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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर वरं हि मृत्युर्नाकीर्तिस्त्वत्सखीहृदयं तव। गुरुर्भियादि बुध्येत तत्कदाचिच्छिवं भवेत् ॥१५॥ तदतत्कुरु भद्रे ! त्वं तां सखीं मां च जीवय। तच्छ्रुत्वा सा गता सख्या मातुः सर्वं न्यवेदयत् ॥१६॥ तया तत्कथितं भर्तुरुपवर्षस्य तत्क्षणम्। यज्ञे भ्रातुश्च वर्षस्य तेन तच्चाभिनन्दितम् ॥१७॥ विवाहं निश्चितं गत्वा व्याडिरानयति स्म ताम्। वर्षात्तानिनिवेशनं सोपाम्ब्या जननीं मम ॥१८॥ अथोपकोशा विधिवत्पित्रा मे प्रतिपादिता। तया मात्रा गृहिण्या च समं तत्रावसं सुखम् ॥१९॥ अथ कालेन वर्षस्य शिष्यवर्गो महानभूत्। तत्रैकः पाणिनिर्नाम' जडबुद्धितरोऽभवत् ॥२०॥ स शुश्रूषापरिक्लिष्टः प्रेषितो वर्षभार्यया। अगच्छत्तपसे खिन्नो विद्याकामो हिमालयम् ॥२१॥ तत्र तीव्रेण तपसा तोषितादिन्दुशेखरात्। सर्वविद्यामुखं तेन प्राप्तं व्याकरणं नवम् ॥२२॥ ततश्चागत्य मामत्र वादायाह्वयते स्म सः। प्रवृत्ते चावयोर्वादे प्रयाताः सप्त वासराः ॥२३॥ अष्टमेऽह्नि मया तस्मिञ्जिते तत्समनन्तरम्। नभस्थेन महाघोरो हुङ्कारः शम्भुना कृतः ॥२४॥ तेन प्रणष्टमस्मद् ... तस्मद्व्याकरणं भुवि। जिताः पाणिनिना सर्वे मूर्खीभूता वयं पुनः ॥२५॥ अथ सञ्जातनिर्वेदः स्वगृहस्थितये धनम्। हस्ते हिरण्यगुप्तस्य विधाय वणिजो निजम् ॥२६॥ उक्त्या सर्वोपरोगाय गन्तवानस्मि शङ्करम्। तपोभिराराधयितुं निराहारो हिमालयम् ॥२७॥ १ अत्रामान्त्रितमपडेवेकवर्षम् । २यदविवरणं परिशिष्टे विहारीकृतम् ।

प्रथम लम्बक १९

प्रथम लम्बक १९

"निन्दा होने की अपेक्षा मर जाना श्रेष्ठ है। इसलिए उपकोशा के माता पिता तुम्हारी सखी के मनोभाव को यदि समझ लें तो कल्याण हो सकता है॥१५॥ इसलिए तुम ऐसा करके अपनी सखी और मुझे दोनों को जिलाओ तुम्हारा कल्याण हो। यह सुनकर वह घर गई और उपकोशा की माता से सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥१६॥ उपकोशा की माता ने यह सब वृत्तान्त अपने पति उपवर्ष से कहा। उपवर्ष ने अपने बड़े भाई वर्ष से कहा और वर्ष ने उसका अनुमोदन किया ॥१७॥ इस प्रकार विवाह का निश्चय हो जाने पर आचार्य वर्ष की आज्ञा से व्याडि कौशाम्बी से मेरी माता को लिवा लाया॥१८॥ तदनन्तर उसके पिता उपवर्ष ने विवाह तिथि पर विधिपूर्वक उपकोशा मुझे प्रदान कर दी और मैं भी माता तथा पत्नी के साथ पाटलिपुत्र में सुखपूर्वक रहने लगा ॥१९॥ पाणिनि की कथा¹

कुछ समय के अनन्तर उपाध्याय वर्ष के शिष्यों की संख्या बढ़ी। उसमें पाणिनि नाम का एक शिष्य अत्यन्त जड़बुद्धि था॥२० ॥ उस गुरु-गृह में सेवा करते हुए अत्यन्त क्लेश-युक्त और खिन्न देखकर गुरु-पत्नी ने विद्या-प्राप्ति की कामना से तपस्या करने के लिए हिमालय जाने को कहा और वह चला गया ॥२१॥ तब वहाँ उसने अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए शिवजी से सब विद्याओं के मूलस्वरूप नवीन व्याकरण को प्राप्त किया ॥२२॥ हिमालय से लौटने पर पाणिनि ने मुझे शास्त्र-विचार के लिए ललकारा। फलतः हम लोगों का शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ और सात दिन व्यतीत हो गये ॥२३॥ आठवें दिन मेरे द्वारा शास्त्रार्थ में पाणिनि को जीत लेने पर आकाश में शिवजी ने भयंकर हुंकार किया ॥२४॥ उस हुंकार से हमारा पढ़ा हुआ ऐन्द्र व्याकरण पृथ्वी से नष्ट हो गया। तब पाणिनि ने हम लोगों को जीत लिया और हम सब फिर मूर्ख हो गये ॥२५॥ उस शास्त्र-विचार में पाणिनि से पराजित होने के कारण मुझे अत्यन्त वैराग्य उत्पन्न हुआ और घर का सर्वस्व वररुचि के पिता तुल्य मित्र व्याडि को देकर और यह बात उपकोशा को बता- कर तपस्या से शंकरजी को प्रसन्न करने के लिए मैं निराहार होकर हिमालय को चला गया॥२६-२७॥

१ इसमें वर्णित पाणिनि की कथा ऐतिहासिक अनुप और प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। पाणिनि और वररुचि के समय में पर्याप्त अन्तर है। परिशिष्ट-प्रकरण में 'पाणिनि' देखिए।

४ कथासरित्सागर

४ कथासरित्सागर उपकोशा हि म ध्य काङ्क्षन्ती निजमन्दिरे। अतिष्ठत्प्रत्यहं स्नान्ती गङ्गायां नियतव्रता ॥२८॥ एकदा सा मधौ प्राप्ते क्षामा पाण्डुमनोरमा। प्रतिपच्चन्द्रलेखेव जनलोचनहारिणी ॥२९॥ स्नातुं त्रिपथगां यान्ती दृष्टा राजपुरोधसा। दण्डाधिपतिना चाथ कुमारसचिवेन च ॥३०॥ तत्क्षणात्ते गता सर्वे स्मरसायकलक्ष्यताम्। सापि तस्मिन्दिने स्नान्ती क्षणमप्यकरोच्चिरम् ॥३१॥ आगच्छन्तीं च साय तां कुमारसचिवो हठात्। अग्रहीदथ साप्येनमवोचत्प्रतिभावती ॥३२॥ अभिप्रेतमिदं भद्र ! यथा तव तथा मम। किं त्वहं सत्कुलोत्पन्ना प्रवासस्थितभर्तृका ॥३३॥ कथमद्य प्रवर्त्तेय पश्येत्कोऽपि कदाचन। ततश्च ध्रुवमद्यस्त्वया सह भवन्मम ॥३४॥ तस्मान्भूत्सङ्कथास्मिंस्त्वौरलोके गृहं मम। आगन्तव्यं ध्रुवं रात्रे प्रथमे प्रहरे त्वया ॥३५॥ इत्युक्त्वा कृतसङ्घा सा तेन क्षिप्ता विशेषद्वात्। यावत्किञ्चिद् गता तावन्निरुद्धा सा पुरोधसा ॥३६॥ तस्यापि तथैव दिन तद्भवदेव यथा निशि। सङ्केतकं द्वितीयस्मिन् प्रहरे पर्यकल्प्यत ॥३७॥ मुक्तां कथञ्चित्तेनापि प्रयातां किञ्चिदन्तरम्। दण्डाधिपो रुरोध स्म तृतीयान्तां सुविह्वलाम् ॥३८॥ अथ तस्यापि दिवस तस्मिन्नेव तथैव सा। सङ्केतकं त्रियामायास्तृतीये प्रहरे व्यधात् ॥३९॥ दैवात्तनापि निर्मुक्ता सङ्कम्पा गृहमागता। कर्तव्यतां सा स्वघटीनां सविधे स्वैरमब्रवीत् ॥४०॥ वरं पत्यौ प्रवासस्थे मरणं कुलयोषितः। न तु श्वपारमत्लोकलोचनापातपात्रता ॥४१॥ इति सञ्चिन्तयन्ती च स्मरन्ती मां निनाय सा। शोषयन्ती स्वं वपुः साध्वी निराहारैव तां निशाम् ॥४२॥

