कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
९६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| ९६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन्। व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते।<br><br>“यच्चाप्नोति यदादत्ते<br> यच्चात्ति विषयानिह।<br>यच्चास्य संततो भाव-<br> स्तस्मादात्मेति कीर्त्यते”<br> (लिङ्ग० १। ७०। ९६)<br><br>इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात्। | ओरसे हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्माको [देखता है]। जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयोंको जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें आत्मा शब्द ‘प्रत्यक्’ के अर्थमें ही रूढ है, और किसी अर्थमें नहीं। व्युत्पत्तिपक्षमें भी ‘आत्मा’ शब्दकी प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही) में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोकमें विषयोंको भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह ‘आत्मा’ कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें स्मृति है। |
| तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात्। कथं पश्यतीत्युच्यते। आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृतं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः। स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति। न हि बाह्यविषया- | उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको ‘ऐक्षत्’—देखा यानी देखता है। वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया [ऐक्षत्] का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? इसपर कहते हैं—‘आवृत्तचक्षुः’ अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमूहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत कर लिया है—लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्माको देख पाता है। एक |
| वल्ली १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७ |
| वल्ली १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७ |
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| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| लोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य संभवति। किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥ | ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् परिश्रमसे [इन्द्रियोंकी] स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको क्यों देखता है?' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं—'अमृतत्व—अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]' ॥१॥ |
| यत्तत्स्वाभाविकं परागेव अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रतिकूलत्वात्। या च पराक्ष्वेवाविद्योपप्रदर्शिताेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्यातृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः— | जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है, क्योंकि वह उस (आत्मदर्शन) के प्रतिकूल है। इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीसे जिनका आत्मदर्शन प्रतिरुद्ध हो रहा है वे— |
अविवेकी और विवेकीका अन्तर
पराचः कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥
९८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| ९८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगोंके पीछे लगे रहते हैं। वे मृत्युके सर्वत्र फैले हुए पाशमें पड़ते हैं। किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते ॥ २ ॥
