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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७


रूपतयाभिध्यायन्निरूपयन्यथावत् अतिदीर्घे जीविते को विवेकी रमेत ॥ २८ ॥हुआ; उन्हें यथावत् ( मिथ्यारूपसे ) समझता हुआ कौन विवेकी पुरुष अति दीर्घ जीवनमें प्रेम करेगा ? ॥ २८ ॥

अतो विहायानित्यैः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्—अतः मुझे इन मिथ्या भोगोंसे प्रलोभित करना छोड़कर जिसके लिये मैंने प्रार्थना की है और—

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२९॥

हे मृत्यो ! जिस ( परलोकगत जीव ) के सम्बन्धमें लोग 'है या नहीं हैं' ऐसा सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोकके विषयमें [ निश्चित विज्ञान ] है वह हमसे कहिये । यह जो गहनतामें अनुप्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं माँगता ॥ २९ ॥

यस्मिन्प्रेत इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते आत्मनोहे मृत्यो ! जिस परलोकगत जीवके विषयमें ऐसा सन्देह करते हैं कि मरनेके अनन्तर 'रहता है या नहीं रहता' उस महान्—महान् प्रयोजनके निमित्तभूत साम्पराय—परलोकके सम्बन्धमें उस आत्माका जो निश्चित विज्ञान