भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३


वित्तमयीं धनप्रायाम्। यस्यां सृत्तौ मज्जन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मनुष्याः ॥ ३ ॥हुआ, जिस मार्गमें कि बहुत-से मूढ पुरुष डूब जाते अर्थात् दुःख उठाते हैं॥ ३ ॥

तयोः श्रेय आददानस्य साधुर्भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत<br><br>इत्युक्तं तत्कस्माद्यतः—‘उनमेंसे श्रेयको ग्रहण करनेवालेका शुभ होता है और जो प्रेयको वरण करता है वह स्वार्थसे पतित हो जाता है’ ऐसा जो ऊपर (इस वल्लीके प्रथम मन्त्रमें) कहा गया है, सो क्यों ? [इसपर यमराज कहते हैं, ] क्योंकि—

दूरमेते विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥

जो विद्या और अविद्यारूपसे जानी गयी हैं वे दोनों अत्यन्त विरुद्ध स्वभाववाली और विपरीत फल देनेवाली हैं। मैं तुझ नचिकेताको विद्याभिलाषी मानता हूँ, क्योंकि तुझे बहुत-से भोगोंने भी नहीं लुभाया ॥ ४ ॥

दूरं दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपे विवेकाविवेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाइव।<br><br>विषूची विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेनेत्येतत् ।ये दोनों प्रकाश और अन्धकारके समान विवेक और अविवेकरूप होनेसे ‘दूरम्’ अर्थात् महान् अन्तरके साथ विपरीत हैं—आपसमें एक-दूसरेसे व्यावृत्तरूप हैं।<br><br>और विषूची अर्थात् नाना गतिवाले हैं यानी संसार और मोक्षके कारण होनेसे विभिन्न फलयुक्त हैं।