कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 125, कुल 182 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 125
वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३
| तस्मात्कुतार्किकभेददृष्टिं नास्तिक- <br> कुदृष्टिं चोज्झित्वा मातृपितृसहस्रे- <br> भ्योऽपि हितैषिणा वेदेनोपदिष्टम् <br> आत्मैकत्वदर्शनं शान्तदर्पैः <br> आदरणीयमित्यर्थः ॥ १५ ॥ | ही हो जाता है। अतः तात्पर्य यह है कि सभीको कुतार्किककी भेददृष्टि और नास्तिककी कुदृष्टिका परित्याग कर सहस्रों माता-पिताओंसे भी अधिक हितैषी वेदके उपदेश किये हुए आत्मैकत्वदर्शनका ही अभिमानरहित होकर आदर करना चाहिये ॥ १५॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशंकरभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
द्वितीयाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १॥ (४)