BharatKosha
Back to the archive

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

प्रारंभिक भूमिका व विषय-सूची

Page 1Permalink

प्रकाशक बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् पटना - ३ l © सर्वस्वात्व प्रकाशकाधीन प्रथम संस्करण : शकाब्द १८८२ खृष्टाब्द १९६ मूल्य दस रुपये मात्र मुद्रक सम्मेलन मुद्रणालय प्रयाग

Page 2Permalink

वक्तव्य परिषद् के लक्ष्य और उद्देश्य में भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं के साहित्यिक सांस्कृतिक शास्त्रीय वैज्ञानिक आदि विषयक ग्रन्थों को विशुद्ध हिन्दी-भाषा में अनूदित कर प्रकाशित करना भी रहा है और इस दिशा में परिषद् ने अबतक राजशेखर की संस्कृत के साहित्य शास्त्रविषयक 'काव्यमीमांसा' डॉ पिशल द्वारा जर्मन भाषा में लिखित 'कम्परेटिव ग्रामर ऑफ़ दि प्राकृत लैंग्वेजेज' ('प्राकृत भाषाओं का व्याकरण' के नाम से अनूदित) फ्रेंच भाषा में मारिस मेटर्लिंक-लिखित 'ल्वासे ब्यू' तथा अँगरेजी में लिखित और कलकत्तों के ही द्वारा रूपा न्तरित 'वैभवत' और 'संस्कृतविदग्धा एक अनुशीलन' के हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित किये हैं और उपर्युक्त अनुवाद-ग्रन्थों का अच्छा समादर भी हुआ है। प्रस्तुत ग्रंथ महाकवि सोमदेवभट्ट-कृत 'कथा सरित्सागर' नामक बृहत् ग्रंथ के प्रथम खण्ड का मूल संस्कृत-सह हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है। उक्त कथा-सरित्सागर का अनुवाद पण्डित केदारनाथ शर्मा सारस्वत ने किया है किन्तु सम्पूर्ण ग्रंथ का अनुवाद वे अपने जीवन में पूरा न कर सके। हमें खेद है कि अचानक ही उनका देहावसान हुआ और उन्हें अपने अनुवाद के प्रथम खण्ड का प्रकाशन देखने का अवसर न मिल सका। उन्होंने प्रकाशन की सुगमता के उद्देश्य से सम्पूर्ण ग्रंथ को तीन खण्डों में विभक्त किया था। सम्पूर्ण ग्रंथ १८ लम्बकों में विभक्त है। उनमें केवल ६ लम्बकों का यह प्रथम खण्ड अभी प्रकाश में आ रहा है अन्य ६ लम्बकों का दूसरा खण्ड शीघ्र ही प्रेस में दिया जायगा और शेष ६ लम्बकों का अनुवाद किसी योग्य संस्कृत-हिन्दी के विद्वान से करा कर प्रकाशित करके इस बृहत् ग्रंथ का काम समाप्त किया जायगा। जिस दिन उपर्युक्त तीनों खण्ड प्रकाश में आ जायेंगे उस दिन हमें विशेष प्रसन्नता होगी। इस ग्रंथ की भूमिका संस्कृत-हिन्दी के ख्यातिप्राप्त विद्वान डॉ वासुदेवशरण अग्रवाल (पुरातत्त्व-विभाग हिन्दू-विश्वविद्यालय वाराणसी) ने लिखने की कृपा की है। आपने अपनी भूमिका में मूल ग्रंथ के सम्बन्ध में जैसा विद्वत्तापूर्ण विवेचन प्रस्तुत किया है उससे ग्रंथ की उपयोगिता और सर्वप्रियता ही सिद्ध होती है। हम परिषद् की ओर से इस कृपापूर्ण सहयोग के लिए आपका आभार स्वीकार करते हैं। साथ ही स्वर्गीय सारस्वतजी की आत्मा की शान्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थी हैं। पाठक-समाज प्रस्तुत ग्रंथ का मूल-सह अनुवाद पढ़कर आनन्द का अनुभव करेगा ऐसा हमारा विश्वास है। बैद्यनाथ पाण्डेय १ ५ ५ संपादक

Page 3Permalink

इस चित्र में कोई पाठ (text) या सामग्री दिखाई नहीं दे रही है (चित्र पूरी तरह से रिक्त/श्वेत है)। कृपया सही या स्पष्ट पृष्ठ की छवि पुनः साझा करें।

Page 4Permalink

भूमिका कथासरित्सागर कहानी-साहित्य का शिरोमणि ग्रन्थ है। इसे काश्मीर में पंडित सोमदेव ने त्रिगर्त या कुल्लू-काँगड़ा के राजा की पुत्री काश्मीर के राजा अनन्त की रानी सूर्यमती के मनो- विनोद के लिए ई १०६३ और १०८१ के बीच में लिखा। ग्रन्थ में २१३८८ पद्य हैं और लेखक ने उसे १२४ तरंगों में बाँटा है। इसका एक दूसरा विभाग लम्बकों में है जिनकी संख्या १८ है। यह ग्रन्थ अपने वर्तमान रूप में अनेक छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह है। सोमदेव ने यथार्थ ही इसे कथा-रूपी सरिताओं का सागर कहा है। अपने ग्रन्थ के आरम्भ में उन्होंने मूल्यवान् सूचना के रूप में लिखा है— बृहत्कथायाः सारस्य संग्रहं रचयाम्यहम्। (प्रथम तरंग श्लोक तीन) इसी सूचना को अन्तिम प्रशस्ति में इस प्रकार विशद रूप से कहा है— नानाकथामृतमयस्य बृहत्कथायाः सारस्य सज्जनमनोम्बुधिपूर्णचन्द्रः । सोमेन विप्रवरभूरिगुणाभिरामरामात्मजेन विहितः खलु संग्रहोऽयम् ॥ अर्थात्—कथासरित्सागर अनेक कथाओं के अमृत की खान बृहत्कथा नामक ग्रन्थ का सार है। बृहत्कथा पैशाची भाषा का ग्रन्थ था जिसकी रचना गुणाढ्य ने सातवाहन राजाओं के समय में प्रथम-द्वितीय शती के लगभग की थी। आन्ध्र-सातवाहन-युग में स्थल-जल-मार्गों पर अनेक सार्थवाह पोताधिपति एवं सांयात्रिक व्यापारी रात-दिन चहल-पहल रखते थे। टकटक करके तारों से भरी हुई लम्बी रातों में उनके मनोविनोद के लिये अनेक कहानियों की रचना स्वाभाविक थी जिनमें उन्हीं के देशान्तर-भ्रमण से उत्पन्न अनुभवों का अमृत निचोड़ा जाता था। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक के पहाड़ों और जंगलों एवं गाँवों और नगरों की तिल-तिल भूमि को अपने पैरों से रूँदते हुए उनके चरण सदा रौंदते रहते थे। इसी प्रकार पूर्व और पश्चिम के समुद्रों पर उनके प्रवहण सरपट छूटते थे। सातवाहन-नरेशों की मुद्राओं पर अंकित जलयानों के चित्र उस काल के सामुद्रिक व्यापार और द्वीपान्तर-संनिवेश की सूचना देते हैं। उसी के प्रयत्नों से बृहत्तर भारत का वह रूप सम्पन्न हो पाया जिसे मत्स्यपुराण के लेखक ने बारह द्वीपों और एकान्त रत्नों से निर्मित 'नानापण्य महार्णव' कहकर प्रणाम किया है (द्वादशार्णववां द्वीप चैकादशापरस्तन मत्स्य २४८।२२-२६)। उन्हीं उद्यमी सार्थों और नाविकों के अनुभवों की बहुमुखी सामग्री को गुणाढ्य ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से बृहत्कथा के साँचे में ढाल दिया था।

Page 5Permalink

गुणाढ्य के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज में पूर्व के महोदधि और पश्चिम के रत्नाकर समुद्रों के इस पार और उस पार के भूखंडों की अनेक कथाएं सम्मिलित थीं इसकी सूचना बृहत्कथा की कई उत्तरकालीन वाचनाओं से प्राप्त होती है। बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जो साहित्यिक सत्र विक्रमीय प्रथम शती के लगभग आरम्भ किया था वह वाङ्मय का सहस्र सम्वत्सर सत्र बन गया और संस्कृत-प्राकृत के कई प्रतिभाशाली रचयिताओं ने उसमें भाग लिया। सोमदेव का कथासरित्- सागर बृहत्कथा के विकास की अन्तिम कड़ी है। वह बृहत्कथा की काश्मीरी वाचना है, जिसमें सोमदेव की प्रतिभाशालीनी लेखनी ने यथेष्ट परिवर्तन किए हैं। कथासरित्सागर के स्वरूप के यथार्थ परिचय के लिये बृहत्कथा और उसकी वाचनाओं के विषय में जानना आवश्यक है। उद्योतन सूरि द्वारा विरचित (७७९ ई.) कुवलयमालाकहा प्राकृत-भाषा का अति उत्कृष्ट कथा-ग्रन्थ अभी प्रकाश में आया है। उसके आरम्भ में बृहत्कथा को 'वड्डकहा' कहते हुए लिखा है— पयलक्कतायमणिलया सिक्खाविउकइपयस्त सुहयं वा। ककलासब्भो गुणड्डो सरसई जस्स वड्ढकहा ॥ (कुवलयमाला पृ० ३ पंक्ति २१) 'बृहत्कथा क्या है साक्षात् सरस्वती है। गुणाढ्य स्वयं ब्रह्मा हैं। यह बृहत्कथा सब कलाओं की खान है। कविजन इसे पढ़कर शिक्षित बनते हैं। उस समय बृहत्कथा की प्रशंसा में इससे अधिक और क्या कहा जा सकता था ? उद्योतन सूरि से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व बाण ने लिखा था— समुद्दीपितकन्दर्पा कृतगौरीप्रसाधना। हरलीलेव लोकस्य विस्मयाय बृहत्कथा॥ बाण के उल्लेख से यह ज्ञात होता है कि उसके समय तक बृहत्कथा कामकथा के रूप में ही सुरक्षित थी। यही उसका मूल रूप था। 'कृतगौरीप्रसाधना' से सूचित होता है कि बृहत्कथा का आरम्भिक पाठ शिव-पार्वती के संवाद के रूप में था अर्थात् पार्वती ने शिवजी से कथा सुनाने की प्रार्थना की और उत्तर में शिवजी ने जो कथा सुनाई, वही बृहत्कथा हुई। सोमदेव ने कथासरित् सागर की पहली तरंग में इस भूमिका का उल्लेख किया है। तिलकमंजरी के कर्त्ता धनपाल ने (११वीं शती) बृहत्कथा की उपमा उस समुद्र से दी है जिसकी एक-एक बूँद से अन्य कितनी ही कथाओं की रचना हुई— सत्यं बृहत्कथाम्भोधेर्बिन्दुमादाय संस्कृताः। तेनेतरकथाकन्थाः प्रतिभान्ति तदग्रतः॥ आचार्य हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन की स्वोपज्ञवृत्ति में कथाओं के भेद बताते हुए बृहत्कथा का उल्लेख किया है (दम्भाङ्किताऽमृतान्निर्गताऽहम्नराचरितवद् बृहत्कथा च ८ सू ८)।

