भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 122
११०कठोपनिषद्[ अध्याय २

| अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठमात्रवंशपर्वमध्य-<br>वर्त्यम्बरवत् पुरुषः पूर्णमनेन<br>सर्वमिति मध्य आत्मनि<br>शरीरे तिष्ठति यस्तमात्मानम्<br>ईशानं भूतभव्यस्य विदित्वा न<br>तत इत्यादि पूर्ववत् ॥१२॥ | अंगुष्ठमात्र—अँगूठेके बराबर परिमाणवाले बाँसके पर्वमें स्थित आकाशके समान अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है—उससे सारा शरीर पूर्ण है, इसलिये वह पुरुष है—उस भूत-भविष्यत् कालके शासक आत्माको जानकर [ ज्ञानी पुरुष अपनेको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं करता ] इत्यादि शेष पदकी पूर्ववत् व्याख्या करनी चाहिये ॥ १२ ॥ |

किं च—तथा—

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।
ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः। एतद्वै तत् ॥१३॥

यह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। यह भूत-भविष्यत्‌का शासक है। यही आज ( वर्तमान कालमें ) है और यही कल ( भविष्यमें ) भी रहेगा। और निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥१३॥

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योति-<br>रिवाधूमकोऽधूमकमिति युक्तं<br>ज्योतिष्परत्वात्। यस्त्वेवं लक्षितो<br>योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य<br>स नित्यः कूटस्थोऽद्येदानींवह अङ्गुष्ठमात्र पुरुष धूमरहित ज्योतिके समान है। मूल मन्त्रमें जो 'अधूमकः' पद है वह [ नपुंसक-लिङ्ग ] 'ज्योतिः' शब्दका विशेषण होनेके कारण 'अधूमकम्' ऐसा होना चाहिये। जो योगियोंको इस प्रकार हृदयमें लक्षित होता है वह भूत और भविष्यत्‌का शास्ता नित्य कूटस्थ आज—इस समय