कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context३८ कठोपनिषद् [ अध्याय १
| निर्णयविज्ञानं यत्तद्ब्रूहि कथय<br>नोऽस्मभ्यम्। किं बहुना योऽयं<br>प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं<br>गहनं दुर्वि्वेचनं प्राप्तोऽनुप्रविष्टः<br>तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थ-<br>नीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता<br>न वृणीते मनसापीतिश्रुतेर्वचन-<br>मिति ॥ २९ ॥ | है वह हमसे कहिये। अधिक क्या,<br>यह जो आत्मविषयक प्रकृत वर है<br>वह बड़ा ही गूढ—गहन है और<br>दुर्वि्वेचनीयताको प्राप्त हो रहा है।<br>उस वरसे अन्य अविवेकी पुरुषोंद्वारा<br>प्रार्थनीय कोई और अनित्य वस्तु-<br>विषयक वर नचिकेता मनसे भी नहीं<br>माँगता—यह श्रुतिका वचन है॥२९॥ |
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ १ ॥