Page 6Permalink

गुणाढ्य-कृत मूल बृहत्कथा अब प्राप्य नहीं है। ज्ञात होता है सोमदेव के बाद उस महान् ग्रन्थ का लोप हो गया। किन्तु कालक्रम से बृहत्कथा के जो रूपान्तर बने उनमें चार अबतक प्राप्त हैं। पहला बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह है। इसकी रचना संस्कृत में लगभग पाँचवीं शती में हुई। इसमें २८ सर्ग हैं, पर ग्रन्थ अपूर्ण रहा। इसके कर्ता बुधस्वामी ने गुप्तकालीन स्वर्ण-युग की संस्कृति के साँचे में बृहत्कथा को ढालने का यत्न किया। विद्वान् इसे बृहत्कथा की पैशाची वाचना मानते हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह का देवनागरी-लिपि में मूल संस्करण और फ्रेंच-अनुवाद फीकाकोत ने पेरिस से प्रकाशित कराया था। बुधस्वामी के प्रायः साथ ही या संभवतः १ वर्ष के भीतर बृहत्कथा का एक प्राकृत संस्करण जैन परम्परा में संघदासगणि ने वसुदेव हिण्डी के नाम से तैयार की। मूल बृहत्कथा में नरवाहनदत्त नायक था। वह वत्सराज उदयन का पुत्र था। कालिदास ने लिखा है कि मालवा के गाँवों में वहाँ के बड़े-बूढ़े उदयन की कहानी कहने में चतुर थे। उदयन से सम्बन्धित यह कहानी केवल वासवदत्ता और उदयन की प्रेम-कहानी तक सीमित न रही होगी। उतना अंश तो कथा- सरित्सागर के आरम्भ में ही है, किन्तु उदयन की कहानी का पूरा चक्र था। उसके ही पेटे में उसके पुत्र नरवाहनदत्त के विवाह की अनेक कथाएँ भी थीं। पुत्र ने पिता के पद-चिह्नों पर चलते हुए अपने जीवन में अनेक प्रेम-परिणयों का ठाट विकसित किया। नरवाहनदत्त के अनेक विवाहों के वर्णन करने के कारण मूल बृहत्कथा का स्वरूप कामकथा या शृंगारकथा जैसा था। नरवाहनदत्त देशान्तरों का भ्रमण करते हुए जहाँ जाता वहीं उसकी यात्रा का पर्यवसान एक विवाह के रूप में होता था। जैसे व्यापारी धन कमाकर सकुशल लौट आने पर सिद्ध यात्री बनते हैं वैसे ही नरवाहनदत्त के चरित में द्वीपान्तर-पर्यटन की सिद्ध यात्रा एक नई रानी के साथ विवाह के रूप में होती है। कथासरित्सागर में जहाँ एक ओर अपने नाम के अनुसार १२४ तरंगों का विभाग है वहीं उसके १८ लम्बक भी हैं। यह लम्बक शब्द अपने मूल स्रोत की ओर संकेत करता है। लम्बक का मूल संस्कृत रूप लम्भक था। एक विवाह द्वारा एक स्त्री की प्राप्ति 'लम्भ' कहलाती थी और उसी की कथा के लिए लम्भक शब्द प्रयुक्त हुआ। तदनुसार ही अलंकारवती लम्भक, शशांकवती लम्भक इत्यादि अलग-अलग कथाओं के नाम पड़ होंगे। हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन की टीका में स्पष्ट शब्दों में बृहत्कथा को लम्भों में विभक्त कहा है। वही लम्भक का मूल रूप ज्ञात होता है। वादीभसिंह-कृत गद्य-चिन्तामणि में नायक द्वारा पत्नी की प्राप्ति का वर्णन करनेवाले कथाखण्डों को लम्भ कहा है। स्मरण रखने की बात है कि वसुदेव हिण्डी के विभागों में तो लम्भक शब्द है किन्तु बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में ग्रन्थ का विभाग सर्गों में हुआ है अर्थात् वह एक सर्गबद्ध रचना है, पर वहाँ भी प्रत्येक कथा के अन्त में 'लाभ' शब्द आया है। ज्ञात होता है कि लम्भ या उसी के प्राकृत रूप लम्भ का प्रयोग गुप्तकाल में होने लगा था। सुबन्धु-कृत वासवदत्ता में जिसकी रचना चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के कुछ बाद पाँचवीं शताब्दी के आरम्भ में हुई, बृहत्कथा को लम्भों से युक्त कहा है—बृहत्कथालम्बैरिव सालभञ्जिकासन्निधैः अर्थात् बृहत्कथा के लम्भों

Page 7Permalink
  • ८ -

वा परिच्छेदों में शालभञ्जिका या स्त्रियों की कथाएँ थीं। दशरूपक के कर्त्ता धनंजय ने जो मालव राज मुंज का सभासद था रामायण के साथ बृहत्कथा का उल्लेख किया है। इससे यह अनुमान किया गया है कि शायद रामायण की तरह बृहत्कथा की रचना भी सर्गों में हुई हो पर इस अनुमान के लिए पर्याप्त कारण नहीं है और यही सम्भावना अधिक प्रतीत होती है कि मूल पैशाची बृहत्कथा में ही कथाओं के विभाग को लम्भ या लम्भक जैसे मिलते-जुलते शब्द से सूचित किया गया था और उसी परम्परा में बना लम्भक शब्द सुबन्धु के समय में प्रयुक्त होने लगा था। बृहत्कथा के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालने के लिए संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राप्ति उल्लेखनीय घटना है। 'हिण्डी' शब्द का अर्थ परिभ्रमण या पर्यटन है। संघदासगणि ने जो वसुदेव हिण्डी लिखी उसमें उन्होंने यद्यपि बृहत्कथा को ही आधार बनाया था किन्तु ग्रन्थ के ठाट और उद्देश्य में काफी परिवर्तन किए। जहाँ बृहत्कथा लौकिक कामकथा थी वहाँ संघदास ने वसुदेव हिण्डी को धर्मकथा का रूप दिया और जैनधर्म की प्रभावना करनेवाले कितने ही प्रसंगों को उसमें यथास्थान सम्मिलित किया। इससे भी अधिक महत्त्व का परिवर्तन कथा के नायक का बदल डालना था। पैशाची बृहत्कथा में वत्सराज उदयन के पुत्र नरवाहनदत्त के विवाहों की कहानियाँ थीं किन्तु संघदास ने अन्धकवृष्णि-वंश के प्रसिद्ध पुरुष वसुदेव को अपना नायक बनाया। वसुदेव हिण्डी में २९ लम्भक हैं और यह महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में गद्य-शैली में है जिसमे कुछ मिलाकर लगभग ११ हजार श्लोक प्रमाण की सामग्री है। वसुदेव हिण्डी के भी जैन परम्परा में दो रूप मिलते हैं। पहला ग्रन्थ तो यही संघदासगणि का रचा हुआ है। इसे प्रथम खण्ड कहते हैं। किन्तु इसी का एक दूसरा खण्ड उपलब्ध है जो मध्यम खण्ड के नाम से प्रसिद्ध है। उसकी रचना धर्मदासगणि ने अपने पूर्ववर्ती संघदासगणि की रचना को आगे बढ़ाते हुए लगभग दो शती बाद की। उसकी भूमिका में धर्मदास ने कहा है—'कृष्ण के पिता वसुदेव ने १०० वर्ष तक परिभ्रमण किया और अनेक विद्याधरों एवं राजाओं की कन्याओं से विवाह किया। संघदासगणि ने वसुदेव के केवल २९ विवाहों का वर्णन किया था। शेष ७१ विवाहों की कथा उसने विस्तार-भय से छोड़ दी थी। उसे मध्यम या बीच के लम्भकों के साथ कथासूत्र मिलाते हुए मैं कह रहा हूँ।' धर्मदासगणि-कृत मध्यम वसुदेव हिण्डी में ७१ लम्भक १७ श्लोकों में पूर्ण हुए हैं। यह बड़ा ग्रन्थ अभी तक अप्रकाशित है इसलिये इसकी कहानियों के विषय में विशेष कुछ नहीं १ सुव्वइ य किल वसुदेवेणं वाससतं परिब्भमंतिएं इमम्मि भरहे विज्जाधरिवरवइत्ति बालदुक्खंवाससंभवाणं कन्याणं सतं परिणीतं तत्थ य सामावियपमावियाणं रोहिणीपञ्चउवसायाणं एगुणतीस लम्भता संघदासवायरएणं उवणिबद्धा। एगसत्तरिं च वित्थारभीएणा कहामज्झे छड्डिया। तो हुं भो सोहयसिगारकहापसंसणं असहमागं आयरियसयाते अवधारेऊणं पवयणणुरागेणं आयरियमिओएण य तेंति लब्भित्थलक्खणमग्गं गंधव्वएणे जग्गुत्तउत्तो हे। तं सुणह इतो पुव्वकहाणुसारेण चेव।

उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था।

Page 8Permalink

– ९ –

कहा जा सकता। किन्तु अनुमान के आधार पर वसुदेव के पहले विवाह के ढंग पर ही जितनी और कथाएं मिल सकीं या गढ़ी जा सकीं उन्हें जोड़-बटोरकर धर्मदास ने परिशिष्ट-रूप में एक नए ग्रंथ का ठाट खड़ा किया। इससे यह अनुमान करना उचित नहीं कि मूल वसुदेव हिण्डी में या उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था। धर्मदासगणि की वसुदेव हिण्डी को मध्यम खण्ड कहा जाता है। इसका कारण यह है कि संघदास के ग्रन्थ का २९वां लम्भक जहां समाप्त होता था उससे आगे धर्मदास ने अपना कथा- सूत्र नहीं चलाया बल्कि उसने पहली वसुदेव हिण्डी की १८वीं कथा पियंगुमंजरी लम्भक के साथ अपने ७१ लम्भकों का सन्दर्भ जोड़ा है और इस तरह संघदास की वसुदेव हिण्डी के पेटे में अपने ग्रन्थ को भरा है। इसी से इसे वसुदेव हिण्डी का मध्य भाग या मध्यम खण्ड कहते हैं। वस्तु स्थिति यह है कि संघदासगणि का २९ लम्भकोंवाला ग्रन्थ अलग और अपने-आप में सम्पूर्ण था। उसके बाद धर्मदासगणि ने अपना ग्रन्थ अलग बनाया और चतुराई से उसे अपने पूर्ववर्ती ग्रंथ की एक खूंटी पर टाँग दिया। संघदास की वसुदेव हिण्डी की रचना में इस समय छ प्रकरण पाए जाते हैं—(१) कथोत्पत्ति (२) धम्मिल्ल हिण्डी (३) पीठिका (प्राकृत पेढिया) (४) मुख (५) प्रतिमुख (६) शरीर। इसमें शरीर के अन्तर्गत २९ लम्भकों की कहानियां हैं जिनमें से अन्तिम इस समय त्रुटित है और बीच के १९वें २० वें दो लम्भकों की कथाएं भी नहीं हैं। १८वें पियंगुमंजरी लम्भक के बाद २१ वें केतुमती लम्भक की कथा शुरू होती है। यही १८ वें लम्भक की समाप्ति पर धर्मदासगणि ने अपने मध्यम खण्ड का पेबन्द जोड़ा है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि कथोत्पत्ति नामक पहले प्रकरण के बाद ५ पृष्ठों में धम्मिल्ल हिण्डी नाम का एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण उपलब्ध होता है। किन्तु स्पष्ट है कि वह अपने किसी अज्ञात मूल स्थान से छटक कर यहाँ वसुदेव हिण्डी में कटफन्त रूप में ही रक्खा गया है। इस धम्मिल्ल हिण्डी प्रकरण में धम्मिल्ल नामक किसी सार्थवाह पुत्र की कथा है जिसने देश-देशान्तरों में जाकर ३२ विवाह किए। मूल ग्रन्थ में इसे धम्मिल्ल चरित कहा गया है और धम्मिल्ल शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए लिखा है कि गर्भ के समय उसकी माता को धर्माचरण के विषय में दोहृद उत्पन्न हुआ था। अतएव पुत्र का नाम धम्मिल्ल रक्खा गया। बृहत्कथा के दूसरे रूपान्तरों में जैसे बृहत्कथामंजरी या कथासरित्सागर में धम्मिल्ल चरित की गन्ध भी नहीं है। धम्मिल्ल हिण्डी का वातावरण सार्थवाहों के संसार से लिया गया है। इसे अपने-आप में एक स्वतंत्र रचना माना जा सकता है जिसने मूल ठाट को कुंबी नरवाहनदत्त या वसुदेव हिण्डी की तरह ही कई विवाहों की कहानियों पर आश्रित है। धम्मिल्ल शब्द का प्रयोग पहले-पहल गुप्तकालीन संस्कृत-नाट्य में पाया जाता है। एक प्रकार के केशबन्ध को धम्मिल्ल केश कहते थे जिसमें बालों का एक जूड़ा बनाकर सिर के अग्रभाग या मध्य भाग में बाँधा जाता था। इस शब्द की व्युत्पत्ति द्रभिल या डमिल से संभाव्य है। हो सकता है कि दक्षिण भारत के किसी प्रसिद्ध सार्थवाह का नाम इसके मूल में रहा हो और शिलप्प्याधिकार नामक तमिल-काव्य में व्यापार का जो वातावरण है उसकी पृष्ठभूमि में

बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है।

Page 9Permalink
  • १ - ग्रम्भिक की कथाओं की रचना हुई हो। वस्तुतः धम्मिल्ल हिण्डी में धनवती सार्थवाह के पुत्र धनदत्त के विषय में उल्लेख है कि उसने जहाज लेकर यवन विषय या यवन देश की व्यापारिक यात्रा की थी और अपने साथ बहुत से सांप्रायिक व्यापारियों को ले गया था। शिलप्पधिकारम् के अनुसार मलय-देश के व्यापारियों का घनिष्ठ सम्बन्ध पुहार या कावेरीपतन के व्यापारियों के साथ था। बृहत्कथा की किसी दूसरी वाचना में धम्मिल्ल हिण्डी जैसा कोई वंश नहीं पाया जाता। कम-से-कम बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह, क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी और सोमदेव-कृत बृहत्कथासरित्सागर में इस तरह का क्रमभिक पेंचस्व नहीं है। वसुदेव हिण्डी में धम्मिल्लक हिण्डी के अलावा छः विभाग थे—अर्थात कथा की उत्पत्ति पीठिका, मुख, प्रतिमुख, शरीर और उपसंहार। कथोत्पत्ति पीठिका और मुख इनमें कथा का प्रस्ताव हुआ है। प्रतिमुख में वसुदेव आत्मकथा का आरम्भ करते हैं। सत्यभामा के पुत्र भानु के लिए १८ कन्याएँ इकट्ठी की गई थीं। किन्तु उनका विवाह रुक्मिणी के पुत्र शाम्ब से कर दिया गया। इस पर प्रद्युम्न ने वसुदेव से कहा—'देखिए, साम्ब ने अन्त पुर में बैठे-बैठे १८ बहुएँ पा लीं जब कि आप १ वर्ष तक उनके लिए घूमते फिरे। इसके उत्तर में वसुदेव ने कहा—'साम्ब तो कुएँ का मेढक है, जो सरलता से प्राप्त भोग से सन्तुष्ट हो गया। मैंने तो पर्यटन करते हुए अनेक सुख और दुःखों का अनुभव किया। मैं मानता हूँ कि दूसरे किसी पुरुष के भाग्य में इस तरह का उतार-चढ़ाव न आया होगा। वस्तुतः वसुदेव के इस छोटे-से सटीक वाक्य में उस महान् युग की हलचल का बीज समाया हुआ है। उस समय के चैतन्य हृदय पश्चिम के यवन-देश से पूर्व के यवद्वीप और सुवर्णभूमि तक के विशाल क्षेत्र को रात दिन ढूंढ़ते रहते थे। बाण के शब्दों में कहा जाय तो उनके पैरों में मानों कोई द्वीपान्तरसंचारी पादलेप लगा हुआ था। वे यह मानते थे कि द्वीपान्तरों की यात्रा किए बिना लक्ष्मी की प्राप्ति नहीं होती (अलभ्यमटनं श्रीसमाकर्षणं भवति)। मत्स्यपुराण के लेखक ने समुद्र को ललकारते हुए कहा है—हे उत्ताल तरंगोंवाले महार्णव, आजतक शंखा आदिद्वीपों में निवास करनेवाले राक्षस ही तुम्हारे जल में आते-जाते रहे हैं जिसके कारण उसमें कीच उठ खड़ी हुई है। अब अपने उस कलुष को शिखाओं से जुड़े हुए प्रांगण से दूरक डालो, क्योंकि देवाधिदेव शिव अपने परिवार के साथ तुम्हारा संतरण करना चाहते हैं— भूर्जालम्बाः कुरुत शिखिलोपमं पयः सुरद्विषाममल महातिकर्वमम्। (मत्स्यपुराण, १५४—४५५) जैसा सभापर्व में आया है, पूर्व से पश्चिम और पश्चिम से पूर्व की समुद्र-यात्राओं का ताँता उस समय लगा रहता था (सभा ४९।१६)। दिव्यावदान में तो यहाँतक कहा है कि महासमुद्र की यात्रा किए बिना अर्थोपार्जन की आशा ऐसी है, जैसे ओस की बूंदों से घड़ा भरने का प्रयत्न। वसुदेव ने प्रद्युम्न को जो उत्तर दिया, वह मानव-हृदय के इन भावों के सर्वथा अनुकूल था। निरन्तर पर्यटन और दूर-दूर के देशों में परिभ्रमण यही गुप्तों के स्वर्णयुग में जीवन की टेक बन गई थी। एक बार नहीं कई-कई बार लोग जोखिम उठाकर भी समुद्रों की यात्रा करते थे।
Page 10Permalink
  • ११ -