| पराचो बहिर्गतानेव कामान् काम्यान्विषयाननुयन्ति अनुगच्छन्ति बाला अल्पप्रज्ञास्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते येन तं पाशं देहेन्द्रियादिसंयोगवियोगलक्षणम्। अनवरतजन्ममरणजरारोगाद्यनेकानर्थव्रातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः।<br><br>यत एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिनः प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाद्यमृतत्वं ह्यध्रुवमिदं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणं “न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्” (बृ० उ० ४।४।२३) इति ध्रुवम्। तदेवंभूतं कूटस्थमविचाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु सर्वपदार्थेष्वनित्येषु निर्धार्य | बाल--मन्दमति पुरुष पराक्--बाह्य कामनाओंका--काम्यविषयोंका ही अनुगमन--पीछा किया करते हैं। इसी कारणसे वे अविद्या काम और कर्मके समुदायरूप मृत्युके वितत--विस्तीर्ण--सर्वत्र व्याप्त पाशमें [पड़ते हैं]। जिससे जीव पाशित होता है--बाँधा जाता है उस देहेन्द्रियादिके संयोगवियोगरूप पाशमें पड़ते हैं। अर्थात् निरन्तर जन्म-मरण, जरा और रोग आदि बहुतसे अनर्थसमूहको प्राप्त होते हैं।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है इसलिये धीर--विवेकी पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर; देवता आदिका अमृतत्व तो अध्रुव है किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्व “यह कर्मसे न बढ़ता है न घटता है” इस उक्तिके अनुसार ध्रुव है। इस प्रकारके अमृतत्वको कूटस्थ और अविचाल्य जानकर वे ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) लोग इस अनर्थप्राय संसारके सम्पूर्ण |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९
| ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किंचिदपि प्रत्यगात्म-दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्त-लोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्ये-वेत्यर्थः ॥ २ ॥ | अध्रुव—अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही हैं। अर्थात् वे पुत्र, वित्त और लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥ |
| यद्विज्ञानान्न किंचिदन्यत् प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्युच्यते— | ब्राह्मण लोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं— |
आत्मज्ञकी सर्वज्ञता
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥
जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥
| येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्य-यान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः । | सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञान-स्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन—मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया जानता है [ वही ब्रह्म है ] । |
| ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं वि-जानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽव-गच्छति । | शङ्का—परन्तु लोकमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ। सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातस्वरूप ही सब कुछ जानता हूँ। |
| १०० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
| १०० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| [दृग्दृश्य-विवेचनम्]<br>न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम्। यदि हि देहादिसंघातो रूपाद्यात्मकः सन् रूपादीन्विजानीयाद्वाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः। न चैतदस्ति । तस्माद्देहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तेनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानाति लोकः । यथा येन लोहो दहति सोऽग्निरिति तद्वत् ।<br><br>आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिँल्लोके परिशिष्यते न किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न किंचित्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यत् नचिकेत्सा पृष्टं देवादिभिरपि | समाधान—ऐसी बात तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपसे शब्दादिरूप तथा विज्ञेयरूप है; अतः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है। यदि देहादि संघात रूप-रसादिखरूप होकर भी रूपादिको जान ले तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक-दूसरेको तथा अपने-अपने रूपको जान लेंगे; किन्तु यह बात है नहीं। अतः लोक देहादि-स्वरूप रूपादिको इस देहादि-व्यतिरिक्त विज्ञानस्वभाव आत्माके द्वारा ही जानता है। जिस प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलाता है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयोंको जानता है उसे आत्मा कहते हैं]।<br><br>उस आत्मासे जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोकमें रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—सभी कुछ आत्मासे ही जाना जा सकता है। [इस प्रकार] जिस आत्मासे अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। वह कौन है? जिसके विषयमें तुझ नचिकेताने प्रश्न किया है, जो देवादिका भी सन्देहास्पद है तथा |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१
| विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३ ॥ | जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्म-पद] अत्र ज्ञात हुआ है—ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥ |
| अतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह— | वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है—ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं— |
आत्मज्ञकी निःशोकता
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्में दिखायी देनेवाले—दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥
| स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येन आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्वं पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य अर्थात् स्वप्नावस्थामें जानने योग्य तथा जागरितान्त—जाग्रत् अवस्थाका मध्य यानी जाग्रत् अवस्थामें जाननेयोग्य—इन दोनों स्वप्न और जाग्रत्के अन्तर्गत पदार्थोंको लोक जिस आत्माके द्वारा देखता है [वही ब्रह्म है; इस प्रकार] इस वाक्यकी और सब व्याख्या पूर्व मन्त्रके समान करनी चाहिये । उस |
१०२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १०२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षात् अहमास्मि परमात्मेति धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् 'वह परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ | | किं च— | तथा— |
आत्मज्ञकी निर्भयता
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥
जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता और प्राणादिको धारण करनेवाले आत्माको उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] के शासकरूपसे जानता है वह वैसा विज्ञान हो जानेके अनन्तर उस (आत्मा) की रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता । निश्चय यही वह [ आत्मतत्त्व ] है ॥ ५ ॥
| यः कश्चिदिमं मध्वदं कर्मफलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य धारयितारमात्मानं वेद विजानाति अन्तिकादन्तिके समीप ईशानम् ईशितारं भूतभव्यस्य कालत्रयस्य, ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुम् इच्छत्यभयप्राप्तत्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् । | जो कोई इस मध्वद—कर्मफलभोक्ता और जीव—प्राणादि कारणकलापको धारण करनेवाले आत्माको समीपसे भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालोंके शासकरूपसे जानता है, वह ऐसा ज्ञान हो जानेके अनन्तर उस आत्माका गोपन—रक्षण नहीं करना चाहता, क्योंकि वह अभयको प्राप्त हो जाता है । जबतक वह भयके मध्यमें स्थित हुआ अपने आत्माको अनित्य समझता है तभीतक उसकी रक्षा भी करना चाहता |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३
| यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतो वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५ ॥ | है । जिस समय आत्माको नित्य और अद्वैत जान लेता है उस समय कौन किसको कहाँसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा करेगा ? निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ५ ॥ |
| यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति— | जिस प्रत्यगात्माका यहाँ ईश्वर भावसे निर्देश किया गया है वह सबका अन्तरात्मा है—यह बात इस मन्त्रसे दिखलायी जाती है— |
ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥६॥
जो मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए [हिरण्यगर्भ] को, जो कि जल आदि भूतोंसे पहले उत्पन्न हुआ है, भूतोंके सहित बुद्धिरूप गुहामें स्थित हुआ देखता है वही उस ब्रह्मको देखता है । निश्चय यही वह ब्रह्म है ॥ ६ ॥