प्रथम लम्बक ४१

प्रथम लम्बक ४१ उपकोशा की कथा¹ (चालू) मेरे तपस्या के लिए चले जाने पर मेरी कल्याण-कामना करती हुई उपकोशा भी नियमित व्रत रखकर प्रतिदिन गंगा-स्नान करती थी ॥२८॥ एक बार मेरे विरह में दुर्बल पीली अतएव मनोहर और प्रतिपदा के चन्द्र के समान जन- लोचनों के लिए आकर्षक उपकोशा वसन्त-समय में गंगा-स्नान के लिए जा रही थी। मार्ग में उस नयन-मधुर आकृति को राजपुरोहित मद्यरपास तथा युवराज क मंत्री ने देखा ॥२९ ३०॥ उसे देखकर वे तीनों काम-बाण से हृदय बन गये। उनकी अवस्था को समझकर उपकोशा ने भी स्नान करने में जान-बूझकर विलम्ब किया ॥३१॥ सायंकाल गंगा-स्नान से लौटकर आती हुई उपकोशा को कुमारसचिव ने बलपूर्वक रोका किन्तु प्रतिभावती उपकोशा ने उससे कहा ॥३२॥ भले आदमी ! यह ठीक है। जो तुम चाहते हो वही मैं भी चाहती हूँ। किन्तु मैं उच्च कुल में उत्पन्न हुई हूँ और प्रोषितभर्तृका हूँ ॥३३॥ अतः इस प्रकार का कार्य ही क्यों किया जाय। यदि कदाचित् कोई देख ले तो तुम्हारे साथ मेरा भी कल्याण नहीं होगा ॥३४॥ इसलिए वसन्तोत्सव की धूमधाम में नागरिकों के व्यस्त रहने पर तुम रात के पहले पहर मेरे घर पर आओ' ॥३५॥ ऐसा कहकर उससे प्रतिज्ञा करके उपकोशा उससे छूटकर जब कुछ आगे बढ़ी तब दैवयोग से उसे पुरोहित ने आ घेरा ॥३६॥ उपकोशा ने उससे भी उसी दिन उसी प्रकार रात के तीसरे पहर आने का निश्चय किया ॥३७॥ पुरोहित से किसी प्रकार छूटकर वह विह्वल उपकोशा एस ही कुछ दूर गई थी कि नगर पालक (शहर-कोतवाल) ने भी उसी प्रकार उसे रोका ॥३८॥ इसके बाद उपकोशा ने उस भी उसी प्रकार, उसी दिन उसी रात के दूसरे पहर में घर पर आने का संकेत किया ॥३९॥ विधिवशात् उससे भी छूटी हुई उपकोशा काँपती हुई अपने घर पहुँची और अपनी दासियों को बुलाकर स्वतन्त्रतापूर्वक कर्त्तव्य-निर्धारण करते हुए बोली ॥४०॥ पति के प्रवास में रहने पर कुलस्त्री का मर जाना अच्छा है, किन्तु रूप पर मरनेवालों की आँखों पर चढ़ना अच्छा नहीं ॥४१॥ इस प्रकार सोचती हुई तथा मुझे स्मरण करती हुई उस पतिव्रता उपकोशा ने निराहार रहकर उस रात्रि को व्यतीत किया ॥४२॥ १ इस कथा से मिलती-जुलती कहानी बर्टन के अरेबियन नाइट्स में एक मिस्री स्त्री और उसके चार यारों की कहानी में है। अँगरेजी के उपन्यासों में भी परियों की कहानी में ऐसा प्रसंग मिलता है। ६

४२ कथासरित्सागर

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Let's do a line-by-line transcription of the image exactly as it is printed, character by character.

४२ कथासरित्सागर प्रातर्ब्राह्मणपूजार्थं व्यसृजि वणिजस्तया। (Wait, व्यसृजि or भ्यसृजि? It looks like भ्यसृजि in the print, but let's look at the first letter: भ्यसृजि - yes, it has a loop like . Let's write भ्यसृजि as printed, or व्यसृजि? Let's write भ्यसृजि because it has a clear loop on the left, but wait, व्य in some old prints has a loop? No, व्य is usually व्य. Let's write भ्यसृजि as it looks, but wait, let's look at व्य in व्यसृजद् - standard is व्यसृजद्. Let's write भ्यसृजि since it's printed भ्यसृजि.) घटी हिरण्यगुप्तस्य किञ्चिन्मार्गयितुं धनम्॥४३॥ (Wait, the first letter is घटी or चटी? It looks like चटी but with a loop, wait, it's `घटी

