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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

९० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

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९०कठोपनिषद्[ अध्याय १

दितारतम्यं दृष्टमब्वादिषु याव-<br>दाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व<br>एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता<br>यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्म-<br>त्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम्<br>इत्येतद्दर्शयति श्रुतिः—आकाशपर्यन्त चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व,<br>महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व<br>आदिका तारतम्य देखा गया है ।<br>किन्तु स्थूल होनेके कारण जहाँ<br>गन्धसे लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे<br>विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादिकी<br>निरतिशयताके विषयमें क्या कहा<br>जाय ? यही बात आगेकी श्रुति<br>दिखलाती है—

'निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति'

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव (निश्चल) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं<br><br>तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्<br><br>एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम्—<br><br>यद्धि शब्दादिमत्तद्व्येतीदं तु<br><br>अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति<br><br>न क्षीयते, अत एव च नित्यं<br><br>यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु नजो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और अगन्धयुक्त है—ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अविनाशी है, क्योंकि जो पदार्थ शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है; किन्तु यह ब्रह्म तो अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्ययः है; इसका व्यय—क्षय नहीं होता, इसीलिये यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य है। इसका व्यय नहीं होता

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१

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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
व्येत्यतो नित्यम् । इतश्च नित्यम् अनाद्यविद्यमान आदिः कारणम् अस्य तदिदमनादि । यद्द्यादिमत्तत्कार्यत्वादनित्यं कारणे प्रलीयते यथा पृथिव्यादि । इदं तु सर्वकारणत्वादकार्यमकार्यत्वान्नित्यं न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत ।इसलिये यह नित्य है । यह अनादि अर्थात् जिसका आदि—कारण विद्यमान नहीं है ऐसा होनेसे भी नित्य है, क्योंकि जो पदार्थ आदिमान् होता है वह कार्यरूप होनेसे अनित्य होता है और अपने कारणमें लीन हो जाता है; जैसे कि पृथिवी आदि । किन्तु यह आत्मा तो सबका कारण होनेसे अकार्य है और अकार्य होनेके कारण नित्य है । इसका कोई कारण नहीं है, जिसमें कि यह लीन हो ।
तथानन्तम् अविद्यमानोऽन्तः कार्यमस्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेन अपि अनित्यत्वं दृष्टं न च तथाप्यन्तवत्त्वं ब्रह्मणः; अतोऽपि नित्यम् ।इसी प्रकार यह आत्मा अनन्त भी है । जिसका अन्त अर्थात् कार्य अविद्यमान हो उसे अनन्त कहते हैं । जिस प्रकार फलादि कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली आदि पौधोंकी अनित्यता देखी गयी है उस प्रकार ब्रह्मका अन्तवत्त्व नहीं देखा गया । इसलिये भी वह नित्य है ।
महतो महत्तत्त्वाद्वुद्ध्याख्यात्परं विलक्षणं नित्यविज्ञप्तिस्वरूपत्वात्सर्वसाक्षि हि सर्वभूतात्मत्वाद्ब्रह्म । उक्तं हि "एष सर्वेषु भूतेषु" (क० उ० १।३।१२)नित्यविज्ञप्तिस्वरूप होनेके कारण बुद्धिसंज्ञक महत्तत्त्वसे भी पर अर्थात् विलक्षण है, क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा होनेके कारण सबका साक्षी है । यह बात उपर्युक्त "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते" इत्यादि मन्त्रमें कही ही

९२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

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९२कठोपनिषद्[ अध्याय १

| इत्यादि । ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं<br>न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्य-<br>त्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं<br>निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्यु-<br>मुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम-<br>कर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते । | गयी है। इसी प्रकार वह ध्रुव—<br>कूटस्थ नित्य है। उसकी नित्यता<br>पृथिवी आदिके समान आपेक्षिक<br>नहीं है। उस इस प्रकारके<br>ब्रह्म—आत्माको जानकर पुरुष<br>मृत्युमुखसे—अविद्या, काम और<br>कर्मरूप मृत्युके पंजेसे मुक्त—वियुक्त<br>हो जाता है ॥ १५ ॥ |

| प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः— | अब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिये श्रुति कहती है— |

