भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 182 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109
वल्ली १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९७
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
लोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य संभवति। किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् परिश्रमसे [इन्द्रियोंकी] स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको क्यों देखता है?' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं—'अमृतत्व—अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]' ॥१॥
यत्तत्स्वाभाविकं परागेव अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रतिकूलत्वात्। या च पराक्ष्वेवाविद्योपप्रदर्शिताेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्यातृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः—जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है, क्योंकि वह उस (आत्मदर्शन) के प्रतिकूल है। इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीसे जिनका आत्मदर्शन प्रतिरुद्ध हो रहा है वे—

अविवेकी और विवेकीका अन्तर

पराचः कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