प्रथम लम्बक ४३

प्रथम लम्बक ४३ सबेरे उठकर उसने ब्राह्मणों का भोजन कराने तथा उनकी पूजा करने के लिए कुछ धन लाने के लिए हिरण्यगुप्त बनिये के पास दासी को भेजा ॥४३॥ वह बनिया भी एकान्त में आकर उससे (उपकोशा से) बोला कि यदि तुम मेरी सेवा करो तो मैं तुम्हारे पति का रखा हुआ धन तुम्हें दे दूंगा' ॥४४॥ ऐसा सुनकर और पति के रखे हुए धन में किसी की पक्की साक्षी न होने के कारण उपकोशा दुख और क्रोध से अधीर हो गई और उसने बनिये को भी उसी दिन उसी रात के चतुर्थ प्रहर में आने का निमन्त्रण दिया जिसे सुनकर प्रसन्न बनिया चला गया ॥४५ ४६॥ तब उसने तेल मिलाकर कुँडों में रखा हुआ बहुत-सा अलकतरा सखियों (दासियों) से मँगाया और उसमें कस्तूरी आदि अनेक सुगन्धित द्रव्य मिलाये ॥४७॥ उस कोलतार से सने हुए उसने चार छोटे-छोटे कपड़े के टुकड़े (कमर में लपेटने के लिए) तैयार कराये और एक बड़ा भारी सम्पूरक बनवाया जिसमें बाहर से बन्द करने की अर्गला (कुण्डी) लगी हुई थी ॥४८॥ कुछ समय के अनन्तर उस वसन्तोत्सव के दिन रात के पहले प्रहर के समय कुमारसचिव सुन्दर वेष धारण किये हुए सजधज के साथ आया ॥४९॥ चुपचाप घर में आये हुए उस कुमारसचिव से उपकोशा ने कहा— 'बिना स्नान किये मैं तुम्हारा स्पर्श न करूँगी ? अतः पहले अन्दर जाकर स्नान करो ॥५०॥ उस मूर्ख ने स्नान करना स्वीकार किया तो उसे दासियों ने अन्धकारमय स्नानागार में प्रवेश करा दिया ॥५१॥ उसे अन्दर ले जाकर दासियों ने उसके पहने कपड़े उतार लिये और कमर में लपेटने के लिए (काजल से सना) कपड़े का एक टुकड़ा दे दिया ॥५२॥ घने अन्धकार में कुछ न देखते हुए उस पापी के मालिश करने के बहाने सिर से पैर तक के सभी अंगों को उन सखियों (दासियों) ने तेल मिले हुए उस अलकतरे से काला कर दिया ॥५३॥ दासियां जबतक उसके एक-एक अंग को काजल से मल रही थी तबतक दूसरे पहर में पुरोहित आ गया ॥५४॥ तब दासियों ने कहा अरे ! वररुचि का मित्र राजपुरोहित आ गया। अतः तुम ऐसे ही जाकर इस सम्पूरक में छिप जाओ। इस प्रकार उन्होंने घबराहट के साथ उस नग्न कुमारसचिव को, उस सम्पूरक में घुसाकर बाहर से अर्गला लगाकर बन्द कर दिया ॥५५-५६॥ दासियां पुरोहित को भी स्नान कराने के बहाने अँधेरे स्नानागार में ले गईं और उसके कपड़े उतार कर तेल मिले हुए काजल से उसकी भी मालिश करने लगीं। इस प्रकार, एक कपड़े का टुकड़ा लपेटा हुआ वह पुरोहित भी दासियों द्वारा मूर्ख बनाया गया। इतने में तीसरे पहर कोतवाल भी आ गया ॥५७-५८॥

४४ कथासरित्सागर

४४ कथासरित्सागर तदागमनजाच्छ्रव चेटीभि सहसा भयात् । आधवत्सोऽपि निक्षिप्तो मञ्जूषायां पुरोहितः ॥५९॥ तस्य दत्वागल तानि स्नानव्याजात्प्रविश्य सः । दण्डाधिपोऽपि तत्रैव तावत्कज्जलमर्दने ॥६०॥ अन्यवद् विप्रलब्धोऽभून्नग्नस्त्यक्तकर्पटः । यावत्स पश्चिमे यामे वणिक्त्रागतोऽभवत् ॥६१॥ तद्दशनभयं दत्वा क्षिप्तो दण्डाधिपोऽप्यथ । मञ्जूषायां स चेटीभिर्दत्त च वहिर्गलंम् ॥६२॥ ते च त्रयोऽन्धतामिस्रवासाभ्यासोद्यता इव। मञ्जूषायां मिथोऽन्योय स्पृश न्तोऽपि नालपन् ॥६३॥ दत्त्वाथ दीप गेहेऽत्र वणिज त प्रवेश्य सा। उपकोशावदद्देहि समे भर्त्रार्पित धनम् ॥६४॥ तच्छ्रुत्वा शून्यमालोक्य गृह सोऽप्यवदच्छठः । उक्तं मया वदाम्येव यद् भर्त्रा स्थापित धनम् ॥६५॥ उपकोशाऽपि मञ्जूषां धावयन्ती ततोऽब्रवीत् । एतद्धिरणयगुप्तस्य वच शृणुत दवताः ॥६६॥ इत्युक्त्वा चैव निर्वाप्य दीप सोऽप्य धवद् वणिक । लिप्त स्नानापन्देन चेटीभि कज्जलत्विषरम् ॥६७॥ अथ गच्छ गता रात्रिरित्युक्त स निशाक्षये । अनिच्छन्नास्तहस्तन ताभिनिर्वासितस्तत ॥६८॥ अथ धीरन्धवसतो मषीलिप्त पद पद । मध्यमाण श्वभि प्राप लज्जमानो निज गृहम् ॥६९॥ तत्र दासजनस्यापि क्षां प्रक्षालयता मषीम्। नापावरमसम्मुग्ये स्यातु दृष्टो दिनत्रयम् ॥७ ० ॥ उपकोशाप्यथ प्रातश्चटिकानुगता गता । गुरुणामनिवेद्यव राज्ञा मन्दस्य मन्दिरम् ॥७१॥ वणिग्घिरणयगुणो म भर्त्रा न्यासीकृत धनम्। जिहीर्षतीति विज्ञप्तस्तत्र राजा तया स्वयम् ॥७२॥ १ अवचग्ने इत्याशयः ।

प्रथम लम्बक ४५

प्रथम लम्बक ४५ उसके आते ही दासियों ने घबराकर उस पुरोहित को भी पहलेवाले सन्दूक में बन्द कर दिया ॥५९॥ पुरोहित के सन्दूक को अर्गला से बन्द कर देने के पश्चात् दासियों ने कोतवाल का भी स्नान के बहाने स्नानागार में ले जाकर उसी प्रकार काजल की मालिश की ॥६०॥ पहले दोनों के समान उन दासियों द्वारा यह कोतवाल भी एक कपड़े का टुकड़ा पहनाकर मूर्ख बनाया गया। इतने में रात्रि के अन्तिम पहर में वह हिरण्यगुप्त नामक बनिया आ पहुँचा ॥६१॥ कोतवाल को वह देख लेगा इस प्रकार का भय दिखाकर दासियों ने उसे भी उसी सन्दूक में बन्द करके बाहर से अर्गला चढ़ा दी ॥६२॥ उस एक ही सन्दूक में वे तीनों मानों अन्धतामिस्र नरक में वास करने का अभ्यास करते हुए-से परस्पर संस्पृष्ट होते हुए भी बोलते न थे ॥६३॥ उपकोशा ने दिया जलाकर और उस बनिये को स्नानागार में ले जाकर कहा—कि मेरे पति का दिया हुआ धन मुझे लौटा दो ॥६४॥ उपकोशा की बातें सुनकर और एकान्त घर को देखकर वह धूर्त बनिया बोला—'मैंने कह दिया कि तुम्हारे पति का रखा हुआ धन मैं अवश्य दे दूँगा' ॥६५॥ उपकोशा ने बन्द सन्दूक को सुनाते हुए कहा—हे देवताओ! हिरण्यगुप्त का वचन सुनो ॥६६॥ ऐसा कहकर उपकोशा ने दिया बुझा दिया और दासियों ने उस बनिये को भी अन्य तीनों के समान स्नान के बहाने से अपक्वतेल का लेप किया ॥६७॥ मर्दन में विस्रम्भ के कारण प्रातःकाल होते ही दासियों ने उससे कहा कि अब जाओ रात समाप्त हो गई। जब उसने जाने में आनाकानी की तो दासियों ने गलहस्त (गर्दभिया) देकर उसे घर से बाहर निकाल दिया ॥६८॥ एक फग चिथड़ा लपेटे हुए घर से निकाले जाने पर काजल से पुता हुआ अतएव कुत्तों से काटा जाता हुआ बनिया अत्यन्त लज्जा के साथ अपने घर पहुँचा ॥६९॥ घर जाकर जब उसके सेवक उसके शरीर की कालिमा छुड़ाने लगे तब तो वह उनके सामने भी मुँह न कर सका। सच है बुरी बातों का परिणाम बुरा ही होता है ॥७०॥ इसके उपरान्त प्रातःकाल दासी को साथ लेकर उपकोशा भी अपने माता-पिता की आज्ञा के बिना ही राजा नन्द के भवन को चली गई ॥७१॥ राजभवन में जाकर उसने राजा से स्वयं निवेदन किया कि हिरण्यगुप्त नामक बनिया मेरे पति द्वारा उसके पास रखे हुए धन को हड़प लेना चाहता है ॥७२॥