प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥

नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा मृत्युके कहे हुए इस सनातन विज्ञानको कह और सुनकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥१६॥

| नाचिकेतं नचिकेतसा प्राप्तं<br>नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्यु-<br>प्रोक्तमिदमाख्यानमुपाख्यानं<br>वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं<br>वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्यः<br>श्रुत्वाचार्येभ्यो मेधावी ब्रह्मैव<br>लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत<br>आत्मभूत उपास्यो भवतीत्यर्थः<br>॥ १६ ॥ | नचिकेताद्वारा प्राप्त किये तथा<br>मृत्युके कहे हुए इस तीन वल्लियों-<br>वाले उपाख्यानको, जो वैदिक<br>होनेके कारण सनातन—चिरन्तन<br>है, ब्राह्मणोंसे कहकर तथा आचार्यों-<br>से सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोक-<br>में—ब्रह्म ही लोक है; उसमें<br>महिमान्वित होता है अर्थात् सबका<br>आत्मस्वरूप होकर उपासनीय<br>होता है ॥ १६ ॥ |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३

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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३


य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थको पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है, अनन्त फलवाला होता है ॥ १७॥


यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद्ग्रन्थतोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद्भुञ्जानानां तच्छ्राद्धमस्याऽऽनन्त्यायानन्तफलाय कल्पते संपद्यते । द्विर्वचनम् अध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १७ ॥जो कोई पुरुष इस परम—प्रकृष्ट और गुह्य—गोपनीय ग्रन्थको पवित्र होकर ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें—भोजन करनेके लिये बैठे हुए ब्राह्मणोंके प्रति केवल पाठमात्र या अर्थ करते हुए सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है । यहाँ अध्यायकी समाप्तिके लिये ‘तदानन्त्याय कल्पते’ यह वाक्य दो बार कहा गया है ॥१७॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ ३ ॥


इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

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द्वितीय अध्याय

प्रथमा वल्ली

आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता

| एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा<br><br>न प्रकाशते दृश्यते त्वग्र्यया<br><br>बुद्धयेत्युक्तम् । कः पुनः प्रति-<br><br>बन्धोऽग्रचाया बुद्धेर्येन तदभावात्<br><br>आत्मा न दृश्यत इति तद्दर्शन-<br><br>कारणप्रदर्शनार्था वल्लयारभ्यते ।<br><br>विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे<br><br>तदपनयनाय यत्न आरब्धुं शक्यते<br><br>नान्यथेति— | 'सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ वह आत्मा प्रकाशित नहीं होता; वह तो एकाग्र बुद्धिसे ही देखा जाता है' ऐसा पहले ( १ । ३ । १२ में ) कहा था । अब प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन प्रतिबन्ध है जिससे कि उस( एकाग्र बुद्धि ) का अभाव होनेपर आत्मा दिखायी नहीं देता ? अतः आत्मदर्शनके प्रतिबन्धका कारण दिखलानेके लिये यह वल्ली आरम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेयके प्रतिबन्धका कारण जान लेनेपर ही उसकी निवृत्तिके यत्नका आरम्भ किया जा सकता है, अन्यथा नहीं— |

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू-<br> स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।<br> कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-<br> दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

स्वयम्भू ( परमात्मा ) ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है । इसीसे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं । जिसने अमरत्वको इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ॥ १ ॥

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५


| पराञ्चि परागञ्चन्ति गच्छन्तीति खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि खानीत्युच्यन्ते। तानि पराञ्च्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्त्तन्ते। यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिंसितवान्हननं कृतवान् इत्यर्थः। कोऽसौ ? स्वयम्भूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति। तस्मात्पराङ् पराग्रूपाननात्मभूताञ्छब्दादीन्पश्यत्युपलभत उपलब्ध्वा, नान्तरात्मन्नान्तरात्मानमित्यर्थः।<br><br>एवंस्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चिन्नद्याः प्रतिस्रोतःप्रवर्त्तनमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं | जो पराक् अर्थात् बाहरकी ओर अञ्चन करती—गमन करती हैं उन्हें 'पराञ्चि' (बाहर जानेवाली) कहते हैं। 'ख' छिद्रोंको कहते हैं, उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ 'खानि'* नामसे कही गयी हैं। वे बहिर्मुख होकर ही शब्दादि विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ करती हैं। क्योंकि वे ऐसी हैं इसलिये स्वभावसे ही उन्हें हिंसित कर दिया है—उनका हनन कर दिया है। वह [हनन करनेवाला] कौन है ? स्वयम्भू—परमेश्वर अर्थात् जो स्वतः ही सर्वदा स्वतन्त्र रहता है—परतन्त्र नहीं रहता। इसलिये वह उपलब्ध्वा सर्वदा पराक् अर्थात् बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयोंको ही देखता—उपलब्ध करता है, 'नान्तरात्मन्' अर्थात् अन्तरात्माको नहीं।<br><br>यद्यपि लोकका ऐसा ही स्वभाव है तो भी कोई धीर—बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष ही नदीको उसके प्रवाहके विपरीत दिशामें फेर देनेके समान [इन्द्रियोंको विषयोंकी |


