भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

१०६ कठोपनिषद् [ अध्याय २


हविष्मद्भिराज्यादिमद्भिर्ध्यान-भावनावद्भिश् मनुष्येभिर्मनुष्यैः अग्निः। एतद्वै तत्तदेव प्रकृतं ब्रह्म ८युक्त योगियोंद्वारा जो [क्रमशः ] यज्ञ और हृदयदेशमें स्तुति किये जाने योग्य है, ऐसा जो अग्नि है वही निश्चय यह प्रकृत ब्रह्म है ॥८॥

प्राणमें ब्रह्मदृष्टि

किं च—तथा—

यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति ।
तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥९॥

जहाँसे सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त हो जाता है उस प्राणात्मामें [अग्न्यादि और वागादिक] सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं। उसका कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता। यही वह ब्रह्म है ॥९॥

यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्तं निम्लोचनं यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यहनि गच्छति तं प्राणमात्मानं देवा अग्न्यादयोऽधिदैवं वागादयश्च अध्यात्मं सर्वे विश्वेऽरा इव रथनाभावर्पिताः संप्रवेशिताः स्थितिकाले सोऽपि ब्रह्मैव। तदेतत् सर्वात्मकं ब्रह्म। तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकतां तदन्यत्वं गच्छति कश्चन कश्चिदपि। एतद्वै तत् ॥९॥जिससे—जिस प्राणसे नित्य-प्रति सूर्य उदित होता है और जिस प्राणमें ही वह नित्य-प्रति अस्त भावको प्राप्त होता है उस प्राणात्मामें स्थितिके समय अग्नि आदि अधिदैव और वागादि अध्यात्म सभी देवता इस प्रकार अर्पित हैं—प्रविष्ट किये गये हैं जैसे रथकी नाभिमें समस्त अरे; वह [ प्राण ] भी ब्रह्म ही है। वही यह सर्वात्मक ब्रह्म है। उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं करता अर्थात् उस ब्रह्मके तादात्म्य भावको पार करके कोई भी उससे अन्यत्वको प्राप्त नहीं होता। यही वह (ब्रह्म) है ॥९॥