४६ कथासरित्सागर

४६ कथासरित्सागर तेन तच्च परिक्षातुं तत्रैवानायितो वणिक् । मदस्त किञ्चिदप्यस्या देयं नास्तीत्यभाषत ॥७३॥ उपकोशा ततोऽवादीत्सन्ति मे देव ! साक्षिणः । मञ्जूषायां गताः क्षिप्त्वा भर्त्ता मे गृहदेवताः ॥७४॥ स्ववाचा पुरतस्तासामनेनाङ्गीकृतं धनम् । तामानाय्यह मञ्जूषां पृच्छ्यन्तां देवतास्त्वया ॥७५॥ तच्छ्रुत्वा विस्मयाद्राजा तदानयनमादिशत् । ततः क्षणरसा मञ्जूषा प्रापिता बहुभिर्जनैः ॥७६॥ अत्रोपकोशा वक्ति स्म सत्यं वदत देवताः ! यद्युक्तं वणिजानेन ततो यात निजं गृहम् ॥७७॥ नो चेद्दहाम्यहं युष्मान्सदस्युद्घाटयामि वा । तच्छ्रुत्वा भीतभीतास्ते मञ्जूषास्था बभाषिरे ॥७८॥ सत्यं समक्ष मस्माकमनेनाङ्गीकृतं धनम् । ततो निरुत्तरः सर्वं वणिक्तत्प्रत्यपद्यत ॥७९॥ उपकोशामथाम्प्रच्छ्य राजा त्वतिकुतूहलात् । सदस्युद्घाटिता साभून्मञ्जूषा स्फोटितार्गला ॥८०॥ निष्कृष्टास्तत्प्रवि पुरुषास्तमःपिण्डा इव त्रयः । दृष्ट्वाञ्च प्रत्यभिज्ञाता मन्त्रिभिर्भ्रमुता तथा ॥८१॥ प्रहसत्स्वथ सर्वेषु किमेतदिति कौतुकात् । राज्ञा पृष्टा सती सर्वमुपकोशा शशंस तत् ॥८२॥ अचिन्त्यं धीसगुप्तानां चरितं कुलयोषिताम् । इति चाभिननन्दुस्तामुपकोशां सभासदः ॥८३॥ सवस्त्रं हृतसर्वस्वा परदारपिणोऽर्मिलाः । राज्ञा निर्वासिता बणादणील यस्य भूशय ॥८४॥ भगिनी मे त्वमित्युक्त्वा दत्वा प्रीत्या धनं बहु । उपकोशाऽपि भूपेन प्रेषिता गृहमगमत् ॥८५॥ वर्षोपवर्षौ तद्बुद्ध्वा साध्वीं तामभ्यनन्दताम् । सशब्दं विस्मयस्मेरं पुरं तत्राभवज्जनः ॥८६॥ अत्रान्तरे तुगायान्ते गत्वा तीव्रतरं तपः । आराधितो मया दत्तो वरदः पार्वतीपतिः ॥८७॥

राजा ने इस बात को जानने के लिए, बनिये को वहीं बुलवाया तो बनिये ने राजा से कहा—'महाराज ! मेरे पास इसका कुछ भी नहीं है' ॥७३॥ तब उपकोशा ने कहा—'महाराज ! इसके साक्षी मेरे गृह के देवता हैं, जिन्हें मेरे पति सन्दूक में बन्द कर गये हैं ॥७४॥ इस बनिये ने उन देवताओं के आगे अपने मुंह से धन स्वीकार किया है। आप उस सन्दूक को मंगाकर उन देवताओं से पूछिए' ॥७५॥ ऐसा सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ और उसने सन्दूक लाने की आज्ञा दी और कुछ ही समय में बहुत व्यक्ति मिलकर उस सन्दूक को राजा के सामने ले आये ॥७६॥ सन्दूक आ जाने पर उपकोशा ने कहा—हे देवताओ ! सच बोलो। जो इस बनिये ने कहा है—बताओ और फिर घर को जाओ ॥७७॥ 'यदि तुम न बोलोगे तो तुम्हें सन्दूक के साथ ही जला दूँगी या राजसभा में सन्दूक खोल- कर तुम्हारा प्रदर्शन करूंगी। यह सुनकर सन्दूक के अन्दर से वे लोग भयभीत होकर बोले ॥७८॥ 'सच है, इसने हम लोगों के सामने धन स्वीकार किया है। तब बनिये ने निरुत्तर होकर उसका धन स्वीकार किया ॥७९॥ इसके अनन्तर अत्यन्त कुतूहलवश राजा के साग्रह प्रार्थना करने पर उपकोशा ने अर्गला तोड़कर उस सभा में सन्दूक खोल दिया ॥८०॥ सन्दूक खोलने पर अन्धकार के पिण्ड के समान वे तीनों पुरुष उसमें से निकले तो बड़ी कठिनता के साथ उन्हें राजा और मन्त्रियों ने पहचाना ॥८१॥ उन्हें देख सभी सभासदों के हँसने पर राजा ने आश्चर्य के साथ उपकोशा से पूछा कि 'यह क्या है ? तब उपकोशा ने सारा वृत्तान्त सभा में सुना दिया ॥८२॥ 'चरित्र की रक्षा करनेवाली कुलीन स्त्रियों के चरित्र अचिन्तनीय होते हैं। इस प्रकार सभी सभासद, उपकोशा के चरित्र की प्रशंसा करने लगे ॥८३॥ राजा ने समस्त वृत्तान्त सुनकर परदाराभिलाषी उन तीनों की सम्पत्ति का हरण करके उन्हें देश से निकाल दिया। सच है दुश्चरित्र किसके लिए कल्याणकारक होता है ॥८४॥ 'तू मेरी बहिन है—ऐसा कहकर तथा प्रसन्नता के साथ बहुत-सा धन देकर राजा ने उपकोशा को वापस भेज दिया। वह अपने घर आ गई ॥८५॥ वर्ष और उपवर्ष भी इस समाचार को जानकर उस पतिव्रता स्त्री का अभिनन्दन करने लगे और सभी नगर-निवासी इस समाचार से आश्चर्यचकित हो मुस्कराने लगे ॥८६॥ इसी बीच मैंने हिमालय में कठोर तपस्या करके वरदानी महादेव की आराधना की ॥८७॥