* नपुं० 'ख' शब्दका प्रथमा-बहुवचन।

९६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

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९६कठोपनिषद्[ अध्याय २
प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन्। व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते।<br><br>“यच्चाप्नोति यदादत्ते<br>  यच्चात्ति विषयानिह।<br>यच्चास्य संततो भाव-<br>  स्तस्मादात्मेति कीर्त्यते”<br>   (लिङ्ग० १। ७०। ९६)<br><br>इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात्।ओरसे हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्माको [देखता है]। जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयोंको जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें आत्मा शब्द ‘प्रत्यक्’ के अर्थमें ही रूढ है, और किसी अर्थमें नहीं। व्युत्पत्तिपक्षमें भी ‘आत्मा’ शब्दकी प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही) में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोकमें विषयोंको भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह ‘आत्मा’ कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें स्मृति है।
तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात्। कथं पश्यतीत्युच्यते। आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृतं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः। स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति। न हि बाह्यविषया-उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको ‘ऐक्षत्’—देखा यानी देखता है। वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया [ऐक्षत्] का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? इसपर कहते हैं—‘आवृत्तचक्षुः’ अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमूहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत कर लिया है—लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्माको देख पाता है। एक

| वल्ली १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७ |

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वल्ली १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९७
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
लोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य संभवति। किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् परिश्रमसे [इन्द्रियोंकी] स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको क्यों देखता है?' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं—'अमृतत्व—अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]' ॥१॥
यत्तत्स्वाभाविकं परागेव अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रतिकूलत्वात्। या च पराक्ष्वेवाविद्योपप्रदर्शिताेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्यातृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः—जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है, क्योंकि वह उस (आत्मदर्शन) के प्रतिकूल है। इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीसे जिनका आत्मदर्शन प्रतिरुद्ध हो रहा है वे—

अविवेकी और विवेकीका अन्तर

पराचः कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥

९८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

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९८कठोपनिषद्[ अध्याय २

अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगोंके पीछे लगे रहते हैं। वे मृत्युके सर्वत्र फैले हुए पाशमें पड़ते हैं। किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते ॥ २ ॥

| पराचो बहिर्गतानेव कामान् काम्यान्विषयाननुयन्ति अनुगच्छन्ति बाला अल्पप्रज्ञास्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते येन तं पाशं देहेन्द्रियादिसंयोगवियोगलक्षणम्। अनवरतजन्ममरणजरारोगाद्यनेकानर्थव्रातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः।<br><br>यत एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिनः प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाद्यमृतत्वं ह्यध्रुवमिदं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणं “न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्” (बृ० उ० ४।४।२३) इति ध्रुवम्। तदेवंभूतं कूटस्थमविचाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु सर्वपदार्थेष्वनित्येषु निर्धार्य | बाल--मन्दमति पुरुष पराक्--बाह्य कामनाओंका--काम्यविषयोंका ही अनुगमन--पीछा किया करते हैं। इसी कारणसे वे अविद्या काम और कर्मके समुदायरूप मृत्युके वितत--विस्तीर्ण--सर्वत्र व्याप्त पाशमें [पड़ते हैं]। जिससे जीव पाशित होता है--बाँधा जाता है उस देहेन्द्रियादिके संयोगवियोगरूप पाशमें पड़ते हैं। अर्थात् निरन्तर जन्म-मरण, जरा और रोग आदि बहुतसे अनर्थसमूहको प्राप्त होते हैं।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है इसलिये धीर--विवेकी पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर; देवता आदिका अमृतत्व तो अध्रुव है किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्व “यह कर्मसे न बढ़ता है न घटता है” इस उक्तिके अनुसार ध्रुव है। इस प्रकारके अमृतत्वको कूटस्थ और अविचाल्य जानकर वे ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) लोग इस अनर्थप्राय संसारके सम्पूर्ण |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९


ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किंचिदपि प्रत्यगात्म-दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्त-लोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्ये-वेत्यर्थः ॥ २ ॥अध्रुव—अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही हैं। अर्थात् वे पुत्र, वित्त और लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥
यद्विज्ञानान्न किंचिदन्यत् प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्युच्यते—ब्राह्मण लोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं—

आत्मज्ञकी सर्वज्ञता

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥

जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥

येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्य-यान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः ।सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञान-स्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन—मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया जानता है [ वही ब्रह्म है ] ।
ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं वि-जानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽव-गच्छति ।शङ्का—परन्तु लोकमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ। सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातस्वरूप ही सब कुछ जानता हूँ।

| १०० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |

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१००कठोपनिषद्[ अध्याय २

| [दृग्दृश्य-विवेचनम्]<br>न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम्। यदि हि देहादिसंघातो रूपाद्यात्मकः सन् रूपादीन्विजानीयाद्वाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः। न चैतदस्ति । तस्माद्देहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तेनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानाति लोकः । यथा येन लोहो दहति सोऽग्निरिति तद्वत् ।<br><br>आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिँल्लोके परिशिष्यते न किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न किंचित्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यत् नचिकेत्सा पृष्टं देवादिभिरपि | समाधान—ऐसी बात तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपसे शब्दादिरूप तथा विज्ञेयरूप है; अतः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है। यदि देहादि संघात रूप-रसादिखरूप होकर भी रूपादिको जान ले तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक-दूसरेको तथा अपने-अपने रूपको जान लेंगे; किन्तु यह बात है नहीं। अतः लोक देहादि-स्वरूप रूपादिको इस देहादि-व्यतिरिक्त विज्ञानस्वभाव आत्माके द्वारा ही जानता है। जिस प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलाता है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयोंको जानता है उसे आत्मा कहते हैं]।<br><br>उस आत्मासे जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोकमें रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—सभी कुछ आत्मासे ही जाना जा सकता है। [इस प्रकार] जिस आत्मासे अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। वह कौन है? जिसके विषयमें तुझ नचिकेताने प्रश्न किया है, जो देवादिका भी सन्देहास्पद है तथा |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१


| विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३ ॥ | जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्म-पद] अत्र ज्ञात हुआ है—ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥ |


| अतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह— | वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है—ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं— |

आत्मज्ञकी निःशोकता

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥

जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्‌में दिखायी देनेवाले—दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

| स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येन आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्वं पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य अर्थात् स्वप्नावस्थामें जानने योग्य तथा जागरितान्त—जाग्रत् अवस्थाका मध्य यानी जाग्रत् अवस्थामें जाननेयोग्य—इन दोनों स्वप्न और जाग्रत्‌के अन्तर्गत पदार्थोंको लोक जिस आत्माके द्वारा देखता है [वही ब्रह्म है; इस प्रकार] इस वाक्यकी और सब व्याख्या पूर्व मन्त्रके समान करनी चाहिये । उस |

१०२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

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१०२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षात् अहमास्मि परमात्मेति धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् 'वह परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ | | किं च— | तथा— |

आत्मज्ञकी निर्भयता

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥

जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता और प्राणादिको धारण करनेवाले आत्माको उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] के शासकरूपसे जानता है वह वैसा विज्ञान हो जानेके अनन्तर उस (आत्मा) की रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता । निश्चय यही वह [ आत्मतत्त्व ] है ॥ ५ ॥

यः कश्चिदिमं मध्वदं कर्मफलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य धारयितारमात्मानं वेद विजानाति अन्तिकादन्तिके समीप ईशानम् ईशितारं भूतभव्यस्य कालत्रयस्य, ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुम् इच्छत्यभयप्राप्तत्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् ।जो कोई इस मध्वद—कर्मफलभोक्ता और जीव—प्राणादि कारणकलापको धारण करनेवाले आत्माको समीपसे भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालोंके शासकरूपसे जानता है, वह ऐसा ज्ञान हो जानेके अनन्तर उस आत्माका गोपन—रक्षण नहीं करना चाहता, क्योंकि वह अभयको प्राप्त हो जाता है । जबतक वह भयके मध्यमें स्थित हुआ अपने आत्माको अनित्य समझता है तभीतक उसकी रक्षा भी करना चाहता

