भारतकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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प्रथम लम्बक ४९ वररुचि का प्रत्यागमन शिवजी ने मुझे उसी पाणिनीय शास्त्र (व्याकरण) का प्रकाश दिया और उन्हीं की कृपा से मैंने (वार्तिक बनाकर) उसे पूर्ण किया ॥८८॥ तब मैं चन्द्रमौलीश्वर (महादेव) के कृपा-रूपी अमृत से तृप्त होकर मार्ग के श्रम को कुछ भी न समझते हुए अनायास ही घर चला आया ॥८९॥ घर आकर माता और गुरुजनों का चरणस्पर्श करके मैंने उपकोशा के अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त को सुना ॥९०॥ इस समाचार से मेरे आश्चर्य और आनन्द की सीमा न रही और उपकोशा के प्रति स्वाभाविक स्नेह और सम्मान की भावना भी असीम हो गई ॥९१॥ उपाध्याय वर्ष ने मेरे मुख से इस नवीन व्याकरण को सुनने की इच्छा प्रकट की किन्तु स्वामिकुमार ने उपाध्याय के हृदय में उसे स्वयं ही प्रकाशित कर दिया ॥९२॥ तब व्याडि और इन्द्रदत्त ने गुरु वर्ष से गुरु-दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। उत्तर में गुरु वर्ष ने कहा कि 'एक करोड़ स्वर्ण-मुद्रा मुझे दो' ॥९३॥ गुरु वर्ष की आज्ञा को स्वीकार कर व्याडि और इन्द्रदत्त दोनों ने मुझसे कहा—'आओ मित्र ! राजा नन्द से गुरु-दक्षिणा माँगने के लिए चलें ॥९४॥ अन्य किसी से इतना सुवर्ण नहीं प्राप्त हो सकता क्योंकि राजा नन्द इस समय निन्यानब्बे करोड़ स्वर्ण-मुद्राओं का स्वामी है ॥९५॥ उसने कुछ समय पहले (तुम्हारी धर्मपत्नी) उपकोशा को धर्म की बहिन भी माना है। अतः वह तुम्हारा साला होता है। इस नाते भी तुम्हारे कहने पर धन मिल सकता है ॥९६॥ ऐसा निश्चय करके हम तीनों सहपाठी अयोध्या में लगे हुए नन्द के शिविर में गये ॥९७॥ हम लोगों के वहाँ पहुँचते ही राजा नन्द का देहान्त हो गया और हमारे दुःख के साथ सारे राष्ट्र में कोलाहल मच गया ॥९८॥ इसी समय योग की सिद्धियों को जाननेवाला इन्द्रदत्त बोला—'मैं इस मृत राजा के शरीर में (पर-काय-प्रवेश¹-विद्या द्वारा) प्रवेश करता हूँ ॥९९॥ वररुचि अर्थी बने मैं इसे धन दूंगा और मेरे पुनः लौटने तक व्याडि मेरे वास्तविक शरीर की रक्षा करे ॥१००॥ ऐसा कहकर इन्द्रदत्त अपनी विद्या के प्रभाव से राजा नन्द के शव में प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार राजा के पुनर्जीवित होने पर सारे राष्ट्र में उत्सव मनाया गया ॥१०१॥ एकान्त देव-मन्दिर में इन्द्रदत्त के शरीर की रक्षा के लिए व्याडि बैठ गया और मैं राजा के समीप गया ॥१०२॥ १ योग के द्वारा परकाय-प्रवेश किया जाता था। इसका रहस्य अगले खण्ड में मय दानव के द्वारा प्रकट किया गया है।—अनु०