कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१
| सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेवं यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ॥ २५ ॥ | तथा सबका हरण करनेवाला होनेपर भी मृत्यु जिसका भातके लिये उपसेचन (शाकादि) के समान है, अर्थात् भोजनके लिये भी पर्याप्त नहीं है, उस आत्माको, जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधनोंसे रहित और साधारण बुद्धिवाला पुरुष है जो इस प्रकार—उपर्युक्त साधनसम्पन्न पुरुषके समान जान सके? ॥ २५ ॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ २ ॥
७२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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तृतीया वल्ली
प्राप्ता और प्राप्तव्य भेदसे दो आत्मा
| ऋतं पिबन्तावित्यस्या वल्ल्याः सम्बन्धः— | इस 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि तृतीया वल्लीका सम्बन्ध इस प्रकार है— |
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| विद्याविद्ये नानाविरुद्धफले इत्युपन्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निर्णीते; तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्यगन्तृगन्तव्यविवेक़ार्थं द्वावात्मानौ उपन्यस्येते— | ऊपर विद्या और अविद्या नाना प्रकारके विरुद्ध धर्मोंवाली बतलायी गयी हैं; किन्तु उनका फलसहित यथावत् निर्णय नहीं किया गया। उनका निर्णय करनेके लिये ही [इस वल्लीमें] रथके रूपककी कल्पना की गयी है। ऐसा करनेसे उन्हें [अर्थात् विद्या-अविद्याको] समझनेमें सुगमता हो जाती है। इसी प्रकार प्राप्त होनेवाले और प्राप्तव्य स्थान तथा गमन करनेवाले और गन्तव्य लक्ष्यका विवेक करनेके लिये दो आत्माओंका उपन्यास करते हैं— |
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥
ब्रह्मवेत्तालोग कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्मस्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्मफ़लको भोगनेवाले छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण दो [तत्त्व] हैं। यही बात जिन्होंने तीन बार नाचिकेताग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी कहते हैं ॥ १ ॥
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
| ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात् कर्मफलं पिबन्तौ, एकस्तत्र कर्मफलं पिवति भुङ्क्ते नेतरः; तथापि पातृसम्बन्धात्पिवन्तौ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतम् इति पूर्वेण संबन्धः; लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽर्धं स्थानं परार्धम्। तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थः। | ऋत अर्थात् अवश्यम्भावी होनेके कारण सत्य कर्मफलका पान करनेवाले दो आत्मा, जिनमेंसे केवल एक कर्मफलका पान—भोग करता है, दूसरा नहीं; तो भी पान करनेवालेसे सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ छत्रिन्यायसे* दोनोंहीके लिये 'पित्रन्तौ' इस द्विवचनका प्रयोग हुआ है, सुकृत अर्थात् अपने किये हुए कर्मके फलको भोगते हुए, यहाँ 'सुकृतस्य' शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतम्' शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक अर्थात् इस शरीरमें गुहा—बुद्धिके भीतर परम—बाह्य देहाश्रित आकाश स्थानकी अपेक्षा उत्कृष्ट परब्रह्मके अर्ध यानी स्थानमें प्रवेश किये हुए हैं, क्योंकि उसीमें परब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः तात्पर्य यह है कि उस परम परार्ध यानी हृदयाकाशमें प्रवेश किये हुए हैं। |
| तौ च छायातपाविव विलक्षणौ संसारित्वासंसारित्वेन | वे दोनों संसारी और असंसारी होनेके कारण छाया और धूपके |
* जहाँ बहुत-से आदमी जा रहे हों और उनमेंसे किसी एकके पास छाता हो तो दूरसे देखनेवाला पुरुष उन्हें बतलानेके लिये 'देखो, वे छातेवाले लोग जा रहे हैं' ऐसे वाक्यका प्रयोग करता है। इस प्रकार एक छातेवालेसे सम्बन्धित होनेके कारण वह सारा समूह ही छातेवाला कहा जाता है। इसे 'छत्रिन्याय' कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सम्बन्धसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है।
७४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति । पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रिःकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ | समान परस्पर विलक्षण हैं—ऐसा ब्रह्मवेत्तालोग वर्णन करते—कहते हैं । [इस प्रकार] केवल अकर्मी ही ऐसा नहीं कहते बल्कि जो त्रिणाचिकेत हैं—जिन्होंने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ |
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतꣳ शकेमहि ॥ २ ॥
जो यजन करनेवालोंके लिये सेतुके समान है उस नाचिकेत अग्निको तथा जो भयशून्य है और संसारको पार करनेकी इच्छावालोंका परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥
| यः सेतुरिव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसं-तरणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः। परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये | दुःखको पार करनेका साधन होनेसे जो नाचिकेत अग्नि यजमान अर्थात् कर्मियोंके लिये सेतुके समान होनेके कारण सेतु है उसे हम जानने और चयन करनेमें समर्थ हों । तथा जो भयरहित है, और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओंका परम आश्रय अविनाशी आत्मा नामक ब्रह्म है उसे भी हम जाननेमें समर्थ हो सकें । अर्थात् कर्मवेत्ताका आश्रय अपर ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ताका आश्रय |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१
| वेदितव्ये इति वाक्यार्थः। एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ॥२॥ | परब्रह्म—ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं—यह इस वाक्यका अर्थ है। 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि मन्त्रसे इन्हीं दोनों [ब्रह्मों] का उल्लेख किया गया है ॥ २ ॥ |
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| तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते— | उनमें जो उपाधिपरिच्छिन्न संसारी तथा मोक्ष एवं संसारके प्रति गमन करनेके लिये विद्या और अविद्याका अधिकारी है उसके लिये उन दोनोंके प्रति जानेके साधनस्वरूप रथकी कल्पना की जाती है— |
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शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक
आत्मानग्ँ रथिनं विद्धि शरीरग्ँरथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥
तू आत्माको रथी जान, शरीरको रथ समझ, बुद्धिको सारथी जान और मनको लगाम समझ ॥ ३ ॥
| तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि। शरीरं रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य। बुद्धिं तु अध्यवसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृ- | उनमें उस आत्माको—कर्मफल भोगनेवाले संसारीको रथी—रथका स्वामी जान। और शरीरको तो रथ ही समझ, क्योंकि शरीर रथमें बँधे हुए अश्वरूप इन्द्रियगणसे खींचा जाता है। तथा निश्चय करना ही जिसका लक्षण है उस बुद्धिको सारथी जान, क्योंकि |
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७६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| प्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेत्-<br>प्रधान इव रथः। सर्वं हि देहगतं<br>कार्यं बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण। मनः<br>संकल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रहं<br>रशनां विद्धि । मनसा हि<br>प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि<br>प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥ ३ ॥ | सारथिरूप नेता ही जिसमें प्रधान है<br>उस रथके समान शरीर बुद्धिरूप<br>नेताकी प्रधानतावाला है, क्योंकि देह-<br>के सभी कार्य प्रायः बुद्धिके ही कर्तव्य<br>हैं । और संकल्प-विकल्पादिरूप<br>मनको प्रग्रह—लगाम समझ, क्योंकि<br>जिस प्रकार घोड़े लगामसे नियन्त्रित<br>होकर चलते हैं उसी प्रकार श्रोत्रादि<br>इन्द्रियाँ मनसे नियन्त्रित होकर ही<br>अपने विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं ॥३॥ |
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥
विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़ेरूपसे कल्पना किये जानेपर विषयोंको उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ॥ ४ ॥
| इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान्<br>आहू रथकल्पनाकुशलाः शरीर-<br>रथाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव<br>इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु<br>गोचरान्मार्गान्-रूपादीन्विषयान्<br>विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तः<br>शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं<br>संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारी-<br>त्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः। | रथकी कल्पना करनेमें कुशल<br>पुरुषोंने चक्षु आदि इन्द्रियोंको<br>घोड़े बतलाया है, क्योंकि [इन्द्रिय<br>और घोड़ोंकी क्रमशः] शरीर और<br>रथको खींचनेमें समानता है ।<br>इस प्रकार उन इन्द्रियोंको घोड़ेरूपसे<br>परिकल्पित किये जानेपर रूपादि<br>विषयोंको उनके मार्ग जानो तथा<br>शरीर इन्द्रिय और मनके सहित<br>अर्थात् उनसे युक्त आत्माको मनीषी—<br>विवेकी पुरुष 'यह भोक्ता—संसारी<br>है' ऐसा बतलाते हैं । |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७