| यः कश्चिन्मुमुक्षुः पूर्वं प्रथमं तपसो ज्ञानादिलक्षणाद्ब्रह्मण इत्येतज्जातमुत्पन्नं हिरण्यगर्भम्; किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह—अद्भ्यः पूर्वमप्सहितेभ्यः पञ्चभूतेभ्यो न केवलाभ्योऽद्भ्य इत्यभिप्रायः, | जिस मुमुक्षुने पहले तपसे—ज्ञानादिलक्षण ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको । किसकी अपेक्षा पूर्व उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—जो जलसे पूर्व अर्थात् जलसहित पाँचों तत्त्वोंसे, न कि केवल जलसे ही, पूर्व उत्पन्न हुआ है उस प्रथमज |
१०४ कठोपनिषद् [ अध्याय २
१०४ कठोपनिषद् [ अध्याय २
| अजायत उत्पन्नो यस्तं प्रथमजं देवादिशरीराण्युत्पाद्य सर्वप्राणिगुहां हृदयाकाशं प्रविश्य तिष्ठन्तं शब्दादीनुपलभमानं भूतेभिर्भूतैः कार्यकारणलक्षणैः सह तिष्ठन्तं यो व्यपश्यत यः पश्यतीत्येतत् । य एवं पश्यति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृतं ब्रह्म ॥ ६ ॥ | (हिरण्यगर्भ) को देवादि शरीरोंको उत्पन्न कर सम्पूर्ण प्राणियोंकी गुहा—हृदयाकाशमें प्रविष्ट हो कार्य-कारणरूप भूतोंके सहित शब्दादि विषयोंको अनुभव करते जिसने देखा है यानी जो इस प्रकार देखता है [वही वास्तवमें देखता है]। जो ऐसा अनुभव करता है वही उसे देखता है जो कि यह प्रकृत ब्रह्म है॥ ६॥ |
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| किं च— | तथा— |
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या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥७॥
जो देवतामयी अदिति प्राणरूपसे प्रकट होती है तथा जो बुद्धिरूप गुहामें प्रविष्ट होकर रहनेवाली और भूतोंके साथ ही उत्पन्न हुई है [उसे देखो] निश्चय यही वह तत्त्व है ॥ ७ ॥
| या सर्वदेवतामयी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्यगर्भरूपेण परस्माद्ब्रह्मणः संभवति शब्दादीनामदनाददितिस्तां पूर्ववद्गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीमदितिम् । तामेव विशिनष्टि-या भूतेभिः | जो सर्वदेवतामयी—सर्वदेवस्वरूपा अदिति प्राण अर्थात् हिरण्यगर्भरूपसे परब्रह्मसे उत्पन्न होती है; शब्दादि विषयोंका अदन (भक्षण) करनेके कारण उसे अदिति कहते हैं—बुद्धिरूप गुहामें पूर्ववत् प्रविष्ट होकर स्थित हुई उस अदितिको [देखो]। उस अदितिकी ही विशेषता बतलाते हैं— |
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. वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
. वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
| भूतैः समन्विता व्यजायत उत्पन्ना<br><br>इत्येतत् ॥ ७ ॥ | जो भूतोंके सहित अर्थात् भूतोंसे समन्वित ही उत्पन्न हुई है। [ वही तेरा पूछा हुआ तत्त्व है ] ॥ ७ ॥ |
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अरणिस्थ अग्निमें ब्रह्मदृष्टि
| किं च— | तथा— |
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अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।
दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥
एतद्वै तत् ॥ ८ ॥
गर्भिणी स्त्रियोंद्वारा भली प्रकार पोषित हुए गर्भके समान जो जातवेदा ( अग्नि ) दोनों अरणियोंके बीचमें स्थित है तथा जो प्रमाद-शून्य एवं होम-सामग्रीयुक्त पुरुषोंद्वारा नित्यप्रति स्तुति किये जाने योग्य है, वही वह ब्रह्म है ॥ ८ ॥
| योऽधियज्ञ उत्तराधरारण्योः निहितः स्थितो जातवेदा अग्निः पुनः सर्वहविषां भोक्ताध्यात्मं च योगिभिर्गर्भ इव गर्भिणीभिः अन्तर्वत्नीभिरगर्हितान्नपानभोजनादिना यथा गर्भः सुभृतः सुष्ठु सम्यग्भृतो लोक इवेत्थमेवर्त्विग्भिर्योगिभिश्च सुभृत इत्येतत् । किं च दिवे दिवेऽहन्यहनीड्यः स्तुत्यो वन्द्यश्च कर्मिभिर्योगिभिश्चाध्वरे हृदये च जागृवद्भिः जागरणशीलवद्भिरप्रमत्तैरित्येतत् । | जो अधियज्ञरूपसे ऊपर और नीचेकी अरणियोंमें निहित अर्थात् स्थित हुआ और होम किये हुए सम्पूर्ण पदार्थोंका भोक्ता अध्यात्मरूप जातवेदा—अग्नि है; जैसे गर्भिणी—अन्तर्वत्नी स्त्रियाँ शुद्ध अन्न-पानादिद्वारा अपने गर्भकी बहुत अच्छी तरह रक्षा करती हैं उसी प्रकार यज्ञ करनेवाले तथा योगीजन जिसे धारण करते हैं, तथा घृत आदि होमसामग्रीयुक्त, कर्म-परायण एवं जागरणशील—प्रमाद-शून्य याजकों और ध्यान-भावना- |