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३


| यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतो वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५ ॥ | है । जिस समय आत्माको नित्य और अद्वैत जान लेता है उस समय कौन किसको कहाँसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा करेगा ? निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ५ ॥ |


| यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति— | जिस प्रत्यगात्माका यहाँ ईश्वर भावसे निर्देश किया गया है वह सबका अन्तरात्मा है—यह बात इस मन्त्रसे दिखलायी जाती है— |

ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन

यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥६॥

जो मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए [हिरण्यगर्भ] को, जो कि जल आदि भूतोंसे पहले उत्पन्न हुआ है, भूतोंके सहित बुद्धिरूप गुहामें स्थित हुआ देखता है वही उस ब्रह्मको देखता है । निश्चय यही वह ब्रह्म है ॥ ६ ॥

| यः कश्चिन्मुमुक्षुः पूर्वं प्रथमं तपसो ज्ञानादिलक्षणाद्ब्रह्मण इत्येतज्जातमुत्पन्नं हिरण्यगर्भम्; किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह—अद्भ्यः पूर्वमप्सहितेभ्यः पञ्चभूतेभ्यो न केवलाभ्योऽद्भ्य इत्यभिप्रायः, | जिस मुमुक्षुने पहले तपसे—ज्ञानादिलक्षण ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको । किसकी अपेक्षा पूर्व उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—जो जलसे पूर्व अर्थात् जलसहित पाँचों तत्त्वोंसे, न कि केवल जलसे ही, पूर्व उत्पन्न हुआ है उस प्रथमज |

१०४ कठोपनिषद् [ अध्याय २

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१०४ कठोपनिषद् [ अध्याय २


अजायत उत्पन्नो यस्तं प्रथमजं देवादिशरीराण्युत्पाद्य सर्वप्राणिगुहां हृदयाकाशं प्रविश्य तिष्ठन्तं शब्दादीनुपलभमानं भूतेभिर्भूतैः कार्यकारणलक्षणैः सह तिष्ठन्तं यो व्यपश्यत यः पश्यतीत्येतत् । य एवं पश्यति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म ॥ ६ ॥(हिरण्यगर्भ) को देवादि शरीरोंको उत्पन्न कर सम्पूर्ण प्राणियोंकी गुहा—हृदयाकाशमें प्रविष्ट हो कार्य-कारणरूप भूतोंके सहित शब्दादि विषयोंको अनुभव करते जिसने देखा है यानी जो इस प्रकार देखता है [वही वास्तवमें देखता है]। जो ऐसा अनुभव करता है वही उसे देखता है जो कि यह प्रकृत ब्रह्म है॥ ६॥
किं च—तथा—

या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥७॥

जो देवतामयी अदिति प्राणरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूप गुहामें प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [उसे देखो] निश्चय यही वह तत्त्व है ॥ ७ ॥

या सर्वदेवतामयी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण परस्माद्ब्रह्मणः संभवति शब्दादीनामदनाददितिस्तां पूर्ववद्गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीमदितिम् । तामेव विशिनष्टि-या भूतेभिःजो सर्वदेवतामयी—सर्वदेवस्वरूपा अदिति प्राण अर्थात् हिरण्यगर्भरूपसे परब्रह्मसे उत्पन्न होती है; शब्दादि विषयोंका अदन (भक्षण) करनेके कारण उसे अदिति कहते हैं—बुद्धिरूप गुहामें पूर्ववत् प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस अदितिको [देखो]। उस अदितिकी ही विशेषता बतलाते हैं—

. वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५

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. वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५


भूतैः समन्विता व्यजायत उत्पन्ना<br><br>इत्येतत् ॥ ७ ॥जो भूतोंके सहित अर्थात् भूतोंसे समन्वित ही उत्पन्न हुई है। [ वही तेरा पूछा हुआ तत्त्व है ] ॥ ७ ॥

अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि

किं च—तथा—

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥
एतद्वै तत् ॥ ८ ॥

गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा भली प्रकार पोषित हुए गर्भके समान जो जातवेदा ( अग्नि ) दोनों अरणियोंके बीचमें स्थित है तथा जो प्रमाद-शून्य एवं होम-सामग्रीयुक्त पुरुषोंद्वारा नित्यप्रति स्तुति किये जाने योग्य है, वही वह ब्रह्म है ॥ ८ ॥

योऽधियज्ञ उत्तराधरारण्योः निहितः स्थितो जातवेदा अग्निः पुनः सर्वहविषां भोक्ताध्यात्मं च योगिभिर्गर्भ इव गर्भिणीभिः अन्तर्वत्नीभिरगर्हितान्नपानभोजनादिना यथा गर्भः सुभृतः सुष्ठु सम्यग्भृतो लोक इवेत्थमेवर्त्विग्भिर्योगिभिश्च सुभृत इत्येतत् । किं च दिवे दिवेऽहन्यहनीड्यः स्तुत्यो वन्द्यश्च कर्मिभिर्योगिभिश्चाध्वरे हृदये च जागृवद्भिः जागरणशीलवद्भिरप्रमत्तैरित्येतत् ।जो अधियज्ञरूपसे ऊपर और नीचेकी अरणियोंमें निहित अर्थात् स्थित हुआ और होम किये हुए सम्पूर्ण पदार्थोंका भोक्ता अध्यात्मरूप जातवेदा—अग्नि है; जैसे गर्भिणी—अन्तर्वत्नी स्त्रियाँ शुद्ध अन्न-पानादिद्वारा अपने गर्भकी बहुत अच्छी तरह रक्षा करती हैं उसी प्रकार यज्ञ करनेवाले तथा योगीजन जिसे धारण करते हैं, तथा घृत आदि होमसामग्रीयुक्त, कर्म-परायण एवं जागरणशील—प्रमाद-शून्य याजकों और ध्यान-भावना-

१०६ कठोपनिषद् [ अध्याय २

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१०६ कठोपनिषद् [ अध्याय २


हविष्मद्भिराज्यादिमद्भिर्ध्यान-भावनावद्भिश् मनुष्येभिर्मनुष्यैः अग्निः। एतद्वै तत्तदेव प्रकृतं ब्रह्म ८युक्त योगियोंद्वारा जो [क्रमशः ] यज्ञ और हृदयदेशमें स्तुति किये जाने योग्य है, ऐसा जो अग्नि है वही निश्चय यह प्रकृत ब्रह्म है ॥८॥

प्राणमें ब्रह्मदृष्टि

किं च—तथा—

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥९॥

जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त हो जाता है उस प्राणात्मामें [अग्न्यादि और वागादिक] सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं। उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। यही वह ब्रह्म है ॥९॥

यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यहनि गच्छति तं प्राणमात्मानं देवा अग्न्यादयोऽधिदैवं वागादयश्च अध्यात्मं सर्वे विश्वेऽरा इव रथनाभावर्पिताः संप्रवेशिताः स्थितिकाले सोऽपि ब्रह्मैव। तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म। तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकतां तदन्यत्वं गच्छति कश्चन कश्चिदपि। एतद्वै तत् ॥९॥जिससे—जिस प्राणसे नित्य-प्रति सूर्य उदित होता है और जिस प्राणमें ही वह नित्य-प्रति अस्त भावको प्राप्त होता है उस प्राणात्मामें स्थितिके समय अग्नि आदि अधिदैव और वागादि अध्यात्म सभी देवता इस प्रकार अर्पित हैं—प्रविष्ट किये गये हैं जैसे रथकी नाभिमें समस्त अरे; वह [ प्राण ] भी ब्रह्म ही है। वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है। उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं करता अर्थात् उस ब्रह्मके तादात्म्य भावको पार करके कोई भी उससे अन्यत्वको प्राप्त नहीं होता। यही वह (ब्रह्म) है ॥९॥

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७


यद्ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्तमानं तत्तदुपाधित्वादब्रह्मवदवभासमानं संसार्यन्यत्परस्माद् ब्रह्मण इति मा भूत्कस्यचिदाशङ्का इतीदमाह—जो ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें वर्तमान है और भिन्न-भिन्न उपाधियोंके कारण अब्रह्मवत् भासित होता है वह संसारी जीव परब्रह्मसे भिन्न है—ऐसी किसीको शङ्का न हो जाय, इसलिये यमराज इस प्रकार कहते हैं—

