कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 86, कुल 182 में से
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| ७४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति । पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रिःकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥ | समान परस्पर विलक्षण हैं—ऐसा ब्रह्मवेत्तालोग वर्णन करते—कहते हैं । [इस प्रकार] केवल अकर्मी ही ऐसा नहीं कहते बल्कि जो त्रिणाचिकेत हैं—जिन्होंने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं ॥१॥ |
यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतꣳ शकेमहि ॥ २ ॥
जो यजन करनेवालोंके लिये सेतुके समान है उस नाचिकेत अग्निको तथा जो भयशून्य है और संसारको पार करनेकी इच्छावालोंका परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥
| यः सेतुरिव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसं-तरणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः। परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये | दुःखको पार करनेका साधन होनेसे जो नाचिकेत अग्नि यजमान अर्थात् कर्मियोंके लिये सेतुके समान होनेके कारण सेतु है उसे हम जानने और चयन करनेमें समर्थ हों । तथा जो भयरहित है, और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओंका परम आश्रय अविनाशी आत्मा नामक ब्रह्म है उसे भी हम जाननेमें समर्थ हो सकें । अर्थात् कर्मवेत्ताका आश्रय अपर ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ताका आश्रय |