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१०६ कठोपनिषद् [ अध्याय २
१०६ कठोपनिषद् [ अध्याय २
| हविष्मद्भिराज्यादिमद्भिर्ध्यान-भावनावद्भिश् मनुष्येभिर्मनुष्यैः अग्निः। एतद्वै तत्तदेव प्रकृतं ब्रह्म ८ | युक्त योगियोंद्वारा जो [क्रमशः ] यज्ञ और हृदयदेशमें स्तुति किये जाने योग्य है, ऐसा जो अग्नि है वही निश्चय यह प्रकृत ब्रह्म है ॥८॥ |
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प्राणमें ब्रह्मदृष्टि
| किं च— | तथा— |
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यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥९॥
जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त हो जाता है उस प्राणात्मामें [अग्न्यादि और वागादिक] सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं। उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। यही वह ब्रह्म है ॥९॥
| यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यहनि गच्छति तं प्राणमात्मानं देवा अग्न्यादयोऽधिदैवं वागादयश्च अध्यात्मं सर्वे विश्वेऽरा इव रथनाभावर्पिताः संप्रवेशिताः स्थितिकाले सोऽपि ब्रह्मैव। तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म। तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकतां तदन्यत्वं गच्छति कश्चन कश्चिदपि। एतद्वै तत् ॥९॥ | जिससे—जिस प्राणसे नित्य-प्रति सूर्य उदित होता है और जिस प्राणमें ही वह नित्य-प्रति अस्त भावको प्राप्त होता है उस प्राणात्मामें स्थितिके समय अग्नि आदि अधिदैव और वागादि अध्यात्म सभी देवता इस प्रकार अर्पित हैं—प्रविष्ट किये गये हैं जैसे रथकी नाभिमें समस्त अरे; वह [ प्राण ] भी ब्रह्म ही है। वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है। उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं करता अर्थात् उस ब्रह्मके तादात्म्य भावको पार करके कोई भी उससे अन्यत्वको प्राप्त नहीं होता। यही वह (ब्रह्म) है ॥९॥ |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
| यद्ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु वर्तमानं तत्तदुपाधित्वादब्रह्मवदवभासमानं संसार्यन्यत्परस्माद् ब्रह्मण इति मा भूत्कस्यचिदाशङ्का इतीदमाह— | जो ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें वर्तमान है और भिन्न-भिन्न उपाधियोंके कारण अब्रह्मवत् भासित होता है वह संसारी जीव परब्रह्मसे भिन्न है—ऐसी किसीको शङ्का न हो जाय, इसलिये यमराज इस प्रकार कहते हैं— |
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भेददृष्टिकी निन्दा
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥
जो तत्त्व इस (देहेन्द्रियसङ्घात) में भासता है वही अन्यत्र (देहादिसे परे) भी है और जो अन्यत्र है वही इसमें है। जो मनुष्य इस तत्त्वमें नानात्व देखता है वह मृत्युसे मृत्युको [अर्थात् जन्म-मरणको] प्राप्त होता है ॥ १० ॥
| यदेवेह कार्यकारणोपाधिसमन्वितं संसारधर्मवदवभासमानमविवेकिनां तदेव स्वात्मस्थममुत्र नित्यविज्ञानघनस्वभावं सर्वसंसारधर्मवर्जितं ब्रह्म । यच्चामुत्रामुष्मिन्नात्मनि स्थितं तदेवेह नामरूपकार्यकरणोपाधिम् अनुविभाव्यमानं नान्यत् । | जो इस लोकमें कार्य-करण (देहेन्द्रिय) रूप उपाधिसे युक्त होकर अविवेकियोंको संसारधर्मयुक्त भास रहा है स्वस्वरूपमें स्थित वही ब्रह्म अन्यत्र (इन देहादिसे परे) नित्य विज्ञानघनस्वरूप और सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित है। तथा जो अमुत्र—उस आत्मामें अर्थात् परमात्मभावमें स्थित है वही इस लोकमें नाम-रूप एवं कार्य-करणरूप उपाधिके अनुरूप भासनेवाला आत्मतत्त्व है; और कोई नहीं। |
