करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextजा! तुझे मृत्यु को दान में दिया । वो चित्रगुप्त के पास पहुँचा । यमराज ने कहा कि तुम न्यायप्रिय हो, गलती से यहाँ आ गये हो, मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, माँगो क्या चाहते हो ? उसने कहा कि मुझे आत्मा का ज्ञान चाहिए । यमराज ने कहा कि यह मत माँगो। और जो कुछ तुम्हें चाहिए, मैं दे सकता हूँ, पर यह नहीं माँगो, यह नहीं दे पाऊँगा । कहने का मतलब है कि तीन लोक का राजा आत्मा का ज्ञान नहीं देना चाहता है। बाकी जो भी दिया, वो तो छूटेगा ही। जो हम चाह रहे हैं, वो सद्गुरु देना नहीं चाहता है, पर जो वो देना चाहता है, हम लेना नहीं चाहते हैं। दुनिया के लोग तो सांसारिक पदार्थ ही चाह रहे हैं। मैं तो कह रहा हूँ कि लोग वंशवाद के लिए, धन के लिए काम कर रहे हैं। उन्हें पहचानो । ब्रह्मनन्द ने बड़ी प्यारी बात कही- कोई हमसे पूछे यूँ आकर, दुनिया में तुमने क्या देखा ।
हम बतला देंगे यूँ उसको, सब मतलब का मेला देखा॥
हम मतलब के तुम मतलब के, ये मतलब के वो मतलब के।
गुलिस्तान में फूल खिला था, हमने देखा मतलब का ।
योगी देखे जंगम देखे, पीले कपड़े वाले देखे।
पर गले में उनके हार पड़ा था, हमने देखा मतलब का...॥
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कुछ कहते हैं कि नाम लेंगे तो पहले जिसकी भक्ति करते थे, वो तंग तो नहीं करेगा ? एक ने कहा कि नाम लूँगा तो पहले वाला गुरु तंग तो नहीं करेगा। मैंने कहा कि नहीं करेगा। जंगल में बकरी गुम हो गयी। उसके बड़े शिकारी हैं। वो सीधा शेर के पास पहुँची, कहा कि तुम्हारी शरण में हूँ । शेर ने कहा कि ठीक है, चिंता मत करना, तेरा कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता है। शेर ने भालू आदि मंत्रियों को बुलाया और कहा कि जंगल में ऐलान कर दो कि यह बकरी हमारी है, इसे कोई हाथ न लगाए । अब बकरी मज़े से जंगल में चरने लगी। वो मस्त घूमती थी। तो एक परम-पुरुष की भक्ति करने से बाकी कोई कुछ नहीं कर सकता