५० कथासरित्सागर

५० कथासरित्सागर प्रविश्य स्वस्तिकारं च विधाय गुरुदक्षिणाम्। योगनन्दा मया तत्र हेमकोटि स याचितः ॥१०३॥ ततः स शकटालस्य सत्यनन्दस्य मन्त्रिणम् । सुवर्णकोटिमतरं दापयेति समादिशत् ॥१०४॥ मृतस्य जीवितं दृष्ट्वा सद्यश्च प्राप्तिमर्थिनः । स तत्त्वं ज्ञातवान्मन्त्री किमज्ञेयं हि धीमताम् ॥१०५॥ देव ! दीयत इत्युक्त्वा स च मन्त्रीत्यचिन्तयत् । नन्दस्य तनयो बालो राज्यं च बहुशत्रुमत् ॥१ ०६॥ तत्सम्प्रत्येव रक्षामि तस्य देहमपीदृशम् । निश्चित्यैतत्स वत्कारं शवात्सर्वानदाहयत् ॥१०७॥ चारैरन्विष्य तन्मध्यं लब्ध्वा देवगृहातत । व्याडिं विधूय तद्गेहमिन्द्रदत्तकलेवरम् ॥१०८॥ अत्रान्तरे च राजानं हेमकोटिसमर्पणे । त्वरमाणमथाह स्म शकटालो विचारयन् ॥१०९॥ उत्सवाक्षिप्तचित्तोऽयं सर्वः परिजनः स्थितः । क्षणं प्रतीक्षतामयं विप्रो यावद्ददाम्यहम् ॥११०॥ अथैत्य योगनन्दस्य व्याडिनाक्रन्दितं पुरः । अहहाऽस्मत्सुहृत्क्रान्तजीवो योगस्थितो द्विजः ॥१११॥ प्रताम्यताव द्वयं दग्धाद्गहस्ततोदय । तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्य तापश्चिन्ताभवन्महान् ॥११२॥ वह दाहात्स्थिरे तस्मिञ्जात निर्गत्य मे दृढौ । सुवर्णकोटिं स ततः शकटाले महामतिः ॥११३॥ योगनन्दोऽथ विजनं सङ्केतो व्याडिमब्रवीत् । मूढीभूतोऽस्मि विप्रोऽपि कि धिया स्थिरयापि मे ॥११४॥ तच्छ्रुत्वादत्ततस्य तं व्याडि कालोचितमभाषत । ज्ञातोऽसि शकटालेन तदेनं चिन्तयाधुना ॥११५॥ महामन्त्री ह्ययं स्वञ्चन्मन्त्रियत्तो विनाश्यत् । पूर्वानन्दसुतं कुर्याच्चन्द्रगुप्तं हि भूमिपम् ॥११६॥ तस्माद् वररुचिं मन्त्रिसुमुख्यत्वं कुरु यत्नतः । एतद्बुद्ध्या मवद्राज्यं स्थिरं दिष्यानुभावया ॥११७॥

प्रथम लम्बक ५१

प्रथम लम्बक ५१ राजभवन में जाकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा की याचना की ॥१ ३॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण-मुद्रा दिला दो' ॥१ ४॥ मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ॥१ ५॥ 'राजन् ! देता हूँ'—ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। (कहीं कार्य होने पर यह भाग न जाय) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मुर्दों को जलवा दिया ॥१ ६१ ७॥ राज्य के गुप्तचरों ने ढूँढ़-ढूँढ़कर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग में देवालय में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव का भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ॥१ ८॥ इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ॥१ ९॥ महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ॥११ ॥ इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उत्सवकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को—अनाथ शव कहकर—तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द¹ की कुछ अद्भुत एवं विचित्र-सी दशा हो गई ॥१११ १२॥ शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ प्रदान कीं ॥११३॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द एकान्त में खेद के साथ व्याडि से बोला—जब मैं ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया। इसलिए मुझे इस स्थिर राज्यलक्ष्मी से भी क्या लाभ ॥११४॥ यह सुनकर व्याडि ने राजा को कालोचित आश्वासन देते हुए कहा— तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले इसकी चिन्ता करो ॥११५॥ यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा त्याग करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ॥११६॥ इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ उसकी दिव्य और प्रतिभागामी बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ ११७॥


१ योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पड़ा था। असली नन्द का नाम हरनन्द या पूर्वनन्द था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।

४८ कथासरित्सागर

४८ कथासरित्सागर

तन्मेव तन्न शास्त्रं न पाणिनीयं प्रकाशितम्। तदिच्छानुग्रहादेव मया पूर्णकृतं च तत्॥८८॥ ततोऽहं गृहमगच्छमशाताध्वपरिश्रमः। निशाकरकलामौलिप्रसादामृतनिर्भरः ॥८९॥ अथ मातृगुरूणां च कृतपादामिवन्दनः। तत्रोपकोशावृत्तान्तं समग्रौषं महाद्भुतम् ॥९०॥ तेन मे परमां भूमिमात्मन्यानन्दविस्मयौ। तस्यां च सहजस्नेहबहुमानादगच्छताम् ॥९१॥ वर्षोऽप्य मन्मुखाच्छ्रुत्वैतत्तु व्याकरणं नवम्। ततं प्रकाशितं स्वामिकुमारेण तस्य तत्॥९२॥ ततो व्याडीन्द्रदत्ताभ्यां विज्ञप्तो दक्षिणां प्रति। गुर्वर्षोऽब्रवीत् स्वर्णकोटिं दीयतामिति ॥९३॥ अङ्गीकृत्य गुरोर्वाक्यं तौ च मामित्यवोचताम्। एहि राज्ञः सख ! नन्दाद्याचितुं गुरुदक्षिणाम् ॥९४॥ गच्छामो नान्यतोऽस्माभिरित्यात्कञ्चनमवाप्यते। नवाधिकानां नवतेः कोटीनामधिपो हि सः॥९५॥ वाचा तेनोपकोशा च प्राग्धर्मभगिनी कृता। अत' स्यात् स ते किञ्चित् त्वद्गुणेन समवाप्स्यते ॥९६॥ इति निश्चित्य नन्दस्य भूपतेः कटकं वयम्। मयोध्यास्थमगमच्छाम त्रयः सद्ब्रह्मचारिणः ॥९७॥ प्राप्तमात्रेषु चास्मासु स राजा पञ्चतां गतः। राष्ट्रे कोलाहलः जातो विषादेन सहैव नः ॥९८॥ अवोचदिन्द्रदत्तोऽथ तत्क्षणं योगसिद्धिमान्। गतासोरस्य भूपस्य शरीरं प्रविशाम्यहम् ॥९९॥ मर्थी वररुचिर्मेऽस्तु दास्याम्यस्मै च काञ्चनम्। व्याडी रक्षतु मे देहं ततः प्रत्यागमावधि ॥१००॥ इत्युक्त्वा नन्ददेहान्तरिन्द्रदत्तः समाविशत्। प्रत्युज्जीवति भूपे च राष्ट्रे समोत्सवोऽभवत् ॥१०१॥ शून्यं दवगृहं देहमिन्द्रदत्तस्य रक्षितुम्। व्याडी स्थिते गतोऽभूवमहं राजकुलं तदा ॥१०२॥

प्रथम लम्बक ४९

प्रथम लम्बक ४९ वररुचि का प्रत्यागमन शिवजी ने मुझे उसी पाणिनीय शास्त्र (व्याकरण) का प्रकाश दिया और उन्हीं की कृपा से मैंने (वार्तिक बनाकर) उसे पूर्ण किया ॥८८॥ तब मैं चन्द्रमौलीश्वर (महादेव) के कृपा-रूपी अमृत से तृप्त होकर मार्ग के श्रम को कुछ भी न समझते हुए अनायास ही घर चला आया ॥८९॥ घर आकर माता और गुरुजनों का चरणस्पर्श करके मैंने उपकोशा के अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त को सुना ॥९०॥ इस समाचार से मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा न रही और उपकोशा के प्रति स्वाभाविक स्नेह और सम्मान की भावना भी असीम हो गई ॥९१॥ उपाध्याय वर्ष ने मेरे मुख से इस नवीन व्याकरण को सुनने की इच्छा प्रकट की किन्तु स्वामिकुमार ने उपाध्याय के हृदय में उसे स्वयं ही प्रकाशित कर दिया ॥९२॥ तब व्याडि और इन्द्रदत्त ने गुरु वर्ष से गुरु-दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। उत्तर में गुरु वर्ष ने कहा कि 'एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा मुझे दो' ॥९३॥ गुरु वर्ष की आज्ञा को स्वीकार कर व्याडि और इन्द्रदत्त दोनों ने मुझसे कहा—'आओ मित्र ! राजा नन्द से गुरु-दक्षिणा माँगने के लिए चलें ॥९४॥ अन्य किसी से इतना सुवर्ण नहीं प्राप्त हो सकता क्योंकि राजा नन्द इस समय निन्यानब्बे करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं का स्वामी है ॥९५॥ उसने कुछ समय पहले (तुम्हारी धर्मपत्नी) उपकोशा को धर्म की बहिन भी माना है। अतः वह तुम्हारा साला होता है। इस नाते भी तुम्हारे कहने पर धन मिल सकता है ॥९६॥ ऐसा निश्चय करके हम तीनों सहपाठी अयोध्या में लगे हुए नन्द के शिविर में गये ॥९७॥ हम लोगों के वहाँ पहुँचते ही राजा नन्द का देहान्त हो गया और हमारे दुःख के साथ सारे राष्ट्र में कोलाहल मच गया ॥९८॥ इसी समय योग की सिद्धियों को जाननेवाला इन्द्रदत्त बोला—'मैं इस मृत राजा के शरीर में (पर-काय-प्रवेश¹-विद्या द्वारा) प्रवेश करता हूँ ॥९९॥ वररुचि अर्थी बने मैं इसे धन दूंगा और मेरे पुनः लौटने तक व्याडि मेरे वास्तविक शरीर की रक्षा करे ॥१००॥ ऐसा कहकर इन्द्रदत्त अपनी विद्या के प्रभाव से राजा नन्द के शव में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार राजा के पुनर्जीवित होने पर सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया ॥१०१॥ एकान्त देव-मन्दिर में इन्द्रदत्त के शरीर की रक्षा के लिए व्याडि बैठ गया और मैं राजा के समीप गया ॥१०२॥ १ योग के द्वारा परकाय-प्रवेश किया जाता था। इसका रहस्य अगले खण्ड में मय दानव के द्वारा प्रकट किया गया है।—अनु०

५० कथासरित्सागर

५० कथासरित्सागर प्रविश्य स्वस्तिकारं च विधाय गुरुदक्षिणाम्। योगनन्दो मया तत्र हेमकोटिं स याचितः ॥१०३॥ ततः स शकटालस्य सत्यमन्त्रस्य मन्त्रिणम्। सुवर्णकोटिमेतस्मै दापयेति समादिशत् ॥१०४॥ मृतस्य जीवितं दृष्ट्वा सद्यश्च प्राप्तिमधिनः। स तत्त्वं ज्ञात्वा मन्त्री किमज्ञेयं हि धीमताम् ॥१०५॥ देव ! दीयत इत्युक्त्वा स च मन्त्रीत्यचिन्तयत्। नन्दस्य तनयो बालो राज्यं च बहुशत्रुमत् ॥१०६॥ तत्सम्प्रत्यत्र रक्षामि तस्य देहमपीदृशम्। निश्चित्यैतत्स तत्काल शवान्सर्वानदाहयत् ॥१०७॥ चारैरन्विष्य तन्मध्ये रुद्ध्वा देवगृहान्तरे। व्याडिं विधूय तद्देहमिन्द्रदत्तकलेवरम् ॥१०८॥ अत्रान्तरे च राजानं हेमकोटिसमर्पण। त्वरमाणमथाह स्म शकटाली विचारयन् ॥१०९॥ उत्सवाक्षिप्तचित्तोऽयं सर्वं परिजनः स्थितः। क्षण प्रतीक्षतामय विप्रो यावद्ददाम्यहम् ॥११०॥ अथैत्य योगनन्दस्य व्याडिनाक्रन्दित पुरः। भवद्भाष्यमनुत्क्रान्तजीवो योगस्थितो द्विजः ॥१११॥ अनादृत्यैव इत्यद्य वलाद्दग्धस्त्ववोदधे। तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्य काप्यवस्थाभवत्तथा ॥११२॥ गेहे बाह्यास्थिरे तस्मिञ्ज्ञाते निर्गत्य मे वशे। सुवर्णकोटिं स तत शकटाली महामतिः ॥११३॥ योगनन्दोऽथ विजने सशोको व्याडिमब्रवीत्। शूद्रीभूतोऽस्मि विप्रोऽपि कि धिया स्थिरमपि मे ॥११४॥ तच्छ्रुत्वाश्वास्य तं व्याडि कालोचितमभाषत। ज्ञातोऽसि शकटालेन तद्वैतं चिन्त्यमाधुना ॥११५॥ महामन्त्री ह्ययं स्वऋद्धमचिरात्त्वां विनाशयेत्। पूर्वनन्दसुतं कुर्याच्चन्द्रगुप्त हि भूमिपम् ॥११६॥ तस्माद् वररुचि मन्त्रिमुरुयत्व कुरु यत्नं ते। एतद्बुद्ध्या भवद्राज्य स्थिर दिव्याश्रुभाषया ॥११७॥