शूर्पारक-निवासी पूर्ण नाम के सार्थवाह के कथन से यह बात सूचित होती है— भाइयो महासमुद्र की यात्रा में दुःख बहुत है, सुख थोड़ा है। बहुत-से जाते हैं, पर थोड़े ही लौट पाते हैं। क्या आपने ऐसे किसी का नाम सुना है, जो छ' बार महासमुद्र की यात्रा से सफलता के साथ अपने जहाजों को लेकर लौट आया हो ?' अवश्य ही सातवाहन-युग की सामुद्रिक यात्राओं के वातावरण में जिन कहानियों का ठाट रचा गया और बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जिनका संग्रह किया, उनकी मूल भावना इसी प्रकार की जल-थल-सम्बन्धी हलचलों से पोषित थी। उसका भरपूर प्रभाव वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथा की दूसरी उत्तरकालीन वाचनाओं पर पड़ा। सोमदेव के कथासरित्सागर में भी उत्तर-पश्चिम की ओर अपरगांधार की राजधानी पुष्यकलावती तक का उल्लेख है। जहां उत्तरापथगामी वणिग्पुत्र म्लेच्छभूयसी भूमि को पार करते हुए पहुँचते थे और उनकी इस यात्रा में महाप्रातिभ नामक शैव योगी भी उनके साथी के रूप में वितस्ता के उस पार के देशों में चक्कर लगाते थे। दूसरी ओर समुद्रशूर वणिक की कथा है जो पूर्व दिशा में कटाहद्वीप, कर्पूर द्वीप और स्वर्णद्वीप तक पहुँचकर लौटते हुए नारिकेलद्वीप में आया और फिर सिंहलद्वीप में उतरा। इनमें से नारिकेलद्वीप वर्तमान निकोवार का पुराना नाम था जिसे राजेन्द्र चोल के लेखों में नक्क्वरं कहा गया है। सुवर्णद्वीप सुमात्रा की संज्ञा थी जहाँ आठवीं शती में शैलेन्द्रवंशी राजाओं ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो लगभग तीन शती तक विजयशाली रहा। सोमदेव के कानों में अवश्य ही शैलेन्द्रों के यश की भनक पड़ी होगी क्योंकि दो कहानियों में उन्होंने स्वर्णद्वीप का उल्लेख किया है (तरंग ५४ श्लोक १ तरंग ५६ श्लोक ६२)। एक कहानी में चन्द्रस्वामी नाम का सार्थवाह अपने खोए हुए पुत्रों को ढूंढ़ने के लिये पहले नारिकेलद्वीप में जाता है (कथा ५६।५६) और फिर जहाज पर बैठकर समुद्रमार्ग से कटाहद्वीप पहुँचता है (५६।६०) और वहाँ से आगे बढ़कर कर्पूरद्वीप तक चला जाता है। कर्पूरद्वीप से स्वर्णद्वीप और स्वर्णद्वीप से सिंहलद्वीप लौटकर वहाँ से चित्रकूट या चित्तौड़ की यात्रा करता है (कथा ५६। ६१, ६२, ६३)। कटाहद्वीप मलय प्रायद्वीप का एक भाग था जिसे इस समय केडा कहते हैं और राजेन्द्र चोल के लेखों में उसे कडारं कहा गया है। कुमारदास के जानकीहरण-काव्य में भी कटाह द्वीप का उल्लेख आया है।२ कटाहद्वीप की यात्रा में नारिकेलद्वीप एक पड़ाव के समान था। उसके वर्णन में सोमदेव ने लिखा है—

अस्ति मध्ये महम्भोधेः श्रीमद्द्दीपवरं महत्। प्रभारिकेलदीपाख्यं स्यातं जगति सुन्दरम्॥ (५४।१४-१५)


१ भ्रात महासमुद्रो बह्वादीनवोऽल्पास्वाद बहवोऽवतरन्ति अल्पाव्युत्तिष्ठन्ति। भवन्तोऽस्ति कश्चित् युष्माभिर्दृष्टः श्रुतो वा यःषट्कृत्वो महासमुद्रान् ससिद्धयानपात्रश्च प्रत्यागतः॥ —(दिव्यावदान, पूर्णावदान पृ० २४-३५)। २ समुद्रमुत्सङ्घय पतत्तदीयरत्नोदकैरन्थिपातो गुफरन्ध्रिरिङः। नितान्ततप्तानिपपूर्वशष्पडैः प्रोत्सवेयामास नृपं कटाहैः॥ (१।१०)

Page 11Permalink

वराहद्वीप से आज जिस वायुद्वीप का वर्णन है वह इन्दोनेशिया का वाराह द्वीप होना चाहिए और संभव है वह वराह नामक असुर की जन्मभूमि आजकल का वराह माना जाता हो जिसे मध्ययुग में वारुश द्वीप कहते थे। कथासरित्सागर में दीपान्तर व मलयपुर का भी उल्लेख है, जहाँ के राजा की पुत्री मलयवती के साथ विक्रमादित्य ने विवाह किया था।१ गुणाढ्य से लेकर सोमदेव के समय तक भारतीय कहानियों के विस्तृत भौगोलिक क्षितिज का उल्लेख बहुत दिया गया है। उसमें समुद्रिक परिभ्रमण के लिए प्राकृतभाषा में हिण्डी इस छोटे सार्थक शब्द का निर्माण किया गया। उसी के अनुसार संघदास ने गुणाढ्य-कृत बृहत्कथा की शैली को तो अपनाया किन्तु अपने ग्रन्थ का नाम बदलकर वसुदेव हिण्डी कर दिया। प्रद्युम्न ने कुछ दावानल में बूढ़े वसुदेव को जिस प्रकार छोड़ दिया था उससे वसुदेव के मन में आप-बीती सुनाने के लिए एक फरहरी-सी उत्पन्न हो गई और २९ लम्भकों के रूप में उन्होंने अपने २९ विवाहों की कहानियाँ सुना डालीं। इन्हीं से वसुदेव हिण्डी ग्रन्थ का 'शरीर' बना है। ग्रन्थ के अन्त में उपसंहार नाम का अन्तिम भाग भी था जो इस समय प्राप्त नहीं है। बृहत्कथा के प्राचीनतम रूपान्तर वसुदेव हिण्डी के विषय में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् आल्म- डोर्फ ने बहुत अनुसन्धान के बाद जो इस प्रकार लिखा है वह ध्यान देने योग्य है— गुणाढ्य की बृहत्कथा निस्सन्देह प्राचीन भारतीय साहित्य का एक रसमय और महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इस लुप्त ग्रन्थ के ठीक प्रकार पुनर्गठन का कार्य अत्यन्त रोचक है। सोमदेव कृत कथासरित्सागर और क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी के रूप में काश्मीरी रूपकों की दो कृतियाँ जबतक विदित थीं तबतक बृहत्कथा के स्वरूप का अनुमान करना सरल था। किन्तु जब उससे आश्चर्यजनक रीति से भिन्न बृहत्कथा का नेपाली रूपान्तर बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के रूप में प्राप्त हुआ तब यह समस्या कुछ कठिन हो गई। फ्रेंच विद्वान् लाकोत ने 'गुणाढ्य एवं बृहत्कथा' नामक १९०८ में प्रकाशित अपनी पुस्तक में इस क्लिष्ट प्रश्न को विलक्षण निपुणता से सुलझाने का प्रयास किया और वे इस निर्णय पर पहुँचे—'आज तो काश्मीरी रूपान्तरों (कथासरित्सागर और बृहत्कथामंजरी) में गुणाढ्य की मूल बृहत्कथा अत्यन्त भ्रष्ट एवं अव्यवस्थित रूप में उपलब्ध है। इन ग्रन्थों में अनेक स्थलों पर मूल ग्रन्थ का संक्षिप्त सारोद्धार कर दिया गया है और इनमें मूल के कई अंश छोड़ भी दिए गए हैं एवं कितने ही नये अंश प्रक्षेप रूप में जोड़ दिये गये हैं। इस तरह मूल ग्रन्थ की वस्तु और आयोजना में बेडौल फेरफार हो गये। फलस्वरूप इन काश्मीरी कृतियों में कई प्रकार की असंगतियों का गर्व और छोड़े हुए अंशों के कारण मूलग्रन्थ का स्वरूप पर्याप्त भ्रष्ट हो गया। इस स्थिति में बुधस्वामी के ग्रन्थ से वस्तु की आयोजना द्वारा मूल प्राचीन बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्राप्त होता है। किन्तु खेद है कि यह चित्र पूरा नहीं है क्योंकि बुधस्वामी के ग्रन्थ का केवल चतुर्थांश ही उपलब्ध है। इसलिए केवल उसी अंश का काश्मीरी कृतियों के साथ तुलनात्मक मिलान शक्य है। १ दृष्टं मया तन्मलयपुरं नाम महापुरम्। श्रीमत्ताम्रपुरीयं वारिनिधेर्द्विपमध्यगम्॥ (१२।१।७९)

