कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 111, कुल 182 में से
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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९
| ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किंचिदपि प्रत्यगात्म-दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्त-लोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्ये-वेत्यर्थः ॥ २ ॥ | अध्रुव—अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही हैं। अर्थात् वे पुत्र, वित्त और लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥ |
| यद्विज्ञानान्न किंचिदन्यत् प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्युच्यते— | ब्राह्मण लोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं— |
आत्मज्ञकी सर्वज्ञता
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥
जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥
| येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्य-यान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः । | सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञान-स्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन—मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया जानता है [ वही ब्रह्म है ] । |
| ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं वि-जानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽव-गच्छति । | शङ्का—परन्तु लोकमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ। सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातस्वरूप ही सब कुछ जानता हूँ। |