परोपकार से बढ़ कर और कोई ईश्वर की पूजा नहीं हो सकती। यदि हम अनासक्त (बेलाग) रहें तो इच्छा और आशा की प्रतीक्षा से जो दुःख उत्पन्न होते हैं, वे निर्मूल हो जावें। और हम आनन्द के साथ निर्द्वन्द्व होकर अपना अपना काम करें।
एक दरिद्र को रुपये की आवश्यकता थी। उसने किसी से सुन रखा था कि यदि भूत वश में हो जाय तो घर में रुपयों के ढेर लग जावें। उसके मस्तिष्क में यही धुन समा गई और वह ऐसे मनुष्य की खोज करने लगा जो भूत को वश में करने की क्रिया सिखा दे। निदान उसको एक महात्मा मिले। महात्मा ने पूछा— "तू क्या चाहता है?" उसने कहा— "मैं भूत चाहता हूँ, जो मेरे लिए काम करे।" महात्मा ने कहा— "पागल हुआ है, जा अपने घर को।"