कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 56 of 182
Read in context| ४४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| के ते इत्युच्यते। या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्ज्ञातावगता पण्डितैः। तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये। कस्माद्यस्मादविद्वद्बुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादात्मोपभोगाभिवाञ्छासंपादनेन। अतो विद्यार्थिनं श्रेयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः ॥ ४ ॥ | वे कौन हैं—इसपर कहते हैं—'जो कि पण्डितोंद्वारा प्रेयको विषय करनेवाली अविद्या तथा श्रेयोविषया विद्यारूपसे जानी गयी हैं। उनमें तुझ नचिकेताको मैं विद्याभिलाषी अर्थात् विद्यार्थी मानता हूँ। क्यों मानता हूँ ? क्योंकि अविवेकियोंकी बुद्धिको प्रलोभित करनेवाले अप्सरा आदि बहुत-से भोग भी तुम्हें लुभा नहीं सके—उन्होंने तेरे हृदयमें अपने भोगकी इच्छा उत्पन्न करके तुझे श्रेयोमार्गसे विचलित नहीं किया। अतः मैं तुझे विद्यार्थी यानी श्रेयका पात्र समझता हूँ—यह इसका अभिप्राय है ॥ ४ ॥ |
अविद्याग्रस्तोंकी दुर्दशा
| ये तु संसारभाजनाः— | किन्तु जो संसारके पात्र हैं— |
|---|
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥
वे अविद्याके भीतर रहनेवाले, अपने-आप बड़े बुद्धिमान् बने हुए और अपनेको पण्डित माननेवाले मूढ पुरुष, अन्धेसे ही ले जाये जाते हुए अन्धेके समान अनेकों कुटिल गतियोंकी इच्छा करते हुए भटकते रहते हैं ॥ ५ ॥