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१०८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| १०८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तत्रैवं सत्युपाधिस्वभावभेददृष्टिलक्षणयाविद्यया मोहितः सन् य इह ब्रह्मण्यनानाभूते परस्मादन्योऽहं मत्तोऽन्यत्परं ब्रह्मेति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते स मृत्योर्मरणान्मरणं मृत्युं पुनः पुनर्जन्ममरणभावमाप्नोति प्रतिपद्यते । तस्मात्तथा न पश्येत् । विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत् परिपूर्णं ब्रह्मैवाहमस्मीति पश्येत् इति वाक्यार्थः ॥ १० ॥ | ऐसा होनेपर भी जो पुरुष उपाधिके स्वभाव और भेददृष्टिरूप अविद्यासे मोहित होकर इस अभिन्नभूत—एकरूप ब्रह्ममें 'मैं परमात्मासे भिन्न हूँ और परमात्मा मुझसे भिन्न है'—इस प्रकार भिन्नवत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको अर्थात् बारम्बार जन्म-मरणभावको प्राप्त होता है । अतः ऐसी दृष्टि नहीं करनी चाहिये । बल्कि 'मैं निर्बाधरूपसे आकाशके समान परिपूर्ण और विज्ञानैकरस-स्वरूप ब्रह्म ही हूँ' इस प्रकार देखे । यही इस वाक्यका अर्थ है ॥ १० ॥ |
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| प्रागेकत्वविज्ञानादाचार्यगमसंस्कृतेन | एकत्व-ज्ञान होनेसे पहले आचार्य और शास्त्रसे संस्कारयुक्त हुए |
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मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन ।
मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥
मनसे ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है । इस ब्रह्मतत्त्वमें नाना कुछ भी नहीं है । जो पुरुष इसमें नानात्व-सा देखता है वह मृत्युसे मृत्युको जाता है ॥ ११ ॥
| मनसेदं ब्रह्मैकरसमाप्तव्यम् आत्मैव नान्यदस्तीति । आप्ते | मनके द्वारा ही यह एकरस ब्रह्म 'सब कुछ आत्मा ही है, और |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९
| च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्त्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किंचनाणुमात्रम् अपि । यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्युं गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन् इत्यर्थः ॥११॥ | कुछ नहीं है' इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है । इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किञ्चित्--अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता । किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता बल्कि नानात्व ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [ अर्थात् जन्म-मरणको ] प्राप्त होता ही है ॥ ११ ॥ |
हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म
| पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह— | फिर भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं— |
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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥
जो अङ्गुष्ठपरिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] का शासक जानकर वह उस ( आत्माके ज्ञान ) के कारण अपने शरीरकी रक्षा करना नहीं चाहता; निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥ १२ ॥
| अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठपरिमाणः ।<br><br>अङ्गुष्ठपरिमाणं हृदयपुण्डरीकं तच्छिद्रवर्त्यन्तःकरणोपाधिः | अङ्गुष्ठमात्र यानी अङ्गुष्ठपरिमाण; हृदयकमल अङ्गुष्ठके समान परिमाणवाला है; उसके छिद्रमें रहनेवाला जो अन्तःकरणोपाधिक |
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११० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| ११० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठमात्रवंशपर्वमध्य-<br>वर्त्यम्बरवत् पुरुषः पूर्णमनेन<br>सर्वमिति मध्य आत्मनि<br>शरीरे तिष्ठति यस्तमात्मानम्<br>ईशानं भूतभव्यस्य विदित्वा न<br>तत इत्यादि पूर्ववत् ॥१२॥ | अंगुष्ठमात्र—अँगूठेके बराबर परिमाणवाले बाँसके पर्वमें स्थित आकाशके समान अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है—उससे सारा शरीर पूर्ण है, इसलिये वह पुरुष है—उस भूत-भविष्यत् कालके शासक आत्माको जानकर [ ज्ञानी पुरुष अपनेको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता ] इत्यादि शेष पदकी पूर्ववत् व्याख्या करनी चाहिये ॥ १२ ॥ |
| किं च— | तथा— |
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अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः। एतद्वै तत् ॥१३॥
यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। यह भूत-भविष्यत्का शासक है। यही आज ( वर्तमान कालमें ) है और यही कल ( भविष्यमें ) भी रहेगा। और निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥१३॥
| अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योति-<br>रिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं<br>ज्योतिष्परत्वात्। यस्त्वेवं लक्षितो<br>योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य<br>स नित्यः कूटस्थोऽद्येदानीं | वह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। मूल मन्त्रमें जो 'अधूमकः' पद है वह [ नपुंसक-लिङ्ग ] 'ज्योतिः' शब्दका विशेषण होनेके कारण 'अधूमकम्' ऐसा होना चाहिये। जो योगियोंको इस प्रकार हृदयमें लक्षित होता है वह भूत और भविष्यत्का शास्ता नित्य कूटस्थ आज—इस समय |
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १११
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १११
| प्राणिषु वर्तमानः स उ श्वोऽपि वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च जनिष्यत इत्यर्थः । अनेन नायमस्तीति चैक इत्ययं पक्षो न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्या प्रत्युक्तस्तथा क्षणभङ्गवादश्च ॥ १३ ॥ | प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल भी रहेगा, अर्थात् उसके समान कोई और पुरुष उत्पन्न नहीं होगा। इससे 'कोई कहते हैं कि यह नहीं है' ऐसा [ १ । १ । २० मन्त्रमें कहा हुआ ] जो पक्ष है वह यद्यपि न्यायतः प्राप्त नहीं होता तथापि उसका और बौद्धोंके क्षणभङ्गवादका खण्डन भी श्रुतिने स्ववचनसे कर दिया है ॥ १३ ॥ |
भेदापवाद
| पुनरपि भेददर्शनापवादं ब्रह्मण आह— | ब्रह्ममें जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद श्रुति फिर भी कहती है— |
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यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥
जिस प्रकार ऊँचे स्थानमें बरसा हुआ जल पर्वतोंमें (पर्वतीय निम्न देशोंमें) बह जाता है उसी प्रकार आत्माओंको पृथक्-पृथक् देखकर जीव उन्हींको (भिन्नात्मत्वको ही) प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
| यथोदकं दुर्गे दुर्गमे देश उच्छ्रिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वतवत्सु निम्नप्रदेशेषु विधावति विकीर्णं सद्धिप्रणश्यति एवं धर्मान् आत्मनो भिन्नान्पृथक्पश्यन्पृथक् | जिस प्रकार दुर्ग—दुर्गम स्थान अर्थात् ऊँचाईपर बरसा हुआ जल पर्वतों—पर्वतीय निम्न प्रदेशोंमें फैलकर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार धर्मों अर्थात् आत्माओंको पृथक्—प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न देखने- |
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११२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
| ११२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| एव प्रतिशरीरं पश्यंस्तानेव शरीरभेदानुवर्तिनोऽनुविधावति। शरीरभेदमेव पृथक्पुनः पुनः प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ १४ ॥ | वाला मनुष्य उन्हीं—शरीरभेदका अनुसरण करनेवालोंकी ओर ही जाता है, अर्थात् बारम्बार भिन्न-भिन्न शरीरभेदको ही प्राप्त होता है॥ १४॥ |
| यस्य पुनर्विद्यावतो विध्वस्तोपाधिकृतभेददर्शनस्य विशुद्धविज्ञानघनैकरसमद्वयमात्मानं पश्यतो विजानतो मुनेर्मननशीलस्य आत्मस्वरूपं कथं सम्भवतीत्युच्यते— | जो विद्यावान् है, जिसकी उपाधिकृत भेददृष्टि नष्ट हो गयी है और जो एकमात्र विशुद्धविज्ञानघनैकरस अद्वितीय आत्माको ही देखनेवाला है उस विज्ञानी मुनि—मननशीलका आत्मा कैसा होता है ? यह बतलाया जाता है— |
अभेददर्शनकी कर्तव्यता
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥
जिस प्रकार शुद्ध जलमें डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है उसी प्रकार, हे गौतम ! विज्ञानी मुनिका आत्मा भी हो जाता है ॥१५॥
| यथोदकं शुद्धे प्रसन्ने शुद्धं प्रसन्नमासिक्तं प्रक्षिप्तमेकरसमेव नान्यथा तादृगेव भवत्यात्माप्येवमेव भवत्येकत्वं विजानतो मुनेर्मननशीलस्य हे गौतम । | जिस प्रकार शुद्ध—स्वच्छ जलमें आसिक्त—प्रक्षिप्त ( डाला हुआ ) शुद्ध—स्वच्छ जल उसके साथ मिलकर एकरस हो जाता है—उससे विपरीत अवस्थामें नहीं रहता उसी प्रकार हे गौतम ! एकत्वको जाननेवाले मुनि—मननशील पुरुषका आत्मा भी वैसा |