प्रथम लम्बक ५१

प्रथम लम्बक ५१ राजभवन में आकर राजा को आशीर्वाद देकर मैंने उस योगनन्द से गुरुदक्षिणा के लिए एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा की याचना की ॥१ ३॥ तब योगनन्द ने शकटाल नामक पूर्वनन्द के मन्त्री को आज्ञा दी कि 'तुम इसे एक करोड़ की स्वर्ण-मुद्रा दिला दो' ॥१ ४॥ मृत राजा का तुरन्त जीवित हो उठना और उसी समय याचक का उपस्थित हो जाना देखकर वह मंत्री सच्ची बात को ताड़ गया। सच है बुद्धिमानों के लिए कौन-सी बात अज्ञेय है ॥१ ५॥ 'राजन् ! देता हूँ'—ऐसा कहकर उस मन्त्री ने यह सोचा कि नन्द का लड़का अभी बालक है और राज्य के शत्रु भी बहुत हैं। अतः इस (नकली) राजा के शरीर की अभी रक्षा करनी चाहिए। (कहीं कार्य होने पर यह भाग न जाय) यह निश्चय करके उसने तत्काल राज्य के सभी मर्चों को जलवा दिया ॥१ ६ १ ७॥ राज्य के गुप्तचरों ने ढूँढ़-ढूँढ़कर मुर्दों को जलाना शुरू किया। इसी प्रसंग में देवायतन में पड़े हुए इन्द्रदत्त के शव को भी व्याडि से छीनकर हठात् जला दिया गया ॥१ ८॥ इस बीच राजा को स्वर्ण देने में शीघ्रता करते हुए देख कर चतुर शकटाल बोला ॥१ ९॥ महाराज ! सारे राज-कर्मचारी उत्सव के कार्यों में व्यस्त हैं। इसलिए यह ब्राह्मण क्षण- भर प्रतीक्षा करे। तबतक मैं अभी देता हूँ ॥११ ॥ इसी अवसर पर व्याडि ने आकर राजा के सामने रोना प्रारम्भ किया कि आपके इस शुभ उदयकाल में अत्यन्त पाप हो गया। प्राणों के शेष रहने पर भी योग-समाधि में स्थित ब्राह्मण के शव को—अनाथ शव कहकर—तुम्हारे नौकरों ने जला डाला। यह सुनकर शोक के कारण योगनन्द' की कुछ बदहवास एवं विचित्र-सी दशा हो गई ॥१११ १२॥ शरीर के दग्ध हो जाने पर नन्द के शरीर में इन्द्रदत्त की आत्मा को स्थिर समझकर महाबुद्धिमान् शकटाल ने उठकर मुझे एक करोड़ स्वर्ण-मुद्राएँ प्रदान कीं ॥११३॥ इसके अनन्तर वह योगनन्द, एकान्त में खेद के साथ व्याडि से बोला—अब मैं ब्राह्मण होकर भी शूद्र हो गया। इसलिए मुझे इस स्थिर राजलक्ष्मी से भी क्या लाभ ॥११४॥ यह सुनकर व्याडि ने राजा को कामोचित आश्वासन देते हुए कहा—'तुम्हारा रहस्य शकटाल को मालूम हो गया है। इसलिए अब पहले उसकी चिन्ता करो ॥११५॥ यह महामन्त्री है। अपनी इच्छा से शीघ्र ही यह तुम्हारा नाश करके पूर्वनन्द के पुत्र चन्द्रगुप्त को राजा बनायेगा ॥११६॥ इसलिए तुम वररुचि को अपना प्रधान मन्त्री बनाओ उसकी दिव्य और प्रतिभाशाली बुद्धि से तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा ॥ ११७॥ १ योग के द्वारा पुनः जीवित होने के कारण इसका नाम योगनन्द पड़ा था। असली नन्द का नाम तरुनन्द या पूर्वनन्द था। इस विषय में विस्तृत विवेचन परिशिष्ट में किया गया है।

५२ कथासरित्सागर

५२ कथासरित्सागर

इत्युक्त्वैव गते व्याडौ दातुं तां गुरुदक्षिणाम्। तदवामीय दत्ता म योगनन्देन मन्त्रिणा ॥११८॥ अभोक्तः स मया राजा ब्राह्मये हारितोऽपि ते। राज्यं नैव स्थिरं मन्ये शकटाले पदस्थिते ॥११९॥ तस्मान्नाधाय युक्त्यैनमिति मन्त्रे मयोदिते। योगनन्दोऽन्धकूपान्तः शकटालं तमक्षिपत् ॥१२० ॥ किं च पुत्रंश्च तस्य सन्नैव क्षिप्तवानसौ। जीवन् द्विजोऽमुनादग्ध इति दोषानुकीसनात् ॥१२१॥ एकः शरावः सक्तूनामेकः प्रत्यहमम्भसः। शकटालस्य तत्रान्तः सपुत्रस्य न्यधीयत ॥१२२॥ स चोवाच ततः पुत्रानमीभिः सक्तुभिः सुताः। एकोऽपि कृच्छ्राद्वर्तेतबहूनां तु कथेव का ॥१२३॥ तस्मात्समश्नात्वेकः प्रत्यहं समशनंमूनू। यः शक्तो योगनन्दस्य कर्तुं वैरप्रतिक्रियाम् ॥१२४॥ त्वमेव शक्तो भुङ्क्ष्वेति पुत्रास्तमब्रुवन्। प्राणभ्योऽपि हि धीराणां प्रिया शत्रुप्रतिक्रिया ॥१२५॥ ततः स शकटालस्तैः प्रत्यहं सक्तुवारिभिः। एक एवाकरोद् वृत्तिं कष्टं क्रूरा जिगीषवः ॥१२६॥ अनुवृत्त्या चित्तमप्राप्य विस्रम्भं प्रभविष्णुषु। न स्वेच्छः स्पृहतव्यमात्मनो भूतिमिच्छता ॥१२७॥ इति पाञ्चिन्तयतस्तत्र शकटालोऽन्धकूपगे। तनयानां क्षुधार्तानां पश्यन्प्राणोद्गममव्यथाम् ॥१२८॥ ततः सुतशतं तस्य पश्यतस्तद्व्यपद्यत। तत्करङ्कैर्वृतो जीवन्नतिष्ठत्स च केवलः ॥१२९॥ योगनन्दश्च साम्राज्ये बद्धमूलोऽभवत्ततः। व्याडिरभ्याययौ तं च गुरवे दत्तदक्षिणः ॥१३०॥ अभ्येत्यैव च सोऽवादीच्चिरं राज्यं सुखंस्तु ते। आमन्त्रितोऽस्मि गच्छामि तपस्तप्तुमहं क्वचित् ॥१३१॥ तच्छ्रुत्वा योगनन्दस्तं बाष्पकण्ठोऽभ्यभाषत। राज्यं मे भुङ्क्ष्व भोगांस्त्व भुक्त्वा मां मास्म गा इति ॥१३२॥

प्रथम लम्बक ५३

प्रथम लम्बक ५३ ऐसा कहकर व्याडि गुरु-दक्षिणा देने के लिए चला गया और योगनन्द ने मुझे बुलाकर मन्त्रिपद समर्पित किया ॥११८॥ मन्त्रिपद ग्रहण कर लेने पर मैंने राजा से कहा कि 'तुम्हारा ब्राह्मणत्व तो गया। परन्तु उसके जाने पर भी जबतक शकटाल मन्त्री है, तबतक राज्य भी स्थिर नहीं रह सकता ॥११९॥ इसलिए नीति के साथ इसका नाश करो। इस प्रकार मेरी सम्मति से योगनन्द ने शकटाल को अँधेरे कुएँ में डाल दिया ॥१२०॥ शकटाल के साथ राजा ने उसके सौ पुत्रों को भी उसी अँधेरे कुएँ में डलवा दिया। उसका अपराध यह घोषित किया गया कि उसने जीवित ब्राह्मण को जलवा दिया था ॥१२१॥ मिट्टी के एक पात्रविशेष में सत्तू और ऐसे ही एक पात्र में पानी शकटाल और उसके पुत्रों के लिए कुएँ में रख दिया जाता था ॥१२२॥ शकटाल ने लड़कों से कहा कि 'इस सत्तू और पानी से एक का भी जीवन कठिन है, बहुतों की तो बात ही क्या ? ॥१२३॥ इसलिए बल के सहित इस सत्तू को वही प्रतिदिन खाया करे जो योगनन्द से बदला लेने की शक्ति रखता हो ॥१२४॥ लड़कों ने शकटाल से कहा कि 'राजा से बदला लेने के लिए आप ही समर्थ हैं। अतः आप ही इसे खाया करें'। सच है, महान् कामों के लिए शत्रु से बदला लेना प्राणों से भी प्यारा होता है ॥१२५॥ यह निर्णय होने पर वह अकेला शकटाल ही उस सत्तू और पानी से जीवन-निर्वाह करने लगा। सच है, शत्रु से बदला लेनेवाले अत्यन्त क्रूर प्रकृति के होते हैं ॥१२६॥ अपने कल्याण की कामना करनेवाले या उन्नतिशील व्यक्ति को चाहिए कि अपने मालिक की चित्तवृत्ति को बिना समझे और बिना उसका विश्वास प्राप्त किये उसके साथ व्यवहार न करे ॥१२७॥ भूख से प्राण त्यागते हुए बच्चों की पीड़ा देखकर अन्ध-कूप में पड़ा शकटाल इस प्रकार पश्चात्ताप करने लगा ॥१२८॥ उसके देखते-देखते ही सौ-के-सौ पुत्र मर गये। उनके कंकालों से घिरा हुआ एकमात्र शकटाल ही जीवित रह गया ॥१२९॥ इतने में योगनन्द भी धीरे-धीरे साम्राज्य में स्थिर हो गया तो व्याडि गुरु-दक्षिणा देकर उसके पास आया ॥१३०॥ व्याडि ने आते ही योगनन्द से कहा—'मित्र ! मेरी बताई नीति के अनुसार तुम चिरकाल तक राज्यभोग करो। मैं अब कहीं तपस्या करने जाता हूँ ॥१३१॥ व्याडि की बातें सुनकर गद्गद कण्ठ से राजा ने कहा—'तुम मेरे राज्य में रहकर सांसारिक भोगों को भोगो। मुझे छोड़कर न जाओ' ॥१३२॥