भेददृष्टिकी निन्दा

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥

जो तत्त्व इस (देहेन्द्रियसङ्घात) में भासता है वही अन्यत्र (देहादिसे परे) भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है। जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्व देखता है वह मृत्युसे मृत्युको [अर्थात् जन्म-मरणको] प्राप्त होता है ॥ १० ॥

यदेवेह कार्यकारणोपाधिसमन्वितं संसारधर्मवदवभासमानमविवेकिनां तदेव स्वात्मस्थममुत्र नित्यविज्ञानघनस्वभावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म । यच्चामुत्रामुष्मिन्नात्मनि स्थितं तदेवेह नामरूपकार्यकरणोपाधिम् अनुविभाव्यमानं नान्यत् ।जो इस लोकमें कार्य-करण (देहेन्द्रिय) रूप उपाधिसे युक्त होकर अविवेकियोंको संसारधर्मयुक्त भास रहा है स्वस्वरूपमें स्थित वही ब्रह्म अन्यत्र (इन देहादिसे परे) नित्य विज्ञानघनस्वरूप और सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित है। तथा जो अमुत्र—उस आत्मामें अर्थात् परमात्मभावमें स्थित है वही इस लोकमें नाम-रूप एवं कार्य-करणरूप उपाधिके अनुरूप भासनेवाला आत्मतत्त्व है; और कोई नहीं।

१०८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

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१०८कठोपनिषद्[ अध्याय २

तत्रैवं सत्युपाधिस्वभावभेददृष्टिलक्षणयाविद्यया मोहितः सन् य इह ब्रह्मण्यनानाभूते परस्मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्मेति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते स मृत्योर्मरणान्मरणं मृत्युं पुनः पुनर्जन्ममरणभावमाप्नोति प्रतिपद्यते । तस्मात्तथा न पश्येत् । विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत् परिपूर्णं ब्रह्मैवाहमस्मीति पश्येत् इति वाक्यार्थः ॥ १० ॥ऐसा होनेपर भी जो पुरुष उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप अविद्यासे मोहित होकर इस अभिन्नभूत—एकरूप ब्रह्ममें 'मैं परमात्मासे भिन्न हूँ और परमात्मा मुझसे भिन्न है'—इस प्रकार भिन्नवत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको अर्थात् बारम्बार जन्म-मरणभावको प्राप्त होता है । अतः ऐसी दृष्टि नहीं करनी चाहिये । बल्कि 'मैं निर्बाधरूपसे आकाशके समान परिपूर्ण और विज्ञानैकरस-स्वरूप ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार देखे । यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ १० ॥

प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्यगमसंस्कृतेनएकत्व-ज्ञान होनेसे पहले आचार्य और शास्त्रसे संस्कारयुक्त हुए

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥

मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है । इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है । जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११ ॥


मनसेदं ब्रह्मैकरसमाप्तव्यम् आत्मैव नान्यदस्तीति । आप्तेमनके द्वारा ही यह एकरस ब्रह्म 'सब कुछ आत्मा ही है, और
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९


| च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्त्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किंचनाणुमात्रम् अपि । यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्युं गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन् इत्यर्थः ॥११॥ | कुछ नहीं है' इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है । इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किञ्चित्--अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता । किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता बल्कि नानात्व ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [ अर्थात् जन्म-मरणको ] प्राप्त होता ही है ॥ ११ ॥ |

हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म

पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह—फिर भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं—

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥

जो अङ्गुष्ठपरिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] का शासक जानकर वह उस ( आत्माके ज्ञान ) के कारण अपने शरीरकी रक्षा करना नहीं चाहता; निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥ १२ ॥

अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठपरिमाणः ।<br><br>अङ्गुष्ठपरिमाणं हृदयपुण्डरीकं तच्छिद्रवर्त्यन्तःकरणोपाधिःअङ्गुष्ठमात्र यानी अङ्गुष्ठपरिमाण; हृदयकमल अङ्गुष्ठके समान परिमाणवाला है; उसके छिद्रमें रहनेवाला जो अन्तःकरणोपाधिक