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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

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९०कठोपनिषद्[ अध्याय १

दितारतम्यं दृष्टमब्वादिषु याव-<br>दाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व<br>एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता<br>यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्म-<br>त्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम्<br>इत्येतद्दर्शयति श्रुतिः—आकाशपर्यन्त चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व,<br>महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व<br>आदिका तारतम्य देखा गया है ।<br>किन्तु स्थूल होनेके कारण जहाँ<br>गन्धसे लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे<br>विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादिकी<br>निरतिशयताके विषयमें क्या कहा<br>जाय ? यही बात आगेकी श्रुति<br>दिखलाती है—

'निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति'

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव (निश्चल) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं<br><br>तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्<br><br>एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम्—<br><br>यद्धि शब्दादिमत्तद्व्येतीदं तु<br><br>अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति<br><br>न क्षीयते, अत एव च नित्यं<br><br>यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु नजो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और अगन्धयुक्त है—ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अविनाशी है, क्योंकि जो पदार्थ शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है; किन्तु यह ब्रह्म तो अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्ययः है; इसका व्यय—क्षय नहीं होता, इसीलिये यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य है। इसका व्यय नहीं होता