| न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति बुद्ध्याद्युपाधिकृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति—"ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) इत्यादि । एवं च सति वक्ष्यमाणा रथकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४ ॥ | केवल (शुद्ध) आत्मा तो भोक्ता है नहीं; उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है। इसी प्रकार "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा" इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी केवल आत्माका अभोक्तृत्व ही दिखलाती है। ऐसा होनेपर ही रथकल्पनासे उस वैष्णवपदकी आगे कही जानेवाली आत्मभावसे प्रतिपत्ति (प्राप्ति) बन सकती है—और किसी प्रकार नहीं, क्योंकि स्वभाव कभी नहीं बदल सकता ॥ ४ ॥ |
अविवेकीकी विवशता
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥
किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] सर्वदा अविवेकी एवं असंयतचित्तसे युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इसी प्रकार नहीं रहतीं जैसे सारथीके अधीन दुष्ट घोड़े ॥ ५ ॥
| तत्रैवं सति यस्तु बुद्ध्याख्यः सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवेकी प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति यथेतर्रो रथचर्यायामयुक्तेन | किन्तु ऐसा होनेपर भी जो बुद्धिरूप सारथी अविज्ञानवान्—अकुशल अर्थात् रथसञ्चालनमें अकुशल अन्य सारथीके समान [इन्द्रियरूप घोड़ोंकी] प्रवृत्ति-निवृत्तिके विवेकसे रहित है, जो |
७८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ७८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अप्रगृहीतेनासमाहितेन मनसा प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथेः इन्द्रियाण्यश्वस्थानीयान्यवश्यानि अशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्वा इवेतरसारथेर्भवन्ति ॥ ५ ॥ | सर्वदा प्रग्रह (लगाम) स्थानीय अयुक्त—अगृहीत अर्थात् विक्षिप्त चित्तसे युक्त है उस अनिपुण बुद्धिरूप सारथीके इन्द्रियरूप घोड़े [रथादि हाँकनेवाले] अन्य सारथीके दुष्ट अर्थात् बेकाबू घोड़ोंके समान अवश्य यानी जिनका निवारण नहीं किया जा सकता ऐसे हो जाते हैं ॥ ५ ॥ |
विवेकीकी स्वाधीनता
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥
परन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] कुशल और सर्वदा समाहितचित्त रहता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथीके अधीन अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥
| यस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीत: सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीत-मनाः समाहितचित्तः सदा तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितुं निवर्तयितुं वा शक्यानि वश्यानि दान्ताः सदश्वा इवेतरसारथेः ॥ ६ ॥ | किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] पूर्वोक्त सारथीसे विपरीत विज्ञानवान् (कुशल)—मनको नियन्त्रित रखनेवाला अर्थात् संयतचित्त होता है उसकी अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ प्रवृत्त और निवृत्त किये जानेमें इस प्रकार समर्थ होती हैं जैसे सारथीके लिये अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥ | | तस्य पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिदं फलमाह— | उस पूर्वोक्त अविज्ञानवान् बुद्धिरूप सारथीवाले रथीके लिये श्रुति यह फल बतलाती है— |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९
अविवेकीकी संसारप्राप्ति
यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति सꣳसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥
किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहनेवाला होता है वह उस पदको प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसारको ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥
| यस्त्वविज्ञानवान्भवति , अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स तत एवाशुचिः सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् आप्नोति तेन सारथिना । न केवलं कैवल्यं नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥ | किन्तु जो अविज्ञानवान्, अमनस्क—असंयतचित्त और इसीलिये सदा अपवित्र रहनेवाला होता है उस सारथीके द्वारा वह [जीव-रूप] रथी उस पूर्वोक्त अक्षर परम पदको प्राप्त नहीं कर सकता । वह कैवल्यको प्राप्त नहीं होता—केवल इतना ही नहीं, बल्कि जन्म-मरणरूप संसारको भी प्राप्त होता है ॥ ७ ॥ |
विवेकीकी परमपदप्राप्ति
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥
किन्तु जो विज्ञानवान्, संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उस पदको प्राप्त कर लेता है जहाँसे वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥
| यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् | किन्तु जो दूसरा रथी अर्थात् विद्वान् विज्ञानवान्—कुशल सारथी- |
८० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| इत्येतत्; युक्तमनाः समनस्कः स तत् एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादाप्तात्पदाद् अप्रच्युतः सन्भूयः पुनर्न जायते संसारे॥ ८ ॥ | से युक्त, समनस्क—युक्तचित्त और इसीलिये सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उसी पदको प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए पदसे च्युत न होकर वह फिर संसारमें उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥ |
| किं तत्पदमित्याह— | वह पद क्या है ? इसपर कहते हैं— |
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥
जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथीसे युक्त और मनको वशमें रखनेवाला होता है वह संसारमार्गसे पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा) के परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
| विज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनःप्रग्रहवान्प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सन्शुचिर्नर्रो विद्वान्सोऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव अधिगन्तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वसंसारवन्धनैः। तद्विष्णोः व्यापनशीलस्य ब्रह्मणः परमात्मनो वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येतद्यदसौ आप्नोति विद्वान् ॥ ९ ॥ | जो पूर्वोक्त विद्वान् पुरुष विवेकयुक्त बुद्धि-सारथीसे युक्त मनोनिग्रहवान् यानी निगृहीतचित्त—एकाग्र मनवाला होता हुआ पवित्र है वह संसारगतिके पारको यानी अवश्य, प्राप्तव्य परमात्माको प्राप्त कर लेता है; अर्थात् सम्पूर्ण संसार-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । उस विष्णु यानी वासुदेव नामक सर्व-व्यापक परब्रह्म परमात्माका जो परम—उत्कृष्ट पद—स्थान अर्थात् स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१
| अधुना यत्पदं गन्तव्यं तस्य इन्द्रियाणि स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्म-तारतम्यक्रमेण प्रत्यगात्मतया अधिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदम् आरभ्यते— | अब, जो प्राप्तव्य परम पद है उसका स्थूल इन्द्रियोंसे आरम्भ करके सूक्ष्मत्वके तारतम्य-क्रमसे प्रत्यगात्मस्वरूपसे ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, इसीलिये आगेका कथन आरम्भ किया जाता है— |
इन्द्रियादिका तारतम्य
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १० ॥
इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन उत्कृष्ट है, मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा (महत्तत्त्व) उत्कृष्ट है ॥ १० ॥
| स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरर्थैरात्मप्रकाशनाय आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यर्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च ।<br><br>तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः । मनः-शब्दवाच्यं मनस आरम्भकं भूत-सूक्ष्मं संकल्पविकल्पाद्यारम्भ-कत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा | इन्द्रियाँ तो स्थूल हैं । वे जिन शब्द-स्पर्शादि विषयोंद्वारा अपनेको प्रकाशित करनेके लिये बनायी गयी हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रिय-वर्गसे पर—सूक्ष्म, महान् एवं प्रत्यगात्मस्वरूप हैं ।<br><br>उन विषयोंसे भी पर—सूक्ष्म, महान् तथा नित्यस्वरूपभूत मन है, जो कि 'मन' शब्दका वाच्य और मनका आरम्भक भूतसूक्ष्म है, क्योंकि वही सङ्कल्प-विकल्पादिका आरम्भक है । मनसे भी पर—सूक्ष्मतर, |
८२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम्। बुद्धेरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात्। अव्यक्ताद्यत्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भं तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा बुद्धेः पर इत्युच्यते॥१०॥ | महत्तर एवं प्रत्यगात्मभूत 'बुद्धि'शब्दवाच्य अध्यवसायादिका आरम्भक भूतसूक्ष्म है। उस बुद्धिसे भी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिका प्रत्यगात्मभूत होनेसे आत्मा महान् है, क्योंकि वह सबसे बड़ा है। अर्थात् अव्यक्तसे जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ तत्त्व है, जो महान् आत्मा [ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण] बोधाबोधात्मक है वह बुद्धिसे भी पर है—ऐसा कहा जाता है॥१०॥ |
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥ ११॥
महत्तत्त्वसे अव्यक्त (मूलप्रकृति) पर है और अव्यक्तसे भी पुरुष पर है। पुरुषसे पर और कुछ नहीं है। वही [सूक्ष्मत्वकी] परा काष्ठा (हद) है, वही परा (उत्कृष्ट) गति है ॥ ११॥
| महतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं च अव्यक्तं सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकारणशक्तिसमाहाररूपम् अव्यक्ताव्याकृताकाशादिनामवाच्यं परमात्मन्योतप्रोतभावेन | महत् से भी पर—सूक्ष्मतर, प्रत्यगात्मस्वरूप और सबसे महान् अव्यक्त है, जो सम्पूर्ण जगत्का बीजभूत, अव्यक्त नाम-रूपोंकी सत्तास्वरूप, सम्पूर्ण कार्य-कारणशक्तिका समाहार, अव्यक्त, अव्याकृत और आकाशादि नामोंसे निर्दिष्ट होनेवाला तथा वटके धानेमें रहनेवाली वटवृक्षकी शक्तिके |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| समाश्रितं वटकणिकायामिव वटवृक्षशक्तिः।<br><br>तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकारणकारणत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च महांश्च। अत एव पुरुषः सर्वपूरणात्। ततोऽन्यस्य परस्य प्रसङ्गं निवारयन्नाह पुरुषान्न परं किंचिदिति। यस्मान्नास्ति पुरुषात् चिन्मात्रघनात् परं किंचिदपि वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मत्वमहत्त्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा पर्यवसानम्।<br><br>अत्र हीन्द्रियेभ्य आरभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः। अत एव च गन्तॄणां सर्वगतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गतिः “यद्गत्वा न निवर्तन्ते” (गीता ८।२१; १५।६) इति स्मृतेः॥ ११ ॥ | समान परमात्मामें ओतप्रोतभावसे आश्रित है।<br><br>उस अव्यक्तकी अपेक्षा सम्पूर्ण कारणोंका कारण तथा प्रत्यगात्मरूप होनेसे पुरुष पर—सूक्ष्मतर एवं महान् है। इसीलिये वह सबमें पूरित रहनेके कारण ‘पुरुष’ कहा जाता है। उसके सिवा किसी दूसरे उत्कृष्टतरके प्रसङ्गका निवारण करते हुए कहते हैं कि पुरुषसे पर और कुछ नहीं है। क्योंकि चिद्घनमात्र पुरुषसे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है इसलिये वही सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठा—स्थिति अर्थात् पर्यवसान है।<br><br>इन्द्रियोंसे लेकर इस आत्मामें ही सूक्ष्मत्वादिकी परिसमाप्ति होती है। अतः यही गमन करनेवाले अर्थात् सम्पूर्ण गतियोंवाले संसारियोंकी पर—उत्कृष्ट गति है, जैसा कि “जिसको प्राप्त होकर फिर नहीं लौटते” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है॥ ११ ॥ |
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम्। कथं यस्माद्भूयो न जायत इति ? | **शङ्का—**यदि [ पुरुषके प्रति ] गति है तो [ वहाँसे ] आगति (लौटना) भी होना चाहिये; फिर ‘जिसके पाससे फिर जन्म नहीं लेता’ ऐसा क्यों कहा जाता है ? |
८४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| नैष दोषः। सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते। प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन। यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूपं गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण। तथा च श्रुतिः—"अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः" इत्याद्या। तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य— | समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा होनेसे आत्माके ज्ञानको ही उपचारसे गति कहा गया है। तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे आत्माका परत्व प्रदर्शित कर उसका प्रत्यगात्मत्व दिखलाया गया है, क्योंकि जो जानेवाला है वह अपने पृथक् अनात्मभूत एवं अप्राप्त स्थानकी ओर ही जाया करता है; इससे विपरीत अपनी ही ओर नहीं आता-जाता। इस विषयमें "संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छावाले पुरुष मार्गरहित होते हैं" इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है। तथा आगेकी श्रुति भी पुरुषका सबका ही प्रत्यगात्मा होना प्रदर्शित करती है— |
आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है
एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥
सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ॥ १२ ॥
| एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृत्तो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामाया- | यह पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५
| संस्कृत | हिन्दी |
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| च्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित् । अहो अतिगम्भीरा दुरवगाहा विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम्—"नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः" (गीता ७ । २५) इत्यादि । | मायासे आच्छादित है । अतः सबका अन्तरात्मस्वरूप होनेके कारण आत्मा किसीके प्रति प्रकाशित नहीं होता । अहो ! यह माया बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसारके सभी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होनेपर भी [शास्त्र और आचार्यद्वारा] वैसा बोध कराये जानेपर 'मैं परमात्मा हूँ' इस तत्त्वको ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि संघात घटादिके समान अपने दृश्य हैं उन्हें, किसीके न कहनेपर भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' इत्यादि प्रकारसे आत्मभावसे ग्रहण करते हैं । निश्चय, उस परमात्माकी ही मायासे यह सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है । "योगमायासे आवृत हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं होता" ऐसी ही यह स्मृति भी है । |