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
| तस्मात्कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिक- <br> कुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्रे- <br> भ्योऽपि हितैषिणा वेदेनोपदिष्टम् <br> आत्मैकत्वदर्शनं शान्तदर्पैः <br> आदरणीयमित्यर्थः ॥ १५ ॥ | ही हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि सभीको कुतार्किककी भेददृष्टि और नास्तिककी कुदृष्टिका परित्याग कर सहस्रों माता-पिताओंसे भी अधिक हितैषी वेदके उपदेश किये हुए आत्मैकत्वदर्शनका ही अभिमानरहित होकर आदर करना चाहिये ॥ १५॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशंकरभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १॥ (४)
११४ कठोपनिषद् [ अध्याय २
११४ कठोपनिषद् [ अध्याय २
द्वितीया वल्ली
प्रकारान्तरसे ब्रह्मानुसन्धान
| पुनरपि प्रकारान्तरेण ब्रह्मतत्त्वनिर्धारणार्थोऽयमारम्भो दुर्विज्ञेयत्वाद्व्रह्मणः। | ब्रह्म अत्यन्त दुर्विज्ञेय है; अतः ब्रह्मतत्त्वका प्रकारान्तरसे फिर भी निश्चय करनेके लिये यह आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है— |
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पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।
अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥१॥
उस नित्यविज्ञानस्वरूप अजन्मा [ आत्मा ] का पुर ग्यारह दरवाजोंवाला है । उस [ आत्मा ] का ध्यान करनेपर मनुष्य शोक नहीं करता, और वह [ इस शरीरके रहते हुए ही कर्मबन्धनसे ] मुक्त हुआ ही मुक्त हो जाता है । निश्चय यही वह [ ब्रह्म ] है ॥ १ ॥
| शरीरस्य ब्रह्मपुरत्वम्<br><br>पुरं पुरमिव पुरम् । द्वारपालाधिष्ठात्राद्यनेकपुरोपकरणसम्पत्तिदर्शनाच्छरीरं पुरम् । पुरं च सोपकरणं स्वात्मनासंहतस्वतन्त्रस्वाम्यर्थं दृष्टम् ; तथेदं पुरसामान्यादनेकोपकरणसंहतं | [यह शरीररूप] पुर पुरके समान होनेसे पुर कहलाता है । द्वारपाल और अधिष्ठाता (हाकिम) आदि अनेकों पुरसम्बन्धी सामग्री दिखायी देनेके कारण शरीर पुर है । और जिस प्रकार सम्पूर्ण सामग्रीके सहित प्रत्येक पुर अपनेसे असंहत (बिना मिले हुए) स्वतन्त्र स्वामीके [उपभोगके] लिये देखा जाता है उसी प्रकार पुरसे सदृशता होनेके कारण यह अनेक सामग्री- |
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्थानीयस्वाम्यर्थं भवितुमर्हति । | सम्पन्न शरीर भी अपनेसे पृथक् राजस्थानीय अपने स्वामी [आत्मा] के लिये होना चाहिये । |
| तच्चेदं शरीराख्यं पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त शीर्षण्यानि नाभ्या सहावार्श्वि त्रीणि शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् । | यह शरीर नामक पुर ग्यारह दरवाज़ोंवाला है । [दो आँख, दो कान, दो नासारन्ध्र और एक मुख इस प्रकार] सात मस्तकसम्वन्धी, नाभिके सहित [शिश्न और गुदा मिलाकर] तीन निम्नदेशीय तथा [ब्रह्मरन्ध्ररूप] एक शिरमें रहनेवाला—इस प्रकार इन सभी द्वारोंसे [युक्त होनेके कारण] यह पुर एकादश द्वारवाला है । |
| कस्याजस्य जन्मादिविक्रियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्रचेतसः अवक्रमकुटिलमादित्यप्रकाशवन्नित्यमेवावस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञानमस्येत्यवक्रचेतास्तस्यावक्रचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मणः । | वह पुर किसका है ? [इसपर कहते हैं—] अजका, अर्थात् पुरके धर्मोंसे विलक्षण जन्मादि विकाररहित राजस्थानीय आत्माका । इसके सिवा जो अवक्रचित्त है—जिसका चित्त—विज्ञान अवक्र—अकुटिल अर्थात् सूर्यके समान नित्यस्थित और एकरूप है उस अवक्रचेता राजस्थानीय ब्रह्मका [यह पुर है] । |
| (स्वात्मानुभवेन शोकादिनिवृत्तिः)<br>यस्येदं पुरं तं परमेश्वरं पुरस्वामिनमनुष्ठाय ध्यात्वा—ध्यानं हि तस्यानुष्ठानं सम्यग्विज्ञानपूर्वकम्—तं सर्वैषणाविनिर्मुक्तः सन्समं सर्वभूतस्थं | जिसका यह पुर है उस पुरस्वामी परमेश्वरका अनुष्ठान—ध्यान करके, क्योंकि सम्यग्विज्ञानपूर्वक ध्यान ही उसका अनुष्ठान है; अतः सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त होकर उस सम—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित ब्रह्मका ध्यान |