भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात् कर्मफलं पिबन्तौ, एकस्तत्र कर्मफलं पिवति भुङ्क्ते नेतरः; तथापि पातृसम्बन्धात्पिवन्तौ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतम् इति पूर्वेण संबन्धः; लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽर्धं स्थानं परार्धम्। तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थः।ऋत अर्थात् अवश्यम्भावी होनेके कारण सत्य कर्मफलका पान करनेवाले दो आत्मा, जिनमेंसे केवल एक कर्मफलका पान—भोग करता है, दूसरा नहीं; तो भी पान करनेवालेसे सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ छत्रिन्यायसे* दोनोंहीके लिये 'पित्रन्तौ' इस द्विवचनका प्रयोग हुआ है, सुकृत अर्थात् अपने किये हुए कर्मके फलको भोगते हुए, यहाँ 'सुकृतस्य' शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतम्' शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक अर्थात् इस शरीरमें गुहा—बुद्धिके भीतर परम—बाह्य देहाश्रित आकाश स्थानकी अपेक्षा उत्कृष्ट परब्रह्मके अर्ध यानी स्थानमें प्रवेश किये हुए हैं, क्योंकि उसीमें परब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः तात्पर्य यह है कि उस परम परार्ध यानी हृदयाकाशमें प्रवेश किये हुए हैं।
तौ च छायातपाविव विलक्षणौ संसारित्वासंसारित्वेनवे दोनों संसारी और असंसारी होनेके कारण छाया और धूपके

* जहाँ बहुत-से आदमी जा रहे हों और उनमेंसे किसी एकके पास छाता हो तो दूरसे देखनेवाला पुरुष उन्हें बतलानेके लिये 'देखो, वे छातेवाले लोग जा रहे हैं' ऐसे वाक्यका प्रयोग करता है। इस प्रकार एक छातेवालेसे सम्बन्धित होनेके कारण वह सारा समूह ही छातेवाला कहा जाता है। इसे 'छत्रिन्याय' कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सम्बन्धसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है।