४ कथासरित्सागर

४ कथासरित्सागर व्याधिस्ततोऽवदद्राजञ्शरीरे क्षणनश्वरे । एवंप्रायेष्वसारेषु धीमान्को नाम मज्जति ॥१३३॥ नहि मोहयति प्राज्ञं लक्ष्मीरूमरुमरीचिका । इत्युक्त्वैव स तत्कालं तपसे निर्जगतो ययौ ॥१३४॥ अगमच्च योगनन्दं पाटलिपुत्रं स्वराजनगरं सः । भोगाय चाणमूर्ते ! मत्सहितः सकलसैन्ययुतः ॥१३५॥ तत्रोपक्रोधापरिचर्यमाणः समुद्वहन्मन्त्रिधुरं च तस्य । अहं जनन्या गुरुभिश्च साकमासाद्य लक्ष्मीमवसं चिराय ॥१३६॥ बहु तत्र दिने दिने द्विजेभ्यः कनकं मह्यमदात्प्रसन्ना । वव्राति स्म शरीरिणी च साक्षान्मम कार्याणि सरस्वती सदैव ॥१३७॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः ।

पञ्चमस्तरङ्गः एवमुक्त्वा वररुचिः पुनरेतदवर्णयत् । कालेन यागमन्दोऽयं कामादिवसमामयौ ॥१॥ गजेन्द्र इव मत्तश्च नापेक्षत स किञ्चन । अकाण्डपातोपनता न न लक्ष्मीर्विमोहयेत् ॥२॥ अचिन्तयं ततश्चाहं राजा तावद् विमूर्च्छकः । तत्कार्यचिन्तयाक्रान्तः स्वधर्माद् मेऽप्रसीदति ॥३॥ तस्माद् वरं सहायं तं शकटालं समुद्धरे । श्रियेत चेद् विरुद्धं च किं स कुर्यान्मयि स्थिते ॥४॥ निश्चित्यैतन्मयाभ्यर्थ्य राजानं सोऽन्धकूपतः । उद्धृतः शकटालोऽथ मुमुदे हि विजातये ॥५॥ दुर्जयो योगनन्दोऽस्य स्थिते वररुचावतः । आश्रये वैतसीं वृत्तिं काले तावत्प्रतीक्षितुम् ॥६॥ इति सञ्चिन्त्य स प्राज्ञः शकटालो मदिच्छया । अकरोद्राजकार्याणि पुनः सम्प्राप्य मन्त्रिताम् ॥७॥ कदाचिद्योगनन्दोऽथ निर्गतो नगराद् बहिः । क्षिपन्त्यल्पञ्चाङ्गुलिं हस्तं गङ्गामध्ये व्यलोकयत् ॥८॥

प्रथम लम्बक ५५

प्रथम लम्बक ५५ तब व्याडि ने कहा—'हे राजन् ! यह शरीर क्षण-भर में नष्ट हो जानेवाला है। अतः कौन बुद्धिमान् इस अनित्य सुख भोगों में डूबता है ॥१३३॥ लक्ष्मी की मृगतृष्णा किस धीर-पुरुष को मोहित नहीं कर लेती'? ऐसा कहकर तपस्या के लिए निश्चय किए हुए वह व्याडि उसी समय चला गया ॥१३४॥ वररुचि कहता गया—'हे काणभूते ! इसके अनन्तर योगनन्द अयोध्या-शिविर से समस्त सेना के सहित मेरे साथ चलकर प्रधान राजधानी पाटलिपुत्र में राज-भोग करने के लिए आ गया ॥१३५॥ इस प्रकार, पाटलिपुत्र में आकर उपकोशा द्वारा मेरी सेवा होती थी। और, साथ ही राजा नन्द के मन्त्रित्व-भार को वहन करता हुआ मैं माता और सुहृज्जनों के साथ समृद्धि का उपभोग करने लगा ॥१३६॥ पाटलिपुत्र में तपस्या से प्रसन्न होकर गंगाजी मुझे प्रतिदिन बहुत-सा सुवर्ण देती थीं और साक्षात् शरीरधारिणी सरस्वती मेरे कार्यों में सर्वदा स्वयं सम्मति देती रहती थीं ॥१३७॥ महाकवि सोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथापीठ लम्बक का चतुर्थ तरंग समाप्त। पञ्चम तरंग वररुचि की कथा (चालू) वररुचि का वैराग्य ऐसा कहकर वररुचि ने फिर कहना प्रारम्भ किया कि कुछ समय के अनन्तर योगनन्द काम क्रोध आदि के वशीभूत हो गया ॥१॥ वह योगनन्द गजेन्द्र के समान उन्मत्त हो गया और उसे कुछ भी न सूझता था। आकस्मिक रूप में प्राप्त हुई लक्ष्मी किसे उन्मत्त नहीं बना देती ॥२॥ तब मैंने सोचा कि राजा अनियन्त्रित स्थिति में हो रहा है। इसके कार्यों की चिन्ता में व्याकुल होकर मेरा कर्तव्य भ्रष्ट हो रहा है। अतः अपनी सहायता के लिए क्यों न शकटाल का उद्धार करूँ? यदि वह राजा के विरुद्ध आक्रमण करेगा भी तो मेरे रहते क्या कर सकता है ॥३ ४॥ इसलिए मैंने प्रार्थना करके शकटाल को अन्धकूप से निकलवाया। कारण यह कि ब्राह्मण जाति स्वभावतः शान्त होती है ॥५॥ 'वररुचि के रहते हुए योगनन्द पर विजय नहीं किया जा सकता। अतः इस समय बक के समान मन्द नीति धारण करके कुछ समय की प्रतीक्षा करनी चाहिए' ॥६॥ ऐसा सोचकर शकटाल मेरी सम्मति से पुनः मन्त्रित्व-पद प्राप्त कर राजकार्य करने लगा ॥७॥ किसी समय योगनन्द नगर से बाहर गया और पाँचों अँगुलियों से मिले हुए हाथ को उसने कड़ाही में घूमते हुए देखा ॥८॥