Page 12Permalink
  • ११ -

'लाकोत के उपर्युक्त मत के साथ श्रीविण्टरपित्स सहमत हैं (हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लिटरेचर, भाग १)। किन्तु आज तक मिले हुए रूपान्तरों के आधार से मूल ग्रन्थ की पुनः घटना करने के प्रयत्न को वे व्यर्थ मानते हैं। उनके मतानुसार लाकोत का मत संदिग्ध है और अपर्याप्त सामग्री की सहायता से प्रतिपादित किया गया है। विण्टरपित्स के इस कथन में इतना ही यथार्थ है कि जबतक और अधिक सामग्री न मिले तबतक लाकोत के निर्णयों में बहुत सुधार की गुंजाइश नहीं। जब १९०८ में लाकात ने अपना ग्रन्थ लिखा था उसके साथ बृहत्कथा की कठिन समस्या को सुलझाने के लिये कोई उपयोगी सामग्री न मिली थी। "अब जैनों के पास काश्मीरी और नैपाली इन दोनों रूपान्तरों से विस्तृत बृहत्कथा का एक रूपान्तर प्राप्त हुआ है, जो ध्यान खींचता है और आश्चर्यजनक है। नरवाहनदत्त के पराक्रम को जैनों ने कृष्ण के पिता वसुदेव पर आरोपित कर दिया है। वसुदेव हिण्डी (वसुदेव का परिभ्रमण) यह जैनों की पुरानी कथाओं में एवं विश्व के प्राचीन कथा-साहित्य में एक महत्त्व का ग्रन्थ है। वर्षों पहले प्रकाशित हेमचन्द्र के त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित्र में श्रीनेमिनाथ चरित्र के अन्तर्गत वसुदेव का चरित्र भी आया है। उसमें जैन बृहत्कथा की रूपरेखा दिखाई पड़ती है। उसमें एवं श्रीकृष्ण की प्राचीन कथाओं से सम्बन्धित जैन ग्रन्थों में इसका संक्षिप्त सार प्राप्त होता है। किन्तु कुछ वर्ष हुए, भारतवर्ष में संघदासगणि कृत जो वसुदेव हिण्डी नामक ग्रन्थ ज्ञात हुआ है वह अपने विस्तार और विषय के कारण जैन बृहत्कथा में हुए परिवर्तनों को जान लेना सुगम करता है। आवश्यकचूर्णि में तीन बार वसुदेव हिण्डी का उल्लेख है जिससे ज्ञात होता है कि ६ ईसवी के आसपास इसकी रचना की अन्तिम मर्यादा थी। ग्रन्थ की अत्यन्त प्राचीन भाषा से भी उसका रचना-काल प्राचीन सूचित होता है। लगता है कि इस नए मिले हुए प्राकृत-ग्रन्थ में बृहत्कथा का प्राचीनतम रूपान्तर प्राप्त हो गया है। किन्तु इस ग्रन्थ में बृहत्कथा की वस्तु को श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा के आधार पर गूंथ दिया गया है जो हर्मनया श्रीयाकोबी के मतानुसार जैनों में ईसवी सन् से ३ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आ चुकी थी। श्रीयाकाबी मानते हैं कि ईस्वी-सन् के प्रारम्भ तक जैन पुराण-कथा सम्पूर्ण बन चुकी थी। जिस समय जैनों ने बृहत्कथा को अपनी पुराण-कथा के डम्बर में शामिल किया उस समय वह एक सुप्रसिद्ध कवि की कृति होने के अतिरिक्त दैव कथा की भव्यता से प्रकाशमान प्राचीनतर युग की रचना मानी जाने लगी थी जिसकी महत्ता पुराण एवं महाकाव्यों की कथाओं के समान हो गई थी। इसका अर्थ यह हुआ कि बृहत्कथा के जैन रूपान्तर से मूल बृहत्कथा का रचनाकाल कई शती प्राचीनतर मानना पड़ता है। श्रीबूलर ने गुणाढ्य का समय ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती में और लाकोत ने तीसरी शती में माना था। उसके बदले यदि बहुत प्राचीन समय में नहीं तो उसे ईस्वी-सन् की पहली या दूसरी शती पूर्व में मानना चाहिए। 'लाकोत के मत के अनुसार नष्ट हुई बृहत्कथा की आयोजना इस प्रकार थी—प्रस्तावित भाग में उदयन और उसकी रानी वासवदत्ता एवं पद्मावती की सुविदित कथा थी। वासवदत्ता का पुत्र नरवाहनदत्त जब युवा राजकुमार की अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसका गन्धर्वपुत्री

Page 13Permalink
  • १४ -

मदनमंचुका से प्रेम हो गया। उसने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध उससे विवाह कर लिया। एक विद्याधर राजा मदनमंचुका को हर ले गया। मदनमंचुका की खोज करते हुए नरवाहनदत्त ने विद्याधर-लोक और मनुष्य-लोक में नये-नये पराक्रम किए। शीर्ष पराक्रम के बाद मदनमंचुका से उसका मिलन हुआ वह स्वयं विद्याधर चक्रवर्ती बना और मदनमंचुका उसकी पटरानी हुई। इससे पूर्व उसके पराक्रमों की सूची में वह हर बार एक स्त्री से विवाह करता है। इस प्रकार के प्रत्येक पराक्रम के अन्त में गुणाढ्य ने उसका लम्भ यह नाम रखा। इस रीति से नरवाहनदत्त की कथा वेगवती लम्भ अजिनावती लम्भ प्रियदर्शना लम्भ इत्यादि प्रकरणों में विभक्त थी। जैन परम्परा के अनुसार (वसुदेव हिण्डी में) श्रीकृष्ण की प्राचीन कथा की योजना इस प्रकार हुई—वसुदेव अपने बड़े भाई के साथ अनबन होने के कारण घर छोड़कर चले गए और पीछे लम्बे परिभ्रमण के दरम्यान नरवाहनदत्त की तरह पराक्रम करते रहे और अन्त में अपनी अन्तिम पत्नी के रूप में उन्होंने रोहिणी को प्राप्त किया। इस समय अकस्मात् वसुदेव का अपने बड़े भाई के साथ मेल हो गया और वे अपने कुटुम्ब के साथ मिलकर रहने लगे। मदनमंचुका से मिलने और राज्याभिषेक के प्रसंग इस कथा में छोड़ दिए गए हैं क्योंकि कृष्ण की कथा के प्रसंग में उनकी संगति न थी। पर मदनमंचुका के साथ प्रणय प्रसंग का जो विस्तृत वर्णन अन्तिम विवाह में आता था उसे श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब के साथ जोड़ दिया गया यह कुछ समझ में नहीं आता। मदनमंचुका के अपहरण का प्रसंग भी वसुदेव के पराक्रमों के वर्णन में छोड़ दिया गया है। कथा के मूलभूत पात्र मदनमंचुका के स्थान में यहां दो पात्र हो गए हैं गणिकापुत्री सुहिरण्या और राजकन्या सोमश्री। "इस तरह मूल बृहत्कथा की वस्तु और उसकी आयोजना की कई एक अनावश्यक घटनाएं इसमें होने से नष्ट हुए मूल ग्रन्थ के स्वरूप के विषय में जैन रूपान्तर की प्राप्ति से कई महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं। "इससे आगे उल्लेखनीय बात यह है कि काश्मीरी रूपान्तर (कथासरित्सागर) में १८ लम्बकों में कथा विभक्त है। यहाँ भ्रष्ट रूप में प्राप्त लम्बक शब्द की बात हम नहीं कहते। 'म' के बदले 'ब' यह शब्द प्राकृत के अनुसार स्वाभाविक रीति से मूल ग्रन्थ का नहीं है। लम्बक (लम्भक) का अर्थ वह प्रकरण हो सकता है जिसमें नरवाहनदत्त एक पत्नी प्राप्त करता है। पर उदयन की कथा में और ग्रन्थ के आरम्भिक भाग में भी यह शब्द आता है। तो मानना पड़ेगा कि गुणाढ्य के कथा लिखने तक उसके अर्थ का विस्तार नहीं हुआ था। बुधस्वामी का बृहत्कथा- श्लोकसंग्रह काव्यों के समान सर्गों में विभक्त है और उसके उपलब्ध अंश में २८ सर्ग हैं। सब नहीं तो अनेक सर्गों के अन्त में लम्भ शब्द के बदले उसका पर्याय 'लाभ' शब्द मिलता है और जानबूझ कर नियम के रूप में एक लाभ में कई संख्याबद्ध सर्गों का समावेश कर दिया जाता है। लाकोत मानते हैं कि गुणाढ्य की कृति रामायण की तरह अलग-अलग काण्डों में विभक्त थी एवं मुख्य कथा-भाग लम्भों के सहित काण्डों में रचा गया था। जैन रूपान्तर में लम्भ का प्रयोग अपने मूल अर्थ में अर्थात् नरवाहनदत्त की (यहाँ वसुदेव की) विजय के वर्णनात्मक मुख्य कथा भाग के प्रकरणों