| ननु विरुद्धमिदमुच्यते "मत्वा धीरो न शोचति" (क० उ० २ । १ । ४) "न प्रकाशते" (क० उ० १ । ३ । १२) इति च । | शङ्का—किन्तु "उसे जानकर पुरुष शोक नहीं करता" "[वह गूढ आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता" यह तो विपरीत ही कहा गया है । |
| नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् । | समाधान—ऐसी बात नहीं है । आत्मा अशुद्धबुद्धि पुरुषके लिये अविज्ञेय है; इसीलिये यह कहा |
८६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कै:? सूक्ष्मदर्शिभिः 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः' इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ | गया है कि 'वह प्रकाशित नहीं होता'। वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोकके समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रतासे युक्त और सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षणमें लगी हुई तीव्र बुद्धिसे ही दिखलायी देता है। किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियोंको। 'इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मताकी परम्पराका विचार करनेसे जिनका पर—सूक्ष्म वस्तुको देखनेका स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितोंको [वह दिखलायी देता है]—यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥ |
लयचिन्तन
| तत्प्रतिपत्त्युपायमाह— | अब उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं— |
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यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि १३
विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाश-स्वरूप बुद्धिमें लय करे, बुद्धिको महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ॥ १३ ॥
| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७ |
| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| यच्छेन्नियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी; किम् ? वाग्वाचम्। वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रियाणाम्। क्व ? मनसी मनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम्। तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ आत्मनि। बुद्धिर्हि मनआदिकरणान्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम्। ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत्। प्रथमजवत् स्वच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् आपादयेदित्यर्थः। तं च महान्तम् आत्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥ | विवेकी पुरुष 'यच्छेत्' अर्थात् नियुक्त करे—उपसंहार करे; किसका उपसंहार करे ? वाक् अर्थात् वाणीका। यहाँ वाक् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण करानेके लिये है। कहाँ उपसंहार करे? मनमें; 'मनसी' पदमें ह्रस्व इकारके स्थानमें दीर्घ प्रयोग छान्दस है। फिर उस मनको ज्ञान अर्थात् प्रकाशस्वरूप बुद्धि—आत्मामें लीन करे। बुद्धि ही मन आदि इन्द्रियोंमें व्याप्त है, इसलिये वह उनका आत्मा—प्रत्यक्स्वरूप है। उस ज्ञानस्वरूप बुद्धिको प्रथम विकार महान् आत्मामें लीन करे अर्थात् प्रथम उत्पन्न हुए महत्तत्त्वके समान आत्माका स्वच्छस्वभाव विज्ञान प्राप्त करे। और महान् आत्माको जिसका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित है और जो अविक्रिय, सर्वान्तर तथा बुद्धिके सम्पूर्ण प्रत्ययोंका साक्षी है उस मुख्य आत्मामें लीन करे ॥ १३ ॥ |
| एवं पुरुष आत्मनि सर्वं प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्याज्ञानविजृम्भितं क्रियाकारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन<br>कठो० ४— | मृगतृष्णा, रज्जु और आकाशके स्वरूपका ज्ञान होनेसे जैसे मृगजल, रज्जु-सर्प और आकाश-मालिन्यका बाध हो जाता है उसी प्रकार मिथ्याज्ञानसे प्रतीत होनेवाले समस्त प्रपञ्च यानी नाम, रूप और कर्म |
८८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ८८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| मरीच्युदकरज्जुसर्पगगनमलानीव मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो भवति यतोऽतस्तद्दर्शनार्थम्— | इन तीनोंको, जो क्रिया कारक और फलरूप ही हैं, स्वात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरुष अर्थात् आत्मामें लीन करके मनुष्य स्वस्थ, प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका साक्षात्कार करनेके लिये— |
उद्बोधन
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
[अरे अविद्याग्रस्त लोगो !] उठो, [अज्ञान-निद्रासे] जागो, और श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो। जिस प्रकार छुरेकी धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्गको वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं ॥ १४ ॥
| अनाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा भवत; जाग्रताज्ञाननिद्राया घोररूपायाः सर्वानर्थबीजभूतायाः क्षयं कुरुत। | अरे अनादि अविद्यासे सोये हुए जीवो ! उठो, आत्मज्ञानके अभिमुख होओ तथा घोररूप अज्ञाननिद्रासे जागो—सम्पूर्ण अनर्थोंकी बीजभूत उस अज्ञान-निद्राका क्षय करो। | | कथम् ? प्राप्योपगम्य वरान् प्रकृष्टानाचार्यांस्तद्विदस्तदुपदिष्टं सर्वान्तरमात्मानमहमस्मीति निबोधतावगच्छत। न ह्युपेक्षित- | किस प्रकार [क्षय करें ?] श्रेष्ठ—उत्कृष्ट आत्मज्ञानी आचार्योंके पास जाकर—उनके समीप पहुँचकर उनके उपदेश किये हुए सर्वान्तर्यामी आत्माको 'मैं यही हूँ' ऐसा जानो। उसकी उपेक्षा नहीं |
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
| शाङ्करभाष्यम् | भाषानुवाद |
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| व्यमिति श्रुतिरनुकम्पयाह मातृवत् । अतिसूक्ष्मबुद्धिविषयत्वाज्ज्ञेयस्य । किमित्र सूक्ष्मबुद्धिः इत्युच्यते; क्षुरस्य धाराग्रं निशिता तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दुःखेनात्ययो यस्याः सा दुरत्यया । यथा सा पद्भ्यां दुर्गमनीया तथा दुर्गं दुःसंपाद्यमित्येतत् पथः पन्थानं तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्गं कवयो मेधाविनो वदन्ति । ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य दुःसंपाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्रायः ॥ १४ ॥ | करनी चाहिये—ऐसा मातृवत् श्रुति कृपापूर्वक कह रही है, क्योंकि वह ज्ञेय पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धिका ही विषय है । सूक्ष्म बुद्धि कैसी होती है ? इसपर कहते हैं—निशित अर्थात् पैनायी हुई छुरेकी धार—अग्रभाग जिस प्रकार दुरत्यय होती है—जिसे कठिनतासे पार किया जा सके उसे दुरत्यय कहते हैं । जिस प्रकार उसपर पैरोंसे चलना अत्यन्त कठिन है उसी प्रकार यह आत्म-ज्ञानका मार्ग बड़ा दुर्गम अर्थात् दुष्प्राप्य है—ऐसा कवि—मेधावी पुरुष कहते हैं । अभिप्राय यह है कि ज्ञेय अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण मनीषिजन उससे सम्बन्धित ज्ञान-मार्गको दुष्प्राप्य बतलाते हैं ॥ १४ ॥ |
| तत्कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्य इत्युच्यते; स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तत्रैकैकगुणापकर्षेण गन्धादीनां सूक्ष्मत्वमहत्त्वविशुद्धत्वनित्यत्वा- | उस ज्ञेयकी अत्यन्त सूक्ष्मता किस प्रकार है ? इसपर कहते हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—[इन पाँचों विषयों] से वृद्धिको प्राप्त हुई तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी विषयभूत यह पृथिवी स्थूल है; ऐसा ही शरीर भी है । उनमें गन्धादि गुणोंमेंसे एक-एकका अपकर्ष—क्षय होनेसे जलसे लेकर |
९० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ९० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दितारतम्यं दृष्टमब्वादिषु याव-<br>दाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व<br>एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता<br>यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्म-<br>त्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम्<br>इत्येतद्दर्शयति श्रुतिः— | आकाशपर्यन्त चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व,<br>महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व<br>आदिका तारतम्य देखा गया है ।<br>किन्तु स्थूल होनेके कारण जहाँ<br>गन्धसे लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे<br>विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादिकी<br>निरतिशयताके विषयमें क्या कहा<br>जाय ? यही बात आगेकी श्रुति<br>दिखलाती है— |
'निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति'
अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव (निश्चल) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५ ॥
| अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं<br><br>तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्<br><br>एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम्—<br><br>यद्धि शब्दादिमत्तद्व्येतीदं तु<br><br>अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति<br><br>न क्षीयते, अत एव च नित्यं<br><br>यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु न | जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और अगन्धयुक्त है—ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अविनाशी है, क्योंकि जो पदार्थ शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है; किन्तु यह ब्रह्म तो अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्ययः है; इसका व्यय—क्षय नहीं होता, इसीलिये यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य है। इसका व्यय नहीं होता |