भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 113

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१


| विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३ ॥ | जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्म-पद] अत्र ज्ञात हुआ है—ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥ |


| अतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह— | वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है—ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं— |

आत्मज्ञकी निःशोकता

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥

जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्‌में दिखायी देनेवाले—दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

| स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येन आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्वं पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य अर्थात् स्वप्नावस्थामें जानने योग्य तथा जागरितान्त—जाग्रत् अवस्थाका मध्य यानी जाग्रत् अवस्थामें जाननेयोग्य—इन दोनों स्वप्न और जाग्रत्‌के अन्तर्गत पदार्थोंको लोक जिस आत्माके द्वारा देखता है [वही ब्रह्म है; इस प्रकार] इस वाक्यकी और सब व्याख्या पूर्व मन्त्रके समान करनी चाहिये । उस |