Page 14Permalink

– १५ –

के नामकरण के लिये हुआ है। इस मुख्य कथा-भाग को 'शरीर' कहा गया है और ग्रन्थ के ७ अधिकारों में यह पांचवाँ है। कथा की उत्पत्ति पीठिका मुख और प्रतिमुख ये चार अधिकार उससे पहिले आते हैं। 'शरीर' के पीछे उपसंहार होना चाहिए था पर ग्रन्थ का अन्तिम भाग त्रुटित होने से वह नहीं मिलता। मुख्य कथा भाग-रूप 'शरीर' की अपेक्षा से लम्भों का समूह ग्रंथ बडा गौण था। मूल प्राचीन बृहत्कथा में आमूलचूल विभागीकरण नहीं था। प्रस्तावित कथा प्रकरण के बाद दूसरे नामकरण के साथ संख्या बध्य लम्भ थे और उसके बाद उपसंहार था। संस्कृत रूपान्तरों में केवल बृहत्कथामंजरी में उपसंहार का निवेश है, पर लाकोत उपसंहार को मूलकथा का गौण अंग गिनते हैं। वसुदेव हिण्डी से सिद्ध होता है कि मूल बृहत्कथा में उपसंहार था। सोमदेव ने अपने कथासरित्सागर में उपसंहार निकाल दिया है पर उसके अतिरिक्त क्षेमेन्द्र में प्राप्त कुछ प्रकीर्ण बातों बत के बाद सोमदेव ने नरवाहनदत्त के तमाम लम्भकों की एक सूची अपने ग्रन्थ के आरम्भ में दी है। उससे ज्ञात होता है कि बृहत्कथामंजरी के आरम्भ में भी मूलग्रन्थ की विषय-सूची थी जो अब नष्ट हो गई है। अपने ग्रन्थ में कथा-उत्पत्ति यह शुद्ध जैन कथामात्र है पर पीठिका और मुख की बाबत ऐसा नहीं। बुधस्वामी की कृति में 'कथामुख' यह तीसरे सर्ग का नाम है पर पहले बेनाम के दो सर्ग भी कथामुख के ही प्रारम्भिक भाग हैं। अर्थ-संपत्ति की दृष्टि से कथामुख में जो होना चाहिए वह उसमें है, अर्थात् कथा कहनेवाले का परिचय। कथा कहने का प्रसंग किस रीति से उपस्थित हुआ यह उसमें बताया गया है। नरवाहनदत्त अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त उत्तमपुरुष में कहते हैं। काश्मीरी लेखकों ने दूसरे लम्बक का नाम कथामुख लम्बक रखा है। इसमें उदयन की कथा आती है। बुधस्वामी ने कथामुख में जो भाग आता है वह (कथामृत के लेखकों ने) उस ग्रन्थ के अन्त में रखा है और नरवाहनदत्त आत्म-वृत्तान्त कहते हैं ऐसा भी स्पष्ट उल्लेख स्वयं नहीं किया। इतना ही नहीं कथा का बयान प्रथमपुरुष में तटस्थ रीति से किया है। नेपाली रूपान्तर की सच्चाई और काश्मीरी रूपान्तर की भ्रष्टता सिद्ध करने में लाकोत का यही मुख्य प्रमाण है। इस अनुमान को जैन रूपान्तर से भी समर्थन मिलता है। इसमें भी वसुदेव अपना सब वृत्तान्त भागवत कथा के रूप में उत्तमपुरुष में ही कहते हैं। 'कथामुख' अथवा उसके तैयार किए हुए प्रति- मुख द्वारा बताया गया है कि भागवतकथा किस प्रकार कही गई। काश्मीरी लेखक सोमदेव और क्षेमेन्द्र ने कथारीठ का पहला लम्बक कहा है। गुणाढ्य कवि-संबंधी कथानक उसका विषय है। उसके देखने से ज्ञान होता है कि गुणाढ्य कवि-संबंधी कथानक का मूल कथा में होना संभव न था। बुधस्वामी के रूपान्तर में कथारीठ शायद देखने में नहीं आता। किन्तु जैसा ऊपर कहा है बुधस्वामी का प्रारम्भिक भाग ही कथामुख है। इस आधार में लाकोत निश्चित रूप से मानते हैं कि गुणाढ्य के मूल ग्रंथ में ही कथारीठ अंश नहीं था पर वसुदेव हिण्डी में पीठिका (पेडिया) भाग के होने से मानना पडता है कि बृहत्कथा में भी कथारीठ नामक भाग था। इस कथारीठ का विषय क्या था यह एक प्रश्न है। गुणाढ्य-संबंधी कथानक तो इसमें न रहा होगा और वसुदेव हिण्डी की पीठिका में कृष्ण-संबंधी कथा का जो भाग है वह

Page 15Permalink

– १९ –

भी उसमें न होगा। नैपाली रूपान्तर में तो कथापीठ है ही नहीं पर काश्मीरी रूपान्तरों में पीठ अर्थात् कथापीठ है। इससे यह सम्भावित है कि नैपाली रूपान्तर, अर्थात् बुधस्वामी-कृत बृहत्कथाश्लोकसंग्रह में मूल कथापीठ के कुछ अंश मिल-जुल गए हैं। काश्मीरी रूपान्तरों में उदयन वासवदत्ता और पद्मावती की सम्पूर्ण कथाएँ हैं, पर बुधस्वामी में वे नहीं हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि बुधस्वामी के ग्रन्थ का आरम्भिक भाग शायद खण्डित है। दूसरी ओर मूल प्राचीन बृहत्कथा के एक भाग के रूप में उदयन की कथा के होने के विषय में कुछ विद्वानों ने शंका उठाई है (दे विन्तरनित्स भारतीय साहित्य का इतिहास भाग ३)। इस प्रकार की मिली हुई कथा घटनाओं का विवरण यहाँ संभव नहीं तो भी वसुदेव हिण्डी के आधार पर मैं निश्चयपूर्वक यह मानता हूँ कि प्राचीन बृहत्कथा में उदयन-संबंधी कथाएं कथामुख से पूर्व कथापीठ नामक भाग में सम्मिलित थीं। बुधस्वामी ने बिना कारण इन कथाओं का असमावेश किया है। मूल प्राचीन बृहत्कथा की वस्तु आयोजना के परिणामस्वरूप उत्पन्न कुछ कालानुक्रमविषयक कठिनाइयों से बचने के लिए काश्मीरी लेखकों ने कथापीठ में समाविष्ट वर्ण्य विषय का अलग रीति से प्रयोग किया। मूल प्राचीन बृहत्कथा में वस्तु की आयोजना इस प्रकार होनी चाहिए थी— (१) कथापीठ—उदयन और उसकी रानियों की कथाएँ (२) कथामुख—कथा कहने वाले के रूप में नरवाहनदत्त का परिचय (३) नरवाहनदत्त द्वारा घटित जन्मों की शृंखला और (४) उपसंहार। "बुधस्वामी के बृहत्कथाश्लोकसंग्रह द्वारा बृहत्कथा का जो नैपाली रूपान्तर प्राप्त हुआ है उसके अनेक कथा-प्रसंगों का वसुदेव हिण्डी के साथ साम्य है। काश्मीरी रूपान्तरों के मुकाबले नैपाली रूपान्तर, मूल बृहत्कथा का सच्चा चित्र प्रस्तुत करता है। लाकोते का यह मत पूरी तरह मान्य है। उदाहरण के लिए वसुदेव हिण्डी की गणिकापुत्री सुहिरण्या की तरह ही बृहत्कथा- श्लोक-संग्रह की मदनमंजुका भी एक वारांगना की पुत्री है, पर काश्मीरी रूपान्तरों में मदनमंचुका एक बौद्ध राजा की दौहित्री है। वसुदेव की पत्नी गंधर्वदत्ता एक वणिक की दत्तक पुत्री है। बुध स्वामी में भी यह प्रसंग इसी प्रकार है, पर काश्मीरी रूपान्तर में गान्धार देश का राजा दोनों का स्वामी है। गन्धर्वदत्ता के पालन करनेवाले पिता की आत्मकथा समुद्री यात्रा में पराक्रम करने की अत्यन्त रम्यपूर्ण कथा है, एवं इसका यह अंश अलिफ़ लैला की कहानियों जैसा है। यह पूरी कथा काश्मीरी रूपान्तरों में छोड़ दी गई है। वसुदेव हिण्डी का कथानक इस अंश में बुध स्वामी से मिलता है। उसमें भी इसम कुछ अंश अधिक रसपूर्ण हैं। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के पाँच बड़े और आवश्यक अंश काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हैं। वे वसुदेव हिण्डी में देखने को मिलते हैं। दूसरी बात यह थी, स्मारक, इसके पोषक हैं कि काश्मीरी रूपान्तर के जिन अंशों को स्पीयर ने मूल प्राचीन बृहत्कथा का साझा यथार्थ और प्रक्षिप्त माना था और ऐसे अंश काश्मीरी रूपान्तरों में रहे जिन?—उनका मात्र विसतेवाद का अंश वसुदेव हिण्डी में भी नहीं है, अर्थात् अबतक जो बिल्कुल सम्भावित मान परत थे, पर बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के अपूर्ण होने के कारण जो निज

Page 16Permalink
  • १७ -

नहीं किए जा सकते थे वे भी अब साबित हो गये हैं। एक तरफ प्राचीन मूल बृहत्कथा का एक बड़ा भाग काश्मीरी रूपान्तरों में लुप्त हो गया है दूसरी ओर काश्मीरी रूपान्तरों का एक बड़ा अंश मूल बृहत्कथा से उत्पन्न नहीं हुआ। अंत में यह भी साबित होता है कि काश्मीरी लेखकों के सामने बृहत्कथा का हाड़-पंजर मात्र था। किन्तु वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथाश्लोकसंग्रह इन दो रूपान्तरों के रचयिताओं के सामने मूल बृहत्कथा का एक अत्यन्त रस-पूर्ण जीवन्त और अतीत की सामग्री से भरा हुआ स्वरूप था। काश्मीरी रूपान्तरों की ऊपर कही हुई त्रुटियों के कारण अब इसकी छानबीन होना कठिन है कि बुधस्वामी में गुणाढ्य के मूल ग्रंथ की वस्तु-संरचना और उसकी प्राणवत्ता का किस हद तक उत्तराधिकार सुरक्षित है। किन्तु यहाँ बुधस्वामी के विषय म अपना विश्वास बहुत अंश में दृढ़ होता है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह एवं वसुदेव हिण्डी के बीच में संख्या-संबंधी भेदों के कारण यह कहना कठिन है कि इन दोनों ग्रंथों में कौन किसका आधार था। पर, जिन अंशों के संबंध में विचार हो सकता है उनसे ज्ञात होता है कि बृहत्कथाश्लोकसंग्रह और वसुदेव हिण्डी के बीच में छोटी-से-छोटी बातों में एवं वर्णन की सम्पूर्ण कला में इतना रोचक साम्य है कि यह मानने में संदेह नहीं रहता कि दोनों के लेखकों के सम्मुख कवि गुणाढ्य का मूल रूप कम- से-कम अन्तर के साथ विद्यमान था। अन्त के कथाभागों में तो वसुदेव हिण्डी प्राचीन बृहत्कथा का विशिष्ट रसप्रद और लाक्षणिक नमूना है। एवं सर्वांश में अवलोकन करने से भी यह जान पड़ता है कि मूल बृहत्कथा की लाक्षणिकता एवं गुणाढ्य की काव्य-शक्ति अपने अधिकांश जीवन्त रूप में वसुदेव हिण्डी में विद्यमान है। बृहत्कथाश्लोकसंग्रह के आधार पर विण्टरनित्स ने जो बुधस्वामी की भारी प्रशंसा की है उसका अधिकांश श्रेय गुणाढ्य को ही मिलना चाहिए। १

गुणाढ्य की बृहत्कथा किसी समय व्यास-कृत महाभारत के समान अपने देश के काव्य और कथा-साहित्य पर छाई हुई थी। आज वह काल के विशाल अंतराल में न जाने कहाँ विलीन हो गई है। इसलिए उसके विषय में उसके उत्तरकालीन रूपान्तर एवं वाचनाओं से ही अनुमान की कुछ कड़ियाँ जोड़नी पड़ती हैं। जिस महती कथा के विषय में कालिदास सुबन्धु बाण दण्डी धनिक गोवर्धन आदि आचार्यों ने इस प्रकार प्रशंसा के ग्रन्थ लिखे हैं सचमुच वह भारतीय वाङ्मय की कोई अमूल्य रचना थी। कोलार-क्षेत्र के गुम्मा रेड्डीपुर से प्राप्त एक ताम्रपत्र में जो राजा दुर्विनीत के चालीसवें वर्ष (छठी शती के पूर्वारम्भ) में दिया गया कहा है कि राजा दुर्विनीत ने एक व्याकरण किरातार्जुनीय के पंद्रह सर्गों की टीका और बृहत्कथा का संस्कृत में एक


१ दे श्री भोगीलाल जे सान्डेसरा-कृत वसुदेव हिण्डी का गुजराती भाषान्तर, पृष्ठ ११३। आल्टडोर्फ के Eine neve Version der Verlorenen Bṛhatkathā des Guṇāḍhya (A new version of the lost Bṛhatkathā of Guṇāḍhya) नामक जर्मन-निबन्ध का गुजराती अनुवाद श्री रसिकलाल पारिख ने किया था। प

Page 17Permalink
  • १८ - रूपान्तर किया था।१ न केवल भारतवर्ष वरन् बृहत्तर भारत के द्वीपान्तरों में भी गुणाढ्य का यश छा गया था। कम्बोज के महाराज यशोवर्मन् के लेखों में तीन बार गुणाढ्य का उल्लेख आया है जहाँ उसे प्राकृतप्रिय विशेषण दिया गया है। बारहवीं शती तक यह ग्रन्थ विद्यमान था और उसके बाद उसका कोई चिह्न शेष न रहा यह आश्चर्य की बात है। हो सकता है कि सोमदेव की अद्भुत सफलता ने गुणाढ्य को नामशेष करा दिया। धन्वन् के अनुसार गुणाढ्य का जन्म गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठान नगर में हुआ था। सोमदेव से भी इसका समर्थन होता है। यह शातवाहन वंश के सम्राट् हाल या शालिवाहन की राजधानी थी। विद्वाना के अनुसार शालिवाहन या सातवाहन प्रथम शती ईसवी में हुए। साकल का अनुमान है कि गुणाढ्य का जन्म मथुरा में हुआ था बाद में वे उज्जयिनी या कौशाम्बी में जाकर रहने लग गये । बुधस्वामिन् का बृहत्कथाश्लोकसंग्रह बृहत्कथा की नेपाली वाचना कहलाती है। इसमें अट्ठाईस सर्गों में लगभग ४५३९ श्लोक हैं। या तो मूल में ही यह ग्रंथ अधूरा रह गया या इस समय त्रुटित मिला है। इसमें नरवाहनदत्त अपने अट्ठाईस विवाहों में से केवल छः की कथा कह पाया है। यदि इसी दर पर सारी कथा कही जाती तो लगभग १९ हजार श्लोकों में पूरी कहानी का फैलाव होता और नरवाहनदत्त के राज्य-विस्तार और अभिषेक की कथा मिलाकर इसमें लग भग २५ सहस्र श्लोकों का विस्तार बैठता और सर्गों की संख्या भी १ म कम न होती। काव्य के आरम्भ में उज्जयिनी की प्रशंसा और वहाँ के शासक महासेन प्रद्योत की मृत्यु का उल्लेख है। उसके बाद उसका पुत्र गोपाल गद्दी पर बैठा किन्तु पितृहन्ता होने के अपयश से उसने राज्य छोड़ दिया और उसका भाई पालक राजा हुआ। उसने भी राज्य त्याग दिया और गोपाल का पुत्र अवन्तिवर्धन सिंहासन पर बैठा। उसके उपरान्त सुरतमंजरी के साथ उसके प्रेम की कथा आती है और चौथे सर्ग से नरवाहनदत्त की प्रेम-कहानियाँ ग्रंथ में स्थान घेरती हैं। बुधस्वामिन् भी कोई कम प्रतिभाशाली लेखक न था। उसने लगभग पाँचवीं शताब्दी में अपने ग्रंथ की रचना की और गुप्त वंश की स्वर्ण-संस्कृति की अनेक संस्थाओं के वातावरण में प्रवाहमयी संस्कृत-शैली में ग्रंथ का निर्माण किया। बुधस्वामिन् के बाद संस्कृत-वाचना की प्राप्ति न होकर संघदासगणि-कृत वसुदेव हिण्डी की प्राकृत-वाचना ही अबतक प्राप्त हुई है जिसके संबंध में आवश्यक विवरण ऊपर दिया जा चुका है और जिसने बृहत्कथा के ढके हुए पदों का उद्घाटन करने में पर्याप्त योग दिया है। इसके अनन्तर क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी का स्थान आता है। क्षेमेन्द्र काश्मीर के राजा अनन्त (१०२९ १ ९०) की सभा के सभासद थे। उनका दूसरा नाम व्यासदास था। उन्होंने

१ शब्दानुशासनकारेण दैवभारतीनिबद्धकवेन किरातार्जुनीये पंचदशसर्गटीकाकारेण दुर्विनीतनामधेयेन, [मैसूर पुरातत्त्व-विभाग की वार्षिक रिपोर्ट १९१२ पृष्ठ ३५ ३९ Indian Antiquary ४२।२ ४ JRAS १९१३ १८९।]

में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं।

Page 18Permalink
  • १९ -

रामायण और महाभारत का संक्षेप भी रामायणमंजरी और भारतमंजरी नामक ग्रंथों में किया। उनका अवदानकल्पलता ग्रंथ भी प्रसिद्ध है। कला-विलास देशोपदेश नर्ममाला और समय मातृका ग्रंथों में क्षेमेन्द्र की प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्राप्त होता है। क्षेमेन्द्र-कृत बृहत्कथामंजरी में १८ लम्बक हैं और उनके नाम भी सोमदेव के लम्बकों से मिलते हैं। बृहत्कथा की अंतिम वाचना सोमदेव-कृत कथासरित्सागर है। सोमदेव ने अपनी प्रारंभिक प्रतिज्ञा में कहा है— 'मेरे सामने जैसा मूल था वैसा ही मैंने यह ग्रंथ रचा है। तनिक-सा फेर-फार भी नहीं किया। हाँ केवल औचित्य और एक दूसरे के साथ अन्वय या जोड़ मिलाने का ध्यान यथाशक्ति रक्खा गया है। इसमें काव्य का अंश मैंने इतना ही जोड़ा है जिससे कहानी के रस का विघात न हो। पांडित्य के यश के लोभ से मेरा यह प्रयत्न नहीं है। मेरा उद्देश्य यह है कि अनेक कथाओं का समूह सरलता से स्मृति में रक्खा जा सके।' कथा की उत्पत्ति के संबंध में सोमदेव ने लिखा है—'एक बार शिव ने पार्वती से सात विद्याधर चक्रवर्तियों की आश्चर्यमयी कथाओं का वर्णन किया। यद्यपि शिव की वार्ता एकान्त में हुई थी किन्तु उनके अनुचर पुष्पदन्त ने वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी जया को उन्हें सुना दिया। जया ने उन कहानियों को अपनी सहेलियों से कहा। जब यह बात पार्वतीजी के कान में पड़ी तो उन्होंने रुष्ट होकर पुष्पदन्त को मर्त्यलोक में जन्म लेने का शाप दिया। पुष्पदन्त के भाई माल्यवान् ने उसकी ओर से क्षमायाचना की तो उसे भी वैसा ही दंड मिला। पुष्पदन्त की पत्नी जया पार्वतीजी की परिचारिका थी। जब पार्वतीजी ने अपनी सखी को शोक से दुःखी देखा तो उन्हें करुणा आ गई और उन्होंने अपने शाप का परिहार करते हुए कहा कि पुष्पदन्त का विन्ध्य पर्वत में काणभूति नामक एक पिशाच से मिलना होगा। उसे अपने पूर्व जन्मों की स्मृति बनी रहेगी और जब वह काणभूति को ये कथाए सुनायेगा तब उसकी शाप-मुक्ति होगी। माल्यवान् भी जब काणभूति से इन बृहत्कथाओं को सुनकर लोक में इनका प्रचार कर चुकेगा तब वह पुनः स्वर्ग में लौट आएगा। इस विधान के अनुसार पुष्पदन्त ने कौशाम्बी में वररुचि-कात्यायन के रूप में जन्म लिया और वह महान् वैयाकरण एवं नन्द-वंश के अंतिम राजा योगानन्द का मंत्री हुआ। अंत में वह वनवासी हो गया और विन्ध्याचल की विन्ध्यवासिनी देवी की यात्रा में काणभूति से उसकी भेंट हुई। तब उसे अपने पूर्व जन्म की स्मृति हुई और उसने काणभूति को वे सात


१ यथामूलं तथैवैतन्न मनागप्यतिक्रमः। ग्रन्थविस्तरसंक्षेपमात्रं भाषा च भिद्यते॥ औचित्यान्वयरक्षा च यथाशक्ति विधीयते। कथारसाविघातेन काव्यांशस्य च योजना॥ वैदग्ध्यख्यातिलोभाय मम नैवायमुद्यमः। किन्तु नाना कथाजालस्मृतिसौकर्यसिद्धये॥ कथासरित्सागर १।१०-१२।

Page 19Permalink
  • २० -

बृहत्कथाएं सुनाई। इतना करने के बाद वह शापमुक्त होकर स्वर्ग चला गया। उसके भाई माल्य- वान् ने भी मृत्युलोक में प्रतिष्ठान पुरी में गुणाढ्य के रूप में जन्म लिया और वह वहाँ के राजा सातवाहन का मंत्री बना। गुणदेव और नन्दिदेव उसके दो शिष्य थे। उन्हें लेकर वह काणभूति के पास आया। वहाँ काणभूति से उसे पिशाच भाषा में सात बृहत्कथाएं प्राप्त हुईं और उसने प्रत्येक को एक-एक लाख श्लोकों में अपने रक्त से लिखा। अपने शिष्यों की सलाह से उसने उन्हें राज सातवाहन के पास इस विचार से भेजा कि राजा उनकी रक्षा करेगा। पर पिशाचों की भाषा में लिखी हुई कहानियों को राजा ने पसन्द नहीं किया। इस समाचार से गुणाढ्य को बहुत दुःख हुआ और उसने अपनी छः कहानियां जला डालीं। अपने शिष्यों का अनुरोध मानकर केवल सातवीं कहानी बची रहने दी। उस कथा को सुनकर जंगल के जीव भी मोहित हो गए। जब राजा सातवाहन को यह ज्ञात हुआ तब उसे पश्चात्ताप हुआ और उसने गुणाढ्य के स्थान पर जाकर बचे हुए कथाभाग को उससे ले लिया। उसने गुणदेव और नन्दिदेव की सहायता से उसका अध्ययन किया और कथा की उत्पत्ति का वर्णन करनेवाला अंश स्वयं उसमें जोड़ा।¹

नेपाल-माहात्म्य (अध्याय २७-२९) में इस कहानी का रूप थोड़ा भिन्न है। आरंभ में शिव-पार्वती के संवाद का उल्लेख है। पार्वती ने शिव से नई कहानी सुनाने की प्रार्थना की। शिव एकान्त में सब द्वार बन्द करके सुनाने लगे। पर उनके भुङ्गी नामक गण ने भौरे का रूप रखकर और भीतर जाकर वे कहानियां सुन लीं और अपनी पत्नी विजया को उन्हें सुना दिया। किसी दिन जब पार्वती ने कहानियां अपनी सखियों को सुनाने लगीं तो विजया को वे पहले से ज्ञात थीं। पार्वती ने यह जानना चाहा कि किसने यह अपराध किया था। शिव ने ध्यान धरकर देखा और भुङ्गी को शाप दिया। भुङ्गी ने क्षमा-याचना की। तब शिव ने क्षमा करते हुए कहा—इसे मर्त्यलोक में जन्म लेना होगा और सुनी हुई कथाओं को नौ लाख श्लोकों में लिखना होगा। फिर उसे एक लिंग की प्रतिष्ठा करनी होगी और तब वह कैलास को लौटने का अधिकारी होगा। इस उल्लेख से भी ज्ञात होता है कि बृहत्कथा मूल में एक शृंगार-कथा थी। पर नेपाल-माहात्म्य के इस उल्लेख में कथा का सुननेवाला भुङ्गी नामक गण था। भुङ्गी ने गुणाढ्य के रूप में मथुरा में जन्म लिया। वह बचपन में अनाथ हो गया और तब उज्जयिनी चला आया। उज्जयिनी में मदन नामक राजा राज्य करते थे उनकी रानी लीलावती गौड़देश के राजा की पुत्री थी। उज्जयिनी में सर्ववर्मन् नाम के महान् पण्डित राजसभा में थे। वे गुणाढ्य की प्रतिभा से प्रभावित हुए और उन्होंने उसे भी राजा की सभा का सदस्य बनवा दिया। एक दिन राजा अपनी रानियों के साथ जल-विहार कर रहा था। तब उसने 'मोदक' शब्द का अशुद्ध प्रयोग किया। गुणाढ्य ने १२ वर्ष में उसे व्याकरण की शिक्षा देने की बात कही। पर सर्ववर्मन ने केवल दो ही वर्षों में उसे व्याकरण में पण्डित बना देने को कहा। गुणाढ्य और सर्ववर्मन में इसके लिए स्पर्द्धा हुई, और सर्ववर्मन ने कलाप-व्याकरण की रचना करके दो ही वर्षों में राजा को व्याकरण का ज्ञान करा दिया। गुणाढ्य


१ कृष्णमाचार्य संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृष्ठ ४१४-४१५।

Page 20Permalink

– २१ –

को संस्कृत-भाषा में न बोलने का आदेश हुआ। वह एक ऋषि के आश्रम में जाकर रहने लगा। वहाँ उसे पुलस्त्य ऋषि ने पैशाची भाषा में अपनी कथाएँ लिख डालने का परामर्श दिया और यह भी कहा कि ग्रंथ-समाप्ति के बाद वह नेपाल में शिवलिंग की स्थापना करके शाप-विमुक्त होकर मर्त्य-योनि से छूटेगा। गुणाढ्य गेरू से पेड़ की पत्तियों पर कथा लिखने लगा। वह उन्हें उच्चस्वर में पढ़ता जाता था जिसे सुनकर जंगल के पशु-पक्षी मोहित हो गए। यह बात राजा ने सुनी और जंगल में जाकर सब कुछ अपनी आँखों से देखा। उसने गुणाढ्य से सभा में लौट जाने का अनुरोध किया पर गुणाढ्य ने उसे स्वीकार न किया और कहा—'मैंने सौ लाख श्लोकों में पैशाची भाषा में इस कथा की रचना की है। आप इसकी रचना संस्कृत में कराएँ। मैं तो अब नेपाल जाऊँगा। तब उसने नेपाल जाकर पशुपतिनाथ शिव के दर्शन किए। वहीं रहनेवाले मुनियों को एकत्र करके उसने भृङ्गीश्वर शिव की स्थापना की और वहाँ से वह कैलाश चला गया। कथासरित्सागर के आरंभ में सोमदेव ने उसके स्वरूप और वर्ण्य विषयों का अच्छा परिचय दिया है। मैं बृहत्कथा के सार का संग्रह कर रहा हूँ। इसमें पहला लम्बक कथापीठ है। उसके बाद दूसरा कथामुख है। तीसरे लम्बक का नाम लावानक है। चौथे लम्बक में नरवाहनदत्त का जन्म है। उसके बाद पाँचवें लम्बक का नाम चतुर्दारिका है। छठा लम्बक मदनमंचुका और सातवाँ रत्न प्रभा नाम का है। आठवें लम्बक का नाम सूर्यप्रभा है। नवाँ अलंकारवती लम्बक है। दसवाँ शक्तियशस् लम्बक और ग्यारहवाँ वेला लम्बक है। बारहवाँ शशांकवती और तेरहवाँ मदिरा वती लम्बक है। उसके बाद पंच नामक चौदहवाँ लम्बक और पन्द्रहवाँ महाभिषेक लम्बक है। उसके बाद १६वाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक और अट्ठारहवाँ विषमशील लम्बक है। कथाओं को कहने की दृष्टि से सोमदेव का अपना पद है। उसकी प्रवाहमयी शैली की रोचकता को दूसरा कोई नहीं पहुँच पाता। सी एच टॉनी (C. H. Tawney) कृत कथासरित्सागर के अंग्रेजी-अनुवाद की भूमिका में पेंजर ने सोमदेव के ग्रंथ की प्रशंसा में लिखा है— 'जब हम इस ग्रंथ को देखते हैं तब इसमें आई हुई हर प्रकार की कथाओं को देखकर मन आश्चर्य से भर जाता है। ईसवी-सन् से सैकड़ों वर्ष पहले की जीवजन्तु-कथाएं इसमें हैं। द्य लोक और पृथ्वी के निर्माण-संबंधी ऋग्वेदकालीन कथाएं भी यहाँ हैं। उसी प्रकार रक्तपान करने वाले बेतालों की कहानियां सुन्दर काव्यमयी प्रेम-कहानियां और देवता मनुष्य एवं असुरों के युद्ध की कहानियां भी इस संग्रह में हैं। यह न भूलना चाहिए कि भारतवर्ष कथा-साहित्य की सच्ची भूमि है जो इस विषय में ईरान और अरब से बढ़ चढ़कर है। भारत के इतिहास की कथा भी तो उसी प्रकार की एक कहानी है। इसका अतिशयोक्तिपूर्ण रूप इन आख्यानों से कम रोचक नहीं है। 'इन कहानियों का संग्रह करनेवाला लेखक सोमदेव विलक्षण प्रतिभाशाली पुरुष था।