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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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हे भ्रात तुम इस मनुष्य को पेड़ से नीचे फेंक दो। मैं इसे लेकर चला जाऊँ। भालू बोला— 'रे पापी ! यह मेरा मित्र है। मैं मित्र को मरवाना नहीं चाहता' ॥८४॥ क्रमशः भालू के सोने और राजपुत्र के जागते रहने पर सिंह ने राजपुत्र से कहा— 'हे मनुष्य तुम इस भालू को मेरे लिए पेड़ से नीचे फेंक दो' ॥८५॥ यह सुनकर भय के कारण सिंह को प्रसन्न करने के लिए राजपुत्र ने भालू को नीचे फेंकने का यत्न किया। आश्चर्य है कि दैवयोग से तत्काल जागा हुआ भालू उसके यत्न करने पर भी नीचे न गिर सका ॥८६॥ भालू ने राजपुत्र को शाप दिया कि 'हे मित्रद्रोहिन् ! जबतक यह वृत्तान्त प्रकट न होगा तबतक तू पागल बना रहेगा' ॥८७॥ प्रातःकाल राजकुमार राजभवन पहुँचते ही पागल हो गया। योगनन्द, उसकी यह दशा देखकर अकस्मात् अत्यन्त दुःखी हुआ ॥८८॥ राजा ने कहा—'यदि इस समय वररुचि जीवित होता तो इस पागलपन का कारण मालूम होता। उसके मारने में जो मैंने चातुर्य किया इसके लिए मुझे धिक्कार है' ॥८९॥ राजा की बातें सुनकर मन्त्री शकटाल ने सोचा कि यह अवसर वररुचि को प्रकट करने का है ॥९०॥ उसने सोचा कि वररुचि मानी है। अब वह यहाँ मन्त्री बनकर न रह सकेगा और मैं ही एकमात्र सर्वसर्वा रहूँगा। राजा मुझ पर विश्वास करेगा। (तब मैं अपना बदला निर्द्वन्द्व होकर ले सकूँगा) ऐसा सोचकर उसने राजा से अभय की प्रार्थना करके बोला ॥९१॥ इसके अनन्तर शकटाल ने हर्षपूर्वक मुझे योगनन्द के पास पहुँचाया और मैंने उन्मत्त राजपुत्र को देखा ॥९२॥ उसे देखकर मैंने राजा से कहा—'इसने मित्रद्रोह किया है' और गन्धवती की कृपा से उस को रात का सारा वृत्तान्त कह दिया ॥९३॥ मेरे वृत्तान्त कहने पर राजपुत्र शाप से मुक्त होकर मेरी स्तुति करने लगा और राजा ने पूछा कि तुमने इस वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥९४-९५॥ तब मैंने कहा—'राजन् ! बुद्धिमान् की बुद्धि अथवा या अनुमान से तथा प्रतिभा से सब कुछ जान लेती है। जैसे मैंने रात्री की कमर में सिंह का ज्ञान किया था। यह सुनकर राजा पश्चात्ताप करने लगा ॥९६-९७॥ तदनन्तर राजा के द्वारा दिये गये सम्मान दान आदि की उपेक्षा करके विरक्तता को बहुत बड़ा लाभ समझकर मैं अपने घर चला गया। कारण यह कि चरित्र की पवित्रता ही विद्वानों का धन है ॥९८॥