कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- ११ -
शूर्पारक-निवासी पूर्ण नाम के सार्थवाह के कथन से यह बात सूचित होती है— भाइयो महासमुद्र की यात्रा में दुःख बहुत है, सुख थोड़ा है। बहुत-से जाते हैं, पर थोड़े ही लौट पाते हैं। क्या आपने ऐसे किसी का नाम सुना है, जो छ' बार महासमुद्र की यात्रा से सफलता के साथ अपने जहाजों को लेकर लौट आया हो ?' अवश्य ही सातवाहन-युग की सामुद्रिक यात्राओं के वातावरण में जिन कहानियों का ठाट रचा गया और बृहत्कथा के रूप में गुणाढ्य ने जिनका संग्रह किया, उनकी मूल भावना इसी प्रकार की जल-थल-सम्बन्धी हलचलों से पोषित थी। उसका भरपूर प्रभाव वसुदेव हिण्डी और बृहत्कथा की दूसरी उत्तरकालीन वाचनाओं पर पड़ा। सोमदेव के कथासरित्सागर में भी उत्तर-पश्चिम की ओर अपरगांधार की राजधानी पुष्यकलावती तक का उल्लेख है। जहां उत्तरापथगामी वणिग्पुत्र म्लेच्छभूयसी भूमि को पार करते हुए पहुँचते थे और उनकी इस यात्रा में महाप्रातिभ नामक शैव योगी भी उनके साथी के रूप में वितस्ता के उस पार के देशों में चक्कर लगाते थे। दूसरी ओर समुद्रशूर वणिक की कथा है जो पूर्व दिशा में कटाहद्वीप, कर्पूर द्वीप और स्वर्णद्वीप तक पहुँचकर लौटते हुए नारिकेलद्वीप में आया और फिर सिंहलद्वीप में उतरा। इनमें से नारिकेलद्वीप वर्तमान निकोवार का पुराना नाम था जिसे राजेन्द्र चोल के लेखों में नक्क्वरं कहा गया है। सुवर्णद्वीप सुमात्रा की संज्ञा थी जहाँ आठवीं शती में शैलेन्द्रवंशी राजाओं ने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो लगभग तीन शती तक विजयशाली रहा। सोमदेव के कानों में अवश्य ही शैलेन्द्रों के यश की भनक पड़ी होगी क्योंकि दो कहानियों में उन्होंने स्वर्णद्वीप का उल्लेख किया है (तरंग ५४ श्लोक १ तरंग ५६ श्लोक ६२)। एक कहानी में चन्द्रस्वामी नाम का सार्थवाह अपने खोए हुए पुत्रों को ढूंढ़ने के लिये पहले नारिकेलद्वीप में जाता है (कथा ५६।५६) और फिर जहाज पर बैठकर समुद्रमार्ग से कटाहद्वीप पहुँचता है (५६।६०) और वहाँ से आगे बढ़कर कर्पूरद्वीप तक चला जाता है। कर्पूरद्वीप से स्वर्णद्वीप और स्वर्णद्वीप से सिंहलद्वीप लौटकर वहाँ से चित्रकूट या चित्तौड़ की यात्रा करता है (कथा ५६। ६१, ६२, ६३)। कटाहद्वीप मलय प्रायद्वीप का एक भाग था जिसे इस समय केडा कहते हैं और राजेन्द्र चोल के लेखों में उसे कडारं कहा गया है। कुमारदास के जानकीहरण-काव्य में भी कटाह द्वीप का उल्लेख आया है।२ कटाहद्वीप की यात्रा में नारिकेलद्वीप एक पड़ाव के समान था। उसके वर्णन में सोमदेव ने लिखा है—
अस्ति मध्ये महम्भोधेः श्रीमद्द्दीपवरं महत्। प्रभारिकेलदीपाख्यं स्यातं जगति सुन्दरम्॥ (५४।१४-१५)
१ भ्रात महासमुद्रो बह्वादीनवोऽल्पास्वाद बहवोऽवतरन्ति अल्पाव्युत्तिष्ठन्ति। भवन्तोऽस्ति कश्चित् युष्माभिर्दृष्टः श्रुतो वा यःषट्कृत्वो महासमुद्रान् ससिद्धयानपात्रश्च प्रत्यागतः॥ —(दिव्यावदान, पूर्णावदान पृ० २४-३५)। २ समुद्रमुत्सङ्घय पतत्तदीयरत्नोदकैरन्थिपातो गुफरन्ध्रिरिङः। नितान्ततप्तानिपपूर्वशष्पडैः प्रोत्सवेयामास नृपं कटाहैः॥ (१।१०)