भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 96
८४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| नैष दोषः। सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते। प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन। यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूपं गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण। तथा च श्रुतिः—"अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः" इत्याद्या। तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य— | समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा होनेसे आत्माके ज्ञानको ही उपचारसे गति कहा गया है। तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे आत्माका परत्व प्रदर्शित कर उसका प्रत्यगात्मत्व दिखलाया गया है, क्योंकि जो जानेवाला है वह अपने पृथक् अनात्मभूत एवं अप्राप्त स्थानकी ओर ही जाया करता है; इससे विपरीत अपनी ही ओर नहीं आता-जाता। इस विषयमें "संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छावाले पुरुष मार्गरहित होते हैं" इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है। तथा आगेकी श्रुति भी पुरुषका सबका ही प्रत्यगात्मा होना प्रदर्शित करती है— |

आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ॥ १२ ॥

| एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृत्तो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामाया- | यह पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी |