कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 127, कुल 182 में से
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| शरीरं स्वात्मनासंहतराजस्थानीयस्वाम्यर्थं भवितुमर्हति । | सम्पन्न शरीर भी अपनेसे पृथक् राजस्थानीय अपने स्वामी [आत्मा] के लिये होना चाहिये । |
| तच्चेदं शरीराख्यं पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त शीर्षण्यानि नाभ्या सहावार्श्वि त्रीणि शिरस्येकं तैरेकादशद्वारं पुरम् । | यह शरीर नामक पुर ग्यारह दरवाज़ोंवाला है । [दो आँख, दो कान, दो नासारन्ध्र और एक मुख इस प्रकार] सात मस्तकसम्वन्धी, नाभिके सहित [शिश्न और गुदा मिलाकर] तीन निम्नदेशीय तथा [ब्रह्मरन्ध्ररूप] एक शिरमें रहनेवाला—इस प्रकार इन सभी द्वारोंसे [युक्त होनेके कारण] यह पुर एकादश द्वारवाला है । |
| कस्याजस्य जन्मादिविक्रियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्रचेतसः अवक्रमकुटिलमादित्यप्रकाशवन्नित्यमेवावस्थितमेकरूपं चेतो विज्ञानमस्येत्यवक्रचेतास्तस्यावक्रचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मणः । | वह पुर किसका है ? [इसपर कहते हैं—] अजका, अर्थात् पुरके धर्मोंसे विलक्षण जन्मादि विकाररहित राजस्थानीय आत्माका । इसके सिवा जो अवक्रचित्त है—जिसका चित्त—विज्ञान अवक्र—अकुटिल अर्थात् सूर्यके समान नित्यस्थित और एकरूप है उस अवक्रचेता राजस्थानीय ब्रह्मका [यह पुर है] । |
| (स्वात्मानुभवेन शोकादिनिवृत्तिः)<br>यस्येदं पुरं तं परमेश्वरं पुरस्वामिनमनुष्ठाय ध्यात्वा—ध्यानं हि तस्यानुष्ठानं सम्यग्विज्ञानपूर्वकम्—तं सर्वैषणाविनिर्मुक्तः सन्समं सर्वभूतस्थं | जिसका यह पुर है उस पुरस्वामी परमेश्वरका अनुष्ठान—ध्यान करके, क्योंकि सम्यग्विज्ञानपूर्वक ध्यान ही उसका अनुष्ठान है; अतः सम्पूर्ण एषणाओंसे मुक्त होकर उस सम—सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित ब्रह्मका ध्यान |