भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९


| च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्त्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति किंचनाणुमात्रम् अपि । यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्टिं न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्युं गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन् इत्यर्थः ॥११॥ | कुछ नहीं है' इस प्रकार प्राप्त करने योग्य है । इस प्रकार उसकी प्राप्ति हो जानेपर नानात्वको स्थापित करनेवाली अविद्याके निवृत्त हो जानेसे इस ब्रह्मतत्त्वमें किञ्चित्--अणुमात्र भी नानात्व नहीं रहता । किन्तु जो पुरुष अविद्यारूप तिमिररोगग्रस्त दृष्टिको नहीं त्यागता बल्कि नानात्व ही देखता है वह इस प्रकार थोड़ा-सा भी भेद आरोपित करनेसे मृत्युसे मृत्युको [ अर्थात् जन्म-मरणको ] प्राप्त होता ही है ॥ ११ ॥ |

हृदयपुण्डरीकस्थ ब्रह्म

पुनरपि तदेव प्रकृतं ब्रह्माह—फिर भी उस प्रकृत ब्रह्मका ही वर्णन करते हैं—

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।
ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥

जो अङ्गुष्ठपरिमाण पुरुष शरीरके मध्यमें स्थित है, उसे भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] का शासक जानकर वह उस ( आत्माके ज्ञान ) के कारण अपने शरीरकी रक्षा करना नहीं चाहता; निश्चय यही वह ( ब्रह्मतत्त्व ) है ॥ १२ ॥

अङ्गुष्ठमात्रोऽङ्गुष्ठपरिमाणः ।<br><br>अङ्गुष्ठपरिमाणं हृदयपुण्डरीकं तच्छिद्रवर्त्यन्तःकरणोपाधिःअङ्गुष्ठमात्र यानी अङ्गुष्ठपरिमाण; हृदयकमल अङ्गुष्ठके समान परिमाणवाला है; उसके छिद्रमें रहनेवाला जो अन्तःकरणोपाधिक