कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंवल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १११
| प्राणिषु वर्तमानः स उ श्वोऽपि वर्तिष्यते नान्यस्तत्समोऽन्यश्च जनिष्यत इत्यर्थः । अनेन नायमस्तीति चैक इत्ययं पक्षो न्यायतोऽप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्या प्रत्युक्तस्तथा क्षणभङ्गवादश्च ॥ १३ ॥ | प्राणियोंमें वर्तमान है और वही कल भी रहेगा, अर्थात् उसके समान कोई और पुरुष उत्पन्न नहीं होगा। इससे 'कोई कहते हैं कि यह नहीं है' ऐसा [ १ । १ । २० मन्त्रमें कहा हुआ ] जो पक्ष है वह यद्यपि न्यायतः प्राप्त नहीं होता तथापि उसका और बौद्धोंके क्षणभङ्गवादका खण्डन भी श्रुतिने स्ववचनसे कर दिया है ॥ १३ ॥ |
भेदापवाद
| पुनरपि भेददर्शनापवादं ब्रह्मण आह— | ब्रह्ममें जो भेददृष्टि की जाती है उसका अपवाद श्रुति फिर भी कहती है— |
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यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।
एवं धर्मान्पृथक्पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥
जिस प्रकार ऊँचे स्थानमें बरसा हुआ जल पर्वतोंमें (पर्वतीय निम्न देशोंमें) बह जाता है उसी प्रकार आत्माओंको पृथक्-पृथक् देखकर जीव उन्हींको (भिन्नात्मत्वको ही) प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
| यथोदकं दुर्गे दुर्गमे देश उच्छ्रिते वृष्टं सिक्तं पर्वतेषु पर्वतवत्सु निम्नप्रदेशेषु विधावति विकीर्णं सद्धिप्रणश्यति एवं धर्मान् आत्मनो भिन्नान्पृथक्पश्यन्पृथक् | जिस प्रकार दुर्ग—दुर्गम स्थान अर्थात् ऊँचाईपर बरसा हुआ जल पर्वतों—पर्वतीय निम्न प्रदेशोंमें फैलकर नष्ट हो जाता है उसी प्रकार धर्मों अर्थात् आत्माओंको पृथक्—प